दीपक वोहरा की कविताएं

दीपक वोहरा की कविताएं | Deepak Vohra Poetry

कविता में

वो कविता में
कविता ढूंढ़ रहे हैं
मैं मनुष्यता

वो कविता में
भाषा देख रहे हैं
मैं तमीज़

वो कविता में
शिल्प शैली छान रहे हैं
मैं पक्षधरता

छंद, रस, बिंब ,सौन्दर्य, लय
न जाने क्या क्या कसौटी पर
वो परख रहे हैं कविता

और मैं न बाज़ीगर हूं कविता का
न ही तथाकथित बड़ा साहित्यकार
बस मनुष्यता का पक्षधर

हाथ

वो हाथ
जो पापा की चेहरे पर फेरते हुए
दाढ़ी की चुभन को महसूस करते थे
वो हाथ
जो पापा या मम्मी की उंगलियां थामे
आगे आगे पैर चलाते आगे बढ़ते थे
वो हाथ
छोटे, कोमल और गर्म
और बहुत ख़ूबसूरत थे
जिस हाथ में होनी चाहिए थी
कोई कलम और किताब
जो हाथ श्रम के योग्य होने थे
जिन्हें अभी दुश्मनों से लोहा लेना था
वो बारूद के ढहर में हो गए हैं
ज़ख्मी भले ही हों
मगर अभी भी मुट्ठी तनी है
यही वजह है
ऐसे हाथ को देखकर
मेरी मुट्ठी भी तन गई
आंखें क्रोध से लाल हैं
मेरा खून अभी जमा नहीं है
बह रहा है अनंत मेरी शिराओं में
फड़फड़ा रही हैं भुजाएं मेरी भी

कवि

कवि को कवि की नजर से जानो
उसे मनुष्य से ज्यादा
और कलाकार से कम मानो
मत लगाओ लेबल दो चार कविताओं से
तुम उसे मत कहो
मानवतावादी
प्रगतिशील न जनवादी
न ही अंबेडकरवादी
न ही आदिवासी

उसे कह लेने दो अपनी कविता
तुमसे कुछ देर रुका नहीं जाता

कलाकार है कलाकारी तो करेगा
और क्या क्या बाज़ीगरी करेगा
क्या जुर्म किया उसने
अगर आमजन की बात कही
क्या आफ़त आ गई
जब उसने दलित का मुद्दा उठाया
क्या गुनाह हो गया
अगर उसने राम का
मनुष्य सा में चित्रण किया
भक्तों क्या आफ़त टूट पड़ी
जो उसने सत्ता पर सवाल खड़ा किया

हिटलर

हिटलर से पहले भी थे
बहुत सारे हिटलर
हिटलर के मरने के बाद भी
होंगे बहुत सारे हिटलर
हिटलर की सोच में थी घृणा
घृणा में ही होता है हिटलर
लोगों की घृणा से पैदा होता है हिटलर
जैसी होती है प्रजा
वैसी ही होता है राजा
जब जब जनता की मर जाती है अंतरात्मा
हिटलर ही पैदा होते हैं
अगर जाग जाए जनता
हिटलर मर जाते हैं ख़ुद बा ख़ुद

एक ख़्वाब

आज कहीं कोई
ख़बर नहीं छपी थी
भेड़िए आने की
बंदरों के उत्पात की
शेर के शिकार की

आज कहीं भी
नहीं हुई थी कोई वारदात
शेर और हाथी की
और किसी एशियाई शेर ने
खाया था कोई आम
काटकर न ही चूस कर

हिरनी भी बच गई थी
नोच नोच कर खा जाने से
बच गए थे खरगोश भी
शिकार होने से

बाघ बहुत हैरान था
और खुश भी बहुत था
कि शेर और भेड़िए के शासन में
सब कुछ कैसे ठीक रहा

वो रात ही पढ़कर सोया था
जेल डायरी
वो मंद मंद मुस्करा रहा था
जैसी ही खुली उसकी आंख
तो हुआ अहसास
कि वो देख रहा था
कोई मीठा ख़्वाब

वो बेड़ियों से बंधा हुआ था
चारों तरफ़ अंधेरा था
बस एक ऊंचे रोशनदान से
आ रही थी छनकर
धुंधली नीम रोशनी

भेड़ और भेड़िए

भेड़ और भेड़िए का रिश्ता
बहुत पुराना हैं आदिम काल से
भेड़ अमूमन भेड़ ही रही
भेड़िए हमेशा भेड़िए
बहुत कोशिश के बाद भी
उनका कत्ल-ए-आम रुका नहीं है
कुछ भेड़े मिल गई हैं भेड़ियों से
इस उम्मीद में
कि शायद उनकी जान
बख्श दी जाएगी
पर वो जानती नहीं थी
कि पिछली भेड़ों ने भी
यही गलती दोहराई थी
भेड़ें ऐसी गलती दोहराती रहती है
और भूल जाती हैं
भेड़ियों का इतिहास
सबका नंबर आएगा‌
कोई नहीं बच पायेगा

भेड़ों के झुण्ड में
कभी कभी पैदा हो जाते हैं
बाघ भी
वो उठ खड़े होते हैं
भेड़ियों से लड़ने के लिए
लगातार अपनी समझ को तराशते हुए
जब वो पढ़ लेते हैं सिंहों का इतिहास
वो अपनी ही देश में
भेड़ों के बीच
देश द्रोही हो जाते हैं

भेड़ियों को यह पसंद नहीं
भेड़ें छोड़ दें डरना भेड़ियों से
और बाघ बन जाए
बाघ डरते नहीं भेड़ियों से
जैसे डरती हैं भेड़ों के झुण्ड
उनको डराने के वास्ते
धरपकड़ शुरू की जाती है
जंगली कुत्तों को छोड़ दिया जाता है
भौंकने के वास्ते
शिकारियों को पीछे लगाया जाता है
जाल बिछाया जाता है
बाघ फिर भी रोते नहीं है
गिड़गिड़ाते नहीं बकरों से
वो बस मुस्कुराते हैं
जेल में ठूंस दिए जाने के बाद भी

जो बच गए हैं
समझ रहे हैं
हम बच गए हैं
मगर बचेगा कोई नहीं
भले गच्चा दे दिया
बच गया किसी तरह

बचेगा वही जो लड़ेगा
बाघ बनकर
रचेगा कुछ बाघ
लिखेगा सिंह सा इतिहास

भेड़िया

सुबह के अखबार में
एक बड़ी खबर थी
कि दिन-दहाड़े शहर में
आया था भेड़िया

सबने उसे देखा
सुनी हर किसी ने उजाले में
उसके आतंक की आवाज़
बह रही थी हर सड़क पे
खून की नदिया

पर सब भक्तों का कथन है
कि खबर ग़लत है
कि दिन-दहाड़े शहर में
आया था भेड़िया
उनका तो बस …
यह मानना है
कि भेड़िया तो
क्रिया की प्रतिक्रिया है

सचाई यह है
कि हम शक नहीं कर सकते
भेड़िये के आने पर
मौसम जैसा बनाया जाता है
और हवा जैसी हो जाती है
उसमें कभी और कहीं भी
आ सकता है भेड़िया

पर सवाल यह है
कि आखिर यहीं इसी शहर में
क्यों आता है भेड़िया?

सवाल यह भी है
कि चुनाव से पहले
घुटने में अधिक दर्द होते हुए भी
किस प्रकार फुर्ती से दौड़ता है भेड़िया?

क्या वह छककर आता है रामनाम?
विक्षिप्त है या बीमार?

या काग़ज़ी शेर
भेड़ियों के साथ है?
या भीम का हाथी
बूढ़ा औ’ बेबस है
शासक के हाथों में?

या मार्क्स का मुखौटा
गुलाब पे फिदा हो गया?
या हथिनी मिल जाती है
भेड़ियों से हर बार
रानी बनने की चाह में?
या कलम के जादूगर
शेर पर सवा शेर कहने वाले
यहाँ के मॉडल विकास पे
कहीं फिदा तो नहीं?

बाघों की धड़ पकड़ है
कुछ बोलने पे

चाँद की चाँदनी में
अपने-अपने कुएं में
आत्ममुग्ध मेढ़क बने बैठे हैं

सब चुप हैं
पर एक बुनकर सुन रहा है
कि सब बोल रहे हैं
बहरों से पूछ रहे हैं अंधे
गर्भ से पूछ रही है नाल
अंधों से पूछ रहे हैं गूंगे
हड्डी से पूछ रही है खाल
कि आखिर कब तक
आता रहेगा भेड़िया?

खिल जाते हैं फ़ूल

कितनी भी आए बरसात
ठूंठ रहता है ठूंठ
जबकि खिल जाते हैं मुरझाए पौधे
और फ़ूल भी

याद आ गई तुम

तुमने कहा
भूल जाओ मुझे
और भूलने लगा मैं
भूलने की इस प्रक्रिया में
याद आ गई
एक बार फिर तुम

डूब गया है सूरज

डूब गया है सूरज तो क्या
अभी अंधेरा है तो क्या
कल फिर उगेगा सूरज
कल फिर बिखेरगा रोशनी
मोड़ लिया था जिन्होंने मुख
कल फिर वही बनेंगे सूरजमुखी
क्यों उदास है तू इतना
यह काली रात भी यूँही ढल जायेगी

कुछ देर ही की तो बात है

कुछ देर ही की तो बात है
साथ चल सको तो चलो
न जाने फिर कब कहां मिलना हो
गर साथ चल सको तो चलो
तुम्हारी मंजिल इधर है
मेरी मंजिल भी बस थोड़ी उधर है
गर साथ चल सको तो चलो
कुछ देर ही की तो बात है
कुछ पल मेरे साथ जी सको तो जीओ
चलते चलते संभवत तुम्हारा मन बदल जाए
तुम्हारे मन में मेरे लिए प्रेमभाव जाग जाए
दो अनजाने लैला मजनू, शीरी फ़रियाद,
सोनी महीवाल या रोमियो जूलियट हो जाए
कुछ देर ही की तो बात है
साथ चल सको तो चलो

आओ संवाद करें

कोहरा और बढ़ेगा
बर्फ और जमेगी
आओ संवाद करें
थोड़ी चुप्पी तो टूटेगी

साये और घने होंगे
अंधेरे और बढ़ेंगे
सूरज और निगला जायेगा
आओ उजालों के गीत सुने सुनाएं
सूरज को डूबने से बचाए

कैसा खेल है

इधर झोपड़ी
उधर महल है
देखो!धन्ना सेठ का
कैसा खेल है

एक तरफ असंख्य दीये
रोशनी की चकाचौंध
दूसरी तरफ न दिये
बाती न तेल है

झोपड़ी रोटी को भी तरसे
महलों में भोगो की
रेलमपेल है

दिलों में बैठा सदियों से
गहरा अंधेरा
सूरज डूबा रहा ताउम्र
न जाने कब होगा सवेरा

उठो साथियो!
उठो आज़ादी के दीवानो
बहुत सो लिए
अपने मसीहा के इंतज़ार में
मसीहा भी बिक गए
अमृतकाल में

ज़ालिम हाकिम
लूट रहा तुम्हारी मेहनत
अठारह घंटो लगा रहता है
इस काम में

लोकतंत्र सूरज पर पहरा है
फिरकापरस्त बादलों का
बच्चों के चाचा तरक्कीपसंद सब
भेज दिए जाते हैं जेल

उठो जागो साथियो!
सोये मत रहो
सवेरा यूहीं नहीं आयेगा
करो कुछ तुम संघर्ष
करे कुछ हम मेहनत
सवेरा और कौन लायेगा

दीपक वोहरा

(जनवादी लेखक संघ हरियाणा)

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