दिल अपना ग़रीब है
दिल अपना ग़रीब है

दिल अपना ग़रीब है

 

 

ख़ुशी से दिल अपना ग़रीब है

कब दिल अपना खुशनसीब है

 

गिला क्या करुं ग़ैर से भला

यहां तो अपना ही रकीब है

 

किसे मैं हाले दिल सुनाऊँ अब

नहीं कोई भी अपना हबीब है

 

तन्हा हूँ नगर में बहुत यहां

नहीं कोई मेरे करीब है

 

मैं जो चाहता हूँ नहीं मिलता

जीवन अपना तो बदनसीब है

 

ग़म का सिलसिला इसलिए है ये

ख़ुशी अपनी तो सब सलीब है

 

जिसे समझा  अपना यहां आज़म

वो निकला अपना ही रकीब है

 

 

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शायर: आज़म नैय्यर

(सहारनपुर )

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