मेरी साँसों मे तेरी महक सी है
मेरी साँसों मे तेरी महक सी है

मेरी साँसों मे तेरी महक सी है

 

 

मेरी साँसों मे तेरी महक सी है

आँख खोलूं तो तेरी चमक सी है

 

जब हाथ लग जाये कोई शाख पर

लगता है इसमें भी तेरी लचक सी है

 

गिर कर झड़ना जब जमीं पर टूट जाये

इसको भी हो रही कोई कसक सी है

 

अब आठों पहर तेरी बातों की नशा

घड़ी गीन रहा हूँ जैसे जिन्दगी गणक सी है

 

आओगे कब तुम मेरी बनकर मेरे आंगन

तुम और मैं हम हो जाये इक ललक सी है

 

❣️

लेखक :राहुल झा Rj 
( दरभंगा बिहार)
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