doctor's prescription

“डॉक्टर का पर्चा”

जब से राघव ने अपने बेटे का इलाज़… बच्चों के प्रसिद्ध डॉक्टर, डॉ० अग्रवाल से शुरू किया, तबसे राघव के बेटे की तबीयत में काफी सुधार हुआ। पिछले एक महीने से वे हर सप्ताह अपने बच्चे को डॉक्टर साहब को दिखाने आ रहे हैं। डॉक्टर साहब का पर्चा सिर्फ़ 5 दिनों के लिए ही वैलिड था।

इसलिए हर बार उन्हें 3000 रुपये का पर्चा बनवाना पड़ रहा था। पिछले 1 महीने में उनके अपने बच्चे पर लगभग ₹50000 का खर्चा आ गया था। आर्थिक रूप से कमजोर होने के बावजूद उनके लिए अपने बेटे से बढ़कर कुछ नहीं था। बस किसी तरह वह पूरी तरह स्वस्थ हो जाये।

वे अपने दोस्तों से रुपये उधार लेकर अपने बेटे का इलाज करवा रहे हैं। आज भी राघव डॉक्टर अग्रवाल के क्लीनिक पर पर्चा लगवा कर अपने नंबर के इंतजार में बैठे हुए थे, तभी वहां पर एक 30 वर्षीय महिला फटे पुराने कपड़ो में वहाँ आई और डॉक्टर साहब के कम्पाउंडर से बोली-

“भैया, डॉक्टर साहब आए हुए हैं।”

“हाँ जी, डॉक्टर साहब अपने क्लीनिक में बैठे हुए हैं। बताइये, क्या काम है?”

“भैया, मुझे डॉक्टर साहब से अपने बेटे के लिए एक दवा लिखवानी है।”

“मतलब आपको अपने बच्चे के लिए पर्चा बनवाना है।”

“नहीं भैया, पर्चा नहीं बनवाना। मेरे पास डॉक्टर साहब के पर्चे के लिए रुपये नहीं हैं। मेरे पास सिर्फ 300 रुपये हैं। मुझे डॉक्टर साहब से बस 1 मिनट के लिए मिलवा दीजिए। मुझे अपने 2 साल के बेटे के लिए उनसे खांसी की एक दवा लिखवानी है। डॉक्टर साहब दवा लिख देंगे तो मैं चली जाऊँगी।”

“खांसी की दवा लिखवाने के लिए डॉक्टर साहब को क्यों परेशान कर रही हो? खांसी की दवा तो मैं भी लिख दूंगा।”

“आप समझ नहीं रहे हो भैया, मुझे तो डॉक्टर साहब से ही मिलकर, बच्चे का हाल बताकर दवा लिखवानी है।”

“आपका बेटा किधर है? उसको साथ में लेकर नहीं आई?” कम्पाउंडर ने पूछा।

“नहीं, मैं उसको साथ लेकर नहीं आयी। मेरे बेटे की तबियत ठीक नहीं है। मेरा बेटा पूरी रात खांसता रहा और दर्द से रोता रहा। बड़ी मुश्किल से अभी-अभी सोया है। अगर जग रहा होता तो आने न देता। सीने से चिपका रहता खांसता हुआ।” यह बताते हुए वह बहुत भावुक हो गई।

तुम क्या करती हो? क्या डॉक्टर साहब तुम्हें जानते हैं? क्या तुम पहले भी अपने बच्चें को यहां दिखा चुकी हो? अगर हाँ, तो डॉक्टर का पुराना पर्चा दिखाओ।” हमदर्दी से कम्पाउंडर ने सवाल किया।

“भैया, मैं आज यहाँ पहली बार आयी हूँ। मैं घरों में बर्तन, कपड़े धोने एवं झाड़ू पोछा लगाने का काम करती हूँ। 3 घर पकड़ रखे हैं। हर घर से 2000 रुपये महीना पगार मिलती है। इस तरह जैसे-तैसे गुजारा हो जाता है। बच्चें के पापा नहीं है। कोरोना के कारण 6 महीने पहले ही उनकी मौत हो गई है।

बच्चें की तबियत खराब होने के कारण आज मैं काम पर नहीं गयी। जिनके यहां मैं काम करती हूँ उन्होंने बताया है कि डॉक्टर अग्रवाल बहुत अच्छे हैं। उनके सभी बच्चों का इलाज यहीं से चलता है। उन्होंने ही बताया था कि डॉक्टर साहब का सिर्फ पर्चा ही महंगा है, जबकि दवाई वे बहुत सस्ती लिखते हैं।

मेरा बच्चा छोटा है, इसलिए डॉक्टर साहब इसके लिए एक सीरप लिख देंगे। दवा पीने से मेरे बच्चे को तुरंत आराम मिल जाएगा। इसलिए यहाँ भागी-भागी आई हूँ। बस मुझे डॉक्टर साहब से मिलवा दो भैया। मैं उनसे खांसी का एक सीरप लिखवाकर तुरंत बाहर चली जाऊंगी। मुझे अपने बेटे के उठने से पहले घर वापस जाना है।” उस महिला ने विस्तार से कम्पाउंडर को भाई समझकर अपनी समस्या बता दी।

“बहन जी, मुझे माफ़ करना। डॉक्टर साहब बिना पर्चे के किसी मरीज को नहीं देखते हैं। उन्होंने हमें सख्त हिदायत दे रखी है कि किसी को भी बिना पर्चे के अंदर न भेजें। अगर कोई ऐसे ही अंदर चला गया तो वे हमारी तनख्वाह में से रुपये काट लेंगे। इसलिए पहले आप अपना पेपर बनवा लीजिए। उसके बाद डॉक्टर साहब आपसे मिल भी लेंगे, आपसे बात भी कर लेंगे, आपको दवा भी लिख देंगे।” कम्पाउंडर ने मजबूरी बताई।

“भैया जी, आपको तो पता है कि मैं पर्चा नहीं बनवा सकती। मेरे पास मात्र ₹300 है। मुझे पता है कि डॉक्टर साहब की मरीज देखने की फीस ₹3000 है। अगर मैं पूरे 300 रुपये दे भी दूँ तो दवा कहाँ से लूँगी?” अपनी समस्या पुनः उस महिला ने कम्पाउंडर के सामने रखी।

“मुझे नहीं पता।” दो टूक कम्पाउंडर बोला।

“भैया कुछ करो। मैं आपके आगे हाथ जोड़ती हूँ। गिड़गिड़ाकर वह महिला बोली।

राघव सहित वहाँ मौजूद सभी लोग उस महिला का कम्पाउंडर से अनुनय विनय देख रहे थे। वह महिला रुपयों को लेकर बेबस थी। हर कोई उस महिला के लिए हमदर्दी तो रख रहा था लेकिन मदद को कोई आगे नहीं आ रहा था। बात अगर दस बीस रुपये की होती तो कोई भी दानी, दयालु बन जाता लेकिन डॉक्टर साहब का पर्चा ही यहां 3000 का था। मध्यम वर्गीय एवं निम्न वर्गीय परिवारों के लिए 3000 रुपये बहुत बड़ी रकम होती है। उनकी तो पूरी तनख्वाह सिर्फ डॉक्टर को दिखाने में ही निकल जायेगी? वे दवा कहाँ से लेंगे और खाएंगे क्या?

“आप मेरे आगे हाथ मत जोड़िए। मैं यहाँ सिर्फ एक कर्मचारी हूँ। मुझे पता है कि डॉक्टर साहब मानेंगे नहीं, लेकिन मैं कोशिश करके देखता हूँ। इतने सारे लोग यहाँ अपने बच्चों को लेकर बैठे हुए हैं। पहले डॉक्टर साहब इनको देख लें। जब कोई नहीं होगा तब मैं आपके लिए डॉक्टर साहब से बात करके देखूंगा। इस समय गया तो मुझे डाँट पड़ जायेगी। डॉक्टर साहब से बात करने के लिए तुम्हें इंतज़ार करना होगा।” कम्पाउंडर ने उस महिला को आश्वासन देते हुए कहा।

“कोई बात नहीं भैया। मेरे लिए यही काफी है कि तुम डॉक्टर साहब से बात करोगे। पहले डॉक्टर साहब सबके बच्चे देख लें। भगवान सभी के बच्चों को ठीक कर दे। मैं यही बैठकर इंतज़ार कर रही हूँ। अब चाहें एक घण्टा लगे या 2 घण्टे.. मैं डॉक्टर साहब से मिलकर, बच्चें के लिए दवा लिखवाकर ही जाऊंगी।”

जब उस महिला को 2 घण्टे से ज्यादा बैठे हुए हो गए तो कम्पाउंडर ने उस महिला को इशारे से बुलाया और कहा-

“ये मैंने खांसी का सीरप लिख दिया है। जाकर बच्चे के लिए दवा ले लो। डॉक्टर साहब से मिलने की ज्यादा जिद ठीक नहीं है। मेरी बात मानो। डॉक्टर साहब के चक्कर में ना ही पड़ो तो अच्छा है। वह दवा घर जाते ही अपने बेटे को पिला देना। आपका बच्चा सही हो जाएगा।”

“नहीं, नहीं मैं डॉक्टर साहब से ही दवा लिखवाऊंगी। मैं डॉक्टर साहब का इंतज़ार कर तो रही हूँ। कुछ मरीज और रह गए हैं। एक घण्टे में इनका भी नम्बर आ जायेगा। मैं यहीं बैठकर डॉक्टर साहब का इंतजार करती हूँ। जब डॉक्टर यहाँ बैठे मरीजों को देखकर बाहर निकलेंगे तब मैं उनको रोककर दवा लिखवा लूंगी।” यह कहकर वह वहीं जमीन पर बैठ गई और भीड़ कम होने का इंतजार करने लगी लेकिन भीड़ कम ना हो रही थी।

उसको डॉक्टर साहब का इंतज़ार करते हुए 4 घण्टे हो गए। वह पुनः कंपाउंडर के पास गई और पूछने लगी-

“भैया कितना समय और लगेगा? मुझे अपने बेटे की फिक्र हो रही है। मेरा बेटा उठ गया होगा और बुरी तरह खांस रहा होगा। भैया जल्दी करो न। आप मिलकर मेरे बारे में डॉक्टर साहब से कहो न? बड़ी मेहरबानी होगी। मैं आपके पांव पड़ती हूँ।”

“तुम बड़ी भोली हो। तुमको क्या लगता है कि डॉक्टर साहब तुम्हारे बारे में नहीं जानते? क्या उनको नहीं पता है कि तुम उनका इंतजार कर रही हो? यहाँ हर जगह सीसीटीवी कैमरे लगे हुए हैं। वह पिछले 4 घंटे से तुम्हें देख रहे हैं। मैंनें भी बीच में जाकर तुम्हारे बारे में उन्हें बताया था लेकिन उन्होंने मेरी किसी बात का कोई रिस्पांस नहीं दिया और मैं वापस आ गया।

अगर उनके मन में जरा भी हमदर्दी होती तो वह अब तक तुम्हें बुला चुके होते? तुम्हें मैंने यह बात पहले नहीं बताई क्योंकि मुझे भी लग रहा था कि डॉक्टर साहब का.. तुम्हें यहाँ बैठा देखकर दिल पसीज जाएगा और वह तुमसे मिल लेंगे। लेकिन मैं गलत था। मुझे माफ़ करना मैं तुम्हारी कोई मदद नहीं कर सकता।”

इतने में एक व्यक्ति उस महिला को ढूंढते ढूंढते वहाँ आया और उस महिला के कान में चुपके से कुछ कहा। वह सुनकर वह महिला बहुत तेजी से सरपट दौड़कर उस अस्पताल से निकल गयी।। पता नहीं उस व्यक्ति ने उस महिला से क्या कहा होगा? उसका बेटा ठीक भी होगा या नहीं? कह नहीं सकते?

अच्छा इलाज, अच्छी शिक्षा सबको मिलनी चाहिये। विचारणीय प्रश्न यह है कि अस्पताल में बैठे राघव और उसके जैसे अन्य सभी व्यक्तियों का ध्यान बार बार उस महिला पर जा रहा था। सबको दिख रहा था कि वह गरीब है, जरूरतमंद भी है, हालात की मारी है।

अगर सच में उसके पास रुपये होते तो वह अपने बेटे के लिए रुपये खर्च करने से हिचकती नहीं। उस महिला को आज समझ में आ गया था कि पैसा सब कुछ न होते हुए भी बहुत कुछ है। यह चाहे तो इंसान की जान बचा लें या जिंदा इंसान को मार दे।

दूसरी ओर, वह व्यक्ति भी डॉक्टर कहलाने के लायक नहीं है जिसमें मानवीय संवेदना न हो। जो इंसान को इंसान न समझे, उनकी भावनाओं की कद्र न करे। क्या रुपये पैसे ही एक डॉक्टर के लिए सब कुछ हैं? क्या कुछ रुपयों के लिए किसी को मरने के लिए छोड़ा जा सकता है या सिर्फ अमीर घर के लोगों को ही अच्छा इलाज़ पाने का हक है।

एक समय था जब डॉक्टर अपना चैन, सकून सब कुछ त्यागकर निस्वार्थ भाव से आधी रात को भी मरीजों की सेवा में जुटा रहता था। लेकिन आज लोग डॉक्टर बनते हैं तो सिर्फ रुपये कमाने के लिए। जो लाखों, करोड़ो रूपये खर्च करके डॉक्टर बना हो, वह नि:शुल्क या कम रुपये में लोगों का इलाज कैसे कर पायेगा? इन बड़े डॉक्टर्स से तो झोलाछाप डॉक्टर ज्यादा अच्छे हैं।

छोटी-मोटी बीमारियों के आधे से ज्यादा मरीज तो ये लोग बहुत कम लागत में ठीक कर देते हैं, न तो पर्चा बनवाने की झंझट और न ही लाइन में लगकर इंतज़ार करने की चिंता। जरूरत पर ये आपके घर भी देखने पहुंच जाते हैं।

कोई आने जाने का शुल्क नहीं। मात्र 50 रुपये रोज की दवा से ही ये मरीजों का इलाज कर देते हैं। बस बड़ी बीमारियों में ही ये खुद को असहाय महसूस करते हैं। ऐसे बदतमीज और संवेदनहीन बड़े डॉक्टर्स से तो ये झोलाछाप डॉक्टर्स भले।

लेखक:- डॉ० भूपेंद्र सिंह, अमरोहा

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