मुहब्बत हो गई | Ghazal Muhabbat Ho Gayee

मुहब्बत हो गई

( Muhabbat Ho Gayee )

मुहब्बत हो गई तो क्या बुरा है
मुहब्बत ही ज़मानें में ख़ुदा है

कभी मिलकर नहीं होना जुदा है
मेरे मासूम दिल की यह दुआ है

तुम्हारे प्यार में पीछे पड़ा है
करो अब माफ़ भी जिद पर अड़ा है

ज़माना इस तरह दुश्मन हुआ यह
सभी को लग रही मेरी ख़ता है

जहाँ की आदतें बदली नहीं हैं
मेरा दिल इसलिए पीछे मुडा है

तुम्हीं बढ़कर हमारा हाथ थामों
ज़माना तो छुडाने पे तुला है

निभायेगी वही क़समें वफ़ा की
वही दिल की हमारे अब दवा है

न माँगूं प्यार की मैं भीख उनसे
हाँ मेरे साथ भी मेरा खुदा है

प्रखर की ज़िन्दगी का फैसला भी
उन्हीं की मर्ज़ी पर आकर रुका है

Mahendra Singh Prakhar

महेन्द्र सिंह प्रखर 

( बाराबंकी )

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