बच्चों की हिन्दी लिखावट

हिंदी दिवस पर दोहे | Hindi Diwas

हिन्दी दिवस पर दोहे

( Hindi diwas par dohe )

हिन्दी दिवस मना रहे, हर दफ्तर में आज ।
जो करते हर एक दिन, अंग्रेजी में काज ।।

हिंदी हिंगलिश बन गई, ऐसी बदली चाल ।
समय ने सब बदल दिया, देश रीत औ काल ।।

हिन्दी हिन्दी सब कहें, फिर भी मिला न मान ।
दुर्गत अपनी देखकर , हिन्दी छोड़े प्राण ।।

भाषा प्रेमी सब भये, भूले भाषा ज्ञान ।
हाथ जोड़ हिंदी कहे, नाही कर अपमान ।।

उलटा सीधा कुछ लिखें, बन बैठे विदवान ।
मुझ सम मूरख है घने, जग को बांचे ज्ञान ।।

अलग अलग भाषा यहां, अलग अलग है बोल।
वाणी की हर जात को, हिंदी से मत तोल।।

आओ मिल हम यह कहें, लेंगें हिन्दी ज्ञान ।
तन मन से कारज करें, देने को सम्मान ।।

डी के निवातिया

डी के निवातिया

यह भी पढ़ें:-

Similar Posts

  • मेरे पिता जी | Mere Pitaji

    मेरे पिता जी ( Mere pitaji )  मेरे पापा पं. श्री शिवदयाल शुक्ला जी की तृतीय पुण्यतिथि पर उन्हीं की याद में…..   छोड़ के इस जगत् को आप,जाने किस देश में बस गए। सच तो यह है पापा आप,मेरी अंतस यादों में बस गए। जब भी डांट लगाती माॅ॑,पापा बीच में आते थे। कहकर…

  • नहीं लगाना चाह रहे वो मोदी की वैक्सीन | Geet

    नहीं लगाना चाह रहे वो मोदी की वैक्सीन ( Nahin lagana chah rahe wo Modi ki vaccine )   “नहीं लगाना चाह रहे वो मोदी की वैक्सीन। काश ! नहीं मानें वो इसमें अब अपनी तौहीन। और लगा लें अब वे सारे मोदी की वैक्सीन।।” सुन कर ये उदगार मित्र ने तुरत विरोध किया कहा…

  • शकुंतला | Poem on shakuntala

    शकुंतला ( Shakuntala )     गुमनाम हुआ इस तन से मन, बस ढूंढ रहा तुमको प्रियतम। चक्षु राह निहारे आ जाओ, निर्मोही बन गए क्यों प्रियतम।   क्या प्रीत छलावा था तेरा, या मुझमें ही कुछ दोष रहा। क्यों शकुंतला को त्याग दिया, यह यौवन काल हुआ प्रियतम।   क्यों भूल गए हे नाथ…

  • सुदामा | Kavita

    सुदामा ( Sudama )   त्रिभुवनपति के दृगन में जल छा गया है। क्या कहा ! मेरा सुदामा आ गया है।। अवन्तिका उज्जयिनी शिप्रा महाकालेश्वर की माया, काशी वासी गुरु संदीपन ने यहां गुरुकुल बनाया। मथुरा से श्रीकृष्ण दाऊ प्रभास से सुदामा आये, गुरु संदीपन विद्यावारिधि को सकल विद्या पढ़ाये।। शास्त्र पारंगत विशारद पवित्रात्मा आ…

  • कभी कभी | Kabhi Kabhi

    कभी कभी ( Kabhi kabhi )    कभी कभी ही होता है दिल बेचैन इतना कभी कभी ही उठता है ज्वार सागर मे कभी कभी ही होती है बारिश मूसलाधार कभी कभी ही आते हैं ख्याल इंतजार मे… कभी कभी ही चांद निकला है ओट से कभी कभी ही होता है एहसास गहरा कभी कभी…

  • संवेदना व यथार्थ : ‘अंतर्मन की यात्रा’

    संवेदना व यथार्थ हाँ, ‘दया’ मेरे कवि-हृदय का,एक महान तथा विशेष गुण है |सरलता,धैर्य तथा करुणा का धनी हूँ |‘दया’ मेरा सबसे बड़ा धर्म है |निर्मल मन को,असाधारण रूप से,शांत, स्थिर होना चाहिए |अनमोल जीवन को समझने के लिए |कवि की आवश्यकता से अधिकसम्वेदनशीलता नुकसानदायक है |मानवता, प्रेम, एकता, दया, करुणा,परोपकार, सहानुभूति, सदभावना,तथा उदारता का…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *