हमसफ़र
हमसफ़र

हमसफ़र

 

हमसफ़र वही हमराज वही,
उनका अलग अंदाज सही।
सुख-दुख में जो रहें साथ ,
परिवार पर तनिक न आए आंच।
बल कई गुणा बढ़ जाए
विपत्ति आए टिक न पाए
न अंधकार हमें डराए
जीवन सरलता से कट जाए
सतरंगी बहार सदा रछाए
जब शुभ आगमन इनका हो जाए
असूल की हैं पक्की
बाते करें अच्छी अच्छी
जीवन में हमारी
जीवन को संवारी
मुस्कान उसकी बड़ी ही प्यारी
हर ले चिंता थकान सारी
कुछ ऐसी हैं हमसफ़र हमारी
सुगमता से चलाती परिवार रूपी गाड़ी
कार्यक्षेत्र में दिखाती बड़ी होशियारी
इनके दम पर टिका परिवार
इसकी खुशियों पर न्योछावर संसार
आने न दिया कभी घर में दरार
नज़र अंदाज़ करती गलतियां हजार
इन्हीं के दम पर टिकी है एकता
आश्चर्य से लोग हमें है देखता
मनाते मिलजुलकर सभी पर्व त्योहार
बड़ा मधुर है उनका व्यवहार
मेरे गले की हैं वह हार
दैवीय कृपा उनपर रहे बरकरार
हमसफ़र नहीं हमराज हैं
घर की वही ताज हैं
मेरी खुशियों का यही राज है।

 

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नवाब मंजूर

लेखक-मो.मंजूर आलम उर्फ नवाब मंजूर

सलेमपुर, छपरा, बिहार ।

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