पतझड़

पतझड़ में होती, रिश्तों की परख

पतझड़ में होती, रिश्तों की परख

मनुज जीवन अद्भुत प्रेहलिका,
धूप छांव सदा परिवर्तन बिंदु ।
दुःख कष्ट सुख वैभव क्षणिक ,
आशा निराशा शाश्वत सिंधु ।
परिवार समाज परस्पर संबंध,
स्वार्थ सीमांत निर्वहन चरख ।
पतझड़ में होती, रिश्तों की परख ।।

आर्थिक सामाजिक अन्य समस्या,
प्रायः संघर्षरत मनुज अकेला ।
घनिष्ठता त्वरित विलोपन,
दर्शन औपचारिक नाट्य नवेला ।
चक्षु आतुर अनुग्रह बिंब ,
मनुज सहन तीक्ष्ण तरख ।
पतझड़ में होती, रिश्तों की परख ।।

ज्ञात अज्ञात कारण वश,
बाधाएं वृहत्त रूप प्रवेश ।
विचलित धैर्य बुद्धि विवेक,
नकारात्मक सोच भावेश ।
आलोचना प्रहार चहुं दिशा,
परिवेश कारक अमैत्री सरख ।
पतझड़ में होती, रिश्तों की परख ।।

संबंध अंतर सहयोग मर्म,
विपरित परिस्थिति साझा ।
समय काल सदैव बलवान,
आरोह अवरोध समग्र माझा ।
हर व्यक्ति नैतिक कर्तव्य धर्म ,
नित सहभागी पीड़ा हरख ।
पतझड़ में होती, रिश्तों की परख ।।

महेन्द्र कुमार

नवलगढ़ (राजस्थान)

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