Kavita Saath do Tum Agar

साथ दो तुम अगर | Kavita Saath do Tum Agar

साथ दो तुम अगर

( Saath do tum agar ) 

 

साथ दो तुम हमारा अगर,
जिन्दगी भर बन हमसफ़र।
चाहे वक्त की हो कई मार,
बनके रहना कश्ती पतवार।।

देना सारे मुझको अधिकार,
कभी न छोड़ना तू मझदार।
स्नेह बरसाना व देना प्यार,
बनकर रहना तू समझदार।।

कर्म होता जीवन का सार,
और कर्म प्रधान ही संसार।
कर्म करे वो फलेगा फूलेगा,
न करे उसका कर्म सोएगा।।

वेद पुराण भी यही है कहते,
जैसी करनी वो वैसी भरनी।
कर्म का रहता लेखा जोखा,
ईश्वर को दे सकते न धोखा।।

नही घबराएँ देख दुःख कोई,
कर्म जगाये सोये भाग सारे।
कर्म से आये घर में खुशियाँ,
देखे दुख उसे मिले खुशियाँ।।

 

रचनाकार : गणपत लाल उदय
अजमेर ( राजस्थान )

 

 

 

Similar Posts

  • बचा रहे गणतंत्र | Kavita Bacha Rahe Gantantra

    बचा रहे गणतंत्र ( Bacha rahe gantantra )   अंतिम चरण बचा है अब तो, अपना मत दे डारो ! बिगड़ न जाए बात कहीं अब, अपनी भूल सुधारो !! रहे सुरक्षित गणतंत्र हमारा , लोभी नेताओं से ! देश बचाना है हम सबको , सेक्युलर मक्कारों से !! चूक गए तो, जिज्ञासु ‘जन’ ,…

  • पाखी की राखी | Pakhi ki Rakhi

    पाखी की राखी ( Pakhi ki Rakhi )   भाई-बहिन का रिश्ता ये प्यारा प्यारा इस प्यारे रिश्ते का प्यारा बंधन राखी खुशियों की अमिट सौगातें उमड़ रही देखो! कितनी खुश है आज ये पाखी चार दिन से देख रही, सजीले बाजार चमकीली राखियाँ, चमकते घर-बार चाँदी के वर्क से, सजी हुई मिठाइयाँ पकवानों की…

  • ये देश | Yeh Desh

    ये देश ( Yeh Desh ) ये देश है वीर जवानों का,कुर्बानी औ बलिदानों का।आ तुझे सुनाऊं ओ यारा,कुछ गाथा उन अभिमानों का। अपनी नींद गंवा के वे सब,देश की रक्षा करते हैं,वतन की खातिर मर मिटते हैं,नहीं मौत से डरते हैं। जो हुए शहीद थे सरहद पे,वे किसी की आँख के तारे थे।जो हुए…

  • औरत | Aurat par kavita

    औरत ( Aurat )   कोई कह दे तेरा अस्तित्व नहीं मान ना लेना जहां थक कर हारते हैं सब वहीं शुरुआत करती है औरत जहां पूजती है दूजे को शक्ति रूपा पूजी जाती है औरत कहने को कह देते हैं अबला नव अंकुर को जन्म देती है औरत संघर्ष प्रकृति का नियम है संघर्षों…

  • शब्द प्रणय | Shabd Pranay

    शब्द प्रणय  ( Shabd Pranay )   शब्द प्रणय में,संवर रही कविताई उर भाव मृदुल मधुर, श्रृंगार अनूप नित यथार्थ । संवाद अनुपम मोहक प्रभा, साधन साध्य ध्येय परमार्थ । अथाह नैतिक तेजस्वी छवि, संस्कारी अनुपमा जनमानस छाई । शब्द प्रणय में,संवर रही कविताई ।। भव्य नवाचार अवबोधन , नवल धवल पथ प्रशस्त । निशि…

  • ये नवल धरा है रसिकों की | Nawal Dhara

    ये नवल धरा है रसिकों की  ( Ye Nawal Dhara Hai Rasiko Ki )    तुम लक्ष्मीकांत मैं रमाकांत, तुम गुणी पूज्य मैं भी हूं शांत। तुम हंसी ठहाकों की दुनिया, महफ़िल में रंग जमा जाना। ये नवल धरा है रसिकों की, तुम आकर पुष्प खिला जाना। मैं मनमौजी मतवाला गीतों में, फागुनी रस राग…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *