Kavitayen Sher Ki

शेर की कविताएं | Kavitayen Sher Ki

शेर की कविताएं

( Sher ki kavitayen )

 

हाँ दबे पाँव आयी वो दिल में मेरे, दिल पें दस्तक लगा के चली थी गयी।
खोल के दिल की कुण्डी मैं सोचूँ यही, मस्त खूँशबू ये आके कहा खो गयी॥
हाँ दबे पाँव….
*
सोच मौका दोबारा मिले ना मिले, ढूँढने मै लगा जिस्म सें रूह तक।
पर वो मुझको दोबारा मिली ना कभी , जाने मुझको सता के कहा खो गयी॥
हाँ दबे पाँव…
*
बात वर्षो पुरानी है पर ये मुझे, ऐसा लगता है जैसे की अब ही हुआ।
जब भी ठंडी हवाओ का झोकाँ उठे, मेरा दिल ये कहे तू यही पास है॥
हाँ दबे पाँव….
*
शेर एहसास ए दिल में दबाए रखा, ख्वाब में भी सदा मुस्कराते रहा।
आज फिर मुझको खुँशबू मिली है वही, जाने ए महफिल मे तू ही कही तो नही॥
हाँ दबें पाँव….

*

 

??

उपरोक्त कविता सुनने के लिए ऊपर के लिंक को क्लिक करे

✍?

कवि :  शेर सिंह हुंकार

देवरिया ( उत्तर प्रदेश )

यह भी पढ़ें : –

जीवन के इस धर्मयुद्ध में | Poem jeevan ke dharmayudh mein

Similar Posts

  • आदमी बड़ा चाटुकार है | Aadmi Bada Chatukar

    आदमी बड़ा चाटुकार है! ( Aadmi Bada Chatukar Hai ) आदमी बड़ा चाटुकार है- स्वार्थ देखा नहीं; कि, झटपट चाटने लगता है। ऐसी-ऐसी चाटुकारी… आदमी-आदमी लेकर बैठा है; कि, वक्त आने पर… आदमी, आदमी को चाट लेता है। चाटुकारों की इस दुनिया में, आदमी इतना चाटुकार है- अपना काम निकल जाये, इसकी ख़ातिर… थूक तक…

  • रक्त पीना : मच्छरों की शौक या मजबूरी | Machchhar par kavita

    रक्त पीना : मच्छरों की शौक या मजबूरी? ******* ये हम सभी जानते हैं, मच्छर खून पीते हैं। डेंगी , मलेरिया फैलाते हैं, सब अक्सर सोचते हैं! ये ऐसा करते क्यों हैं? पीते खून क्यों हैं? जवाब अब सामने आया है, प्रिंसटन यूनिवर्सिटी ने बताया है; जवाब ने सबको चौंकाया है। आरंभ से मच्छरों को…

  • इतने शून्य उफ इतने शून्य

    इतने शून्य उफ इतने शून्य इतने शून्य उफ इतने शून्यये शून्य जीवनये जीवन का शून्यये आसमान शून्यये आसमानों में शून्यये रिश्ते शून्यये लहू में बहता शून्यइतने शून्य.. उफ इतने शून्यशून्य ही शून्यदुनिया का नही पता मगर मैं तो रह गया दंग.इतने शून्य उफ इतने शून्य.लड़ने को कहते सब मगर शून्य से कैसे करे कोई जंगदुनिया…

  • सुबह तो होगी कभी | Subah to Hogi

    सुबह तो होगी कभी ! ( Subah to hogi kabhi )   मेरा भारत है महान, जग को बताएँगे, इसकी जमहूरियत का परचम लहरायेंगे। सबसे पहले लोकतंत्र,भारत ईजाद किया, इस क्रम को और गरिमामयी बनाएंगे। विशाल वट-वृक्ष तो ये बन ही चुका है, करेंगे इसका सजदा,सर भी झुकायेँगे। कभी-कभी छाता है घना इसपे कुहरा, बन…

  • प्रतिद्वंदी संसार | Pratidwandi Sansaar

    प्रतिद्वंदी संसार ( Pratidwandi Sansaar )   दीवानगी की हदों पर,सदा प्रतिद्वंदी संसार स्वप्निल आभा यथार्थ स्पंदन, अंतरतम वसित अनूप छवि। नेह वश चाल ढाल, हाव भाव श्रृंगार नवि । पर हर कदम व्यंग्य जुल्म सितम सह, चाह आकांक्षा सीमा अपार । दीवानगी की हदों पर,सदा प्रतिद्वंदी संसार ।। निहार दैहिक सौष्ठव, मचल रहीं वासनाएं…

  • जलेबी | Jalebi par Kavita

    जलेबी ( Jalebi)    हुस्न-ओ-शबाब से कसी है जलेबी, गर्म आँच पे खूब तपी है जलेबी। तुर्को ने लाया भारत में देखो, लज्जत जिन्दगी की बढ़ाती जलेबी। व्यंग्य से भरी है इसकी कहानी, फीकी न पड़ती इसकी जवानी। खुशबू है अंदर, खुशबू है बाहर, खुद को मिटाकर चमकी जलेबी। हुस्न-ओ-शबाब से कसी है जलेबी, गर्म…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *