Maa ki mamta poem

माँ की ममता | Maa ki mamta poem

माँ की ममता

( Maa ki mamta )

( 4 ) 

माँ की ममता दिव्य है,माँ से है पहचान।
माँ की कृपा-कटाक्ष से,बनता पुत्र महान।।1।।

ममता के ऑंचल तले, मिलती ठंडी छाँव।
जब तक माँ का साथ है, नहीं जलेगा पाँव।।2।।

धरती की भगवान है, माँ का रूप अनूप।
मातृ-चरण में स्वर्ग है, देवी का प्रतिरूप।।3।।

माता का दर्शन करें,अंतस रहे पवित्र।
माँ सबको अच्छी लगे,मातु हमारी मित्र।।4।।

माता से हमको मिला,एक सुखद संसार।
माता के मुस्कान से, संकट जाते हार।।5।।

माँ की इच्छा शांत हो, तब समझो वैराग्य।
माँ के आशीर्वाद से,बनता है सौभाग्य।।6।।

देती सुखमय जिंदगी, सहती कष्ट अपार।
धरती से आकाश तक, माता सुख का सार।।7।।

परमानंद निषाद’प्रिय’

( 3 )

बच्चों की जिंदगी में
तो मां की ममता का
तो कोई तुलना नहीं,
सीमा बंधनों से परे,
अनंत ममता उमड़ती,
प्रतिपल याद बच्चों को।
मां की नि:स्वार्थ ममता
प्रेम से ही बच्चों का
विकास,संवर्धन, रहते
बच्चे स्वस्थ, मस्त
खुशियों में मशगुल।
उसे ना कोई फिक्र,ना
कोई चिंता माँ है ।
ना मेरे ऊपर ऐसा
अनुभूति बच्चों को।
मां की ममता तो ,
अनमोल,अद्वितीय ,
अनुपम,निराली,अद्भुत।
आन पड़े तो शेर से
लड़ जाएगी मां।
जब तक जिंदगी में
सांस,बच्चों पर लुटाती
असाधारण ममता,प्रेम।

भानुप्रिया देवी

बाबा बैजनाथ धाम देवघर

( 2 )

अपने लहु से सींचे देखो,ममता रही लुटाये।
माॅ॑ की ममता मिलती जिसको,बड़भागी कहलाये।

ममता ऑंचल क्या होता है,इसकी कीमत जानों।
इन चरणों में स्वर्ग बसा है,अडिग सत्य पहचानों।
करता जो भी माॅ॑ की सेवा,वही ईश को भाये।
माॅ॑ की ममता मिलती जिसको,बड़ भागी कहलाये।

निकली एक आह भी उसकी,माॅॅ विचलित हो जाती।
हॅ॑सता जब गोदी में बालक, माता है मुस्काती।
सुनकर सुत किलकारी को माॅ॑ ,हृदय खुशी भर जाये।
माॅ॑ की ममता मिलती जिसको,बड़ भागी कहलाये।

ममता की छाया हो सिर पे,चमके भाग्य सितारे।
मन का सपना पूरा होता,बने गगन के तारे।
नित नित करते चरण वंदना,माथा चरण नवायें।
माॅ॑ की ममता मिलती जिसको, बड़ भागी कहलाये।

कवयित्री: दीपिका दीप रुखमांगद
जिला बैतूल
( मध्यप्रदेश )

( 1 )

तुम्हारें हर रुप को मेरा वन्दन है माँ,
तेरे इन चरणों को मेरा प्रणाम है माँ।
माँ तू ही यमुना और तुम ही जमुना,
तुम ही गंगा, कावेरी तुम ही नर्मदा।।

 

माँ तुझमे है दुर्गा और तुझमे लक्ष्मी,
ममता की हो मूरत भोली सी सूरत।
तुझमें ही गौरा एवं काली कुष्मांडा,
पूरा करती हो सदा मेंरी हर ज़रुरत।।

 

माता हम सब है तुम्हारी ही सॅंतान,
देती हो मुँख निवाला और मुस्कान।
तुम्हारे चरण में विश्व के चारों धाम,
तुझमे माँ सीता और राम भगवान।।

 

नौ महिनें मुझको तुने गर्भ में पाला,
कई मुश्किलें परेशानियों को झेला।
सींचा था मुझको अपनें इस लहू से,
और दिखाया मुझे दुनियाॅं उजाला।।

 

गाय में ममता कुतिया में भी ममता,
शेरनी अथवा हथनी में देखा ममता।
जीव जन्तु सभी मे मातृत्व लालसा,
जुटा लेती हो बच्चों के लिए क्षमता।।

 

रचनाकार : गणपत लाल उदय
अजमेर ( राजस्थान )

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