मां शारदे

मां शारदे | Maa Sharde

मां शारदे

( Maa Sharde ) 

( 3 )

हो ज्ञान का भंडार माँ,यह लेखनी चलती रहे।
शुभदा सृजन उपवन खिले,नित ज्योति बन जलती रहे।।

कर्तव्य का पथ हो विमल,हर स्वप्न भी साकार हो।
पावन रहे ये गंग सी,हर शब्द में रसधार हो।।
हो भावना कल्याण की, बस प्रेम का गुंजार हो।
रस छंद जीवन में भरें, नित दीन पर उपकार हो।।
वरदान हो यह लेखनी,चिंतन नवल तलती रहे।
हो ज्ञान का भंडार माँ,यह लेखनी चलती रहे।।

उल्लास ही उल्लास हो,आकाश की पहचान हो।
विश्वास को मंज़िल मिले,इस लेखनी का मान हो।।
हो शिल्प उत्तम काव्य में,शुचिता सदा ही साथ हो।
वाणी मधुर हो शारदा,माँ शीश पर तव हाथ हो।।
हर शब्द से माला बने,जिसमें सुरभि पलती रहे।
हो ज्ञान का भंडार माँ,यह लेखनी चलती रहे।।

मीरा भजे तुलसी जपे ,माता कबीरा शान है।
युग युग चले भटके नहीं,यह लेखनी तो मान है।।
महिमा सभी हैं जानते,रचती सदा इतिहास है।
आधार जीवन जानिए ,यह तो सुखद आभास है।।
शृंगार बन कवि का अधम,को टोकती खलती रहे।
हो ज्ञान का भंडार माँ,यह लेखनी चलती रहे।।

ललकारती रिपु को यही,करती सदा कल्याण है।
चिंतन नवल कर ले मनन,वह लेखनी तो प्राण है।।
विनती करूँ माता यही,बस दूर कलुषित भाव हो।
हों दिव्य स्वर संगीत के,संसार में बदलाव हो।।
बलवान हो हर शस्त्र से,यह बेल सी फलती रहे।
हो ज्ञान का भंडार माँ,यह लेखनी चलती रहे।।

Meena Bhatta

कवियत्री: मीना भट्ट सि‌द्धार्थ

( जबलपुर )

( 2 )

ज्ञान की देवि मातु शारदे,
मां मुझको बस इतना वर दे।
सच्चाई के पथ पर चलूं मैं,
मन में मां मानवता भर दे।।ज्ञान की…..

मां, मैं मुरख हूं सारे जग में,
अज्ञानी कांटे हैं मेरे पग में।
अज्ञानता को दूर करो मां,
ज्ञान की लौ मां मन में जगा दे।।ज्ञान की…..

मूर्ख कालिदास को विद्वान बनाया,
विद्योतमा का तूने मान घटाया।
दासी मंथरा की मति को फेरा,
मां मुझपर भी कुछ ऐसा कर दे।। ज्ञान की….

मां मैं तेरा वंदन करता,
चरण धूलि मस्तक पर धरता।
मां तूने ही तो जग को संवारा,
मां मुझको भी संवार दे।। ज्ञान की देवि….

अपने “प्रभात” को ज्ञान बता दो,
जीवन में कोमलता ला दो।
चरणों में तेरे ध्यान रहे बस,
मां शारदे,बस इतना वर दो।।ज्ञान की देवी….

प्रभात सनातनी “राज” गोंडवी
गोंडा, उत्तर प्रदेश

( 1 )

करो मां झंकृत वीणा तार

खिले उर शुचिता प्रसून,
मिटे दुःख संकट भय।
बहे संवेदन सरि निर्झर,
सृष्टि आभा सुख शांति मय ।
संबंध उत्संग अपनत्व अथाह,
नेह परिध अनूप विस्तार, ।
करो मां झंकृत वीणा तार ।।

उमंगित जीवन गतिमान,
फले फूले आशा उद्यान ।
प्रफुल्लित जन जन प्राण,
मुदित मन गाए नव रस गान ।
ह्रदय मणि विमल श्रृंगार,
बजे सांसों संग सितार ।
करो मां झंकृत वीणा तार ।।

अमिय रस वाणी रस धार,
बहे करुणा ममता प्यार ।
आत्म बल आभास पथ,
नभ धरा उल्लास अपार ।
कलयुग कपाल उन्नत प्रभा,
सतयुग अनुपमा साकार ।
करो मां झंकृत वीणा तार ।।

मनुज नित ध्यान अंतस्थ,
मिटे तम जागृत सद्ज्ञान ।
दया सेवा संयम युक्त,
जग पटल देवत्व आह्वान।
दिव्य प्रज्ञा भव्य अभिवंदन,
सजे पावन स्वर संसार ।
करो मां झंकृत वीणा तार ।।

महेन्द्र कुमार

नवलगढ़ (राजस्थान)

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