महाकुम्भ में खिचड़ी

महाकुम्भ में खिचड़ी

महाकुम्भ में खिचड़ी

धनु को त्याग मकर में आये,
जब दिनकर भगवान।
दक्षिण वलित हो गई धरती,
आया पावन पर्व महान।

हुई अवस्थिति अयन उत्तरी,
अब शुभ मंगल दिन आये।
वर को वधू, वधू को वर अब,
हर्षित मन को मिल पायें।

अलग अलग क्षेत्रों में लोहरी,
पोंगल, बिहू, टुसू, संक्रांति।
उत्तरायण से ही जन-जन में,
क्रमशः भरती जाती कान्ति।

मिलती मुक्ति शीत से मौसम,
करने लगता है गुनगुन।
फसलें भी अब मुस्काती हैं,
गीत सुनाती है चुनमुन।

यह विशेष है सन् पचीस की,
जोशीली पावन संक्रांति।
निश्चित ही मन मुदित रहेगा,
और मिलेगी अप्रतिम शान्ति।

चल प्रयाग में संगम तट पर,
वहां करें पावन स्नान।
ऋषि-मुनियों के दर्शन कर लें,
और करें उनका गुणगान।

जहां मिलें दुर्लभ विभूतियां,
हो जीवन सबका धन्य-धन्य।
महाकुंभ का मिलन सनातन,
पावन सुशील शुचिता अनन्य।

नव तंदुल खिचड़ी तहरी का,
प्रभु अर्पण कर मिलता प्रसाद।
चैतन्य, ऊर्जित, संस्कारित
हो, जन-जन का छूटे प्रमाद।

यदि इस दिन जाना कहीं नहीं,
तो घर में खिचड़ी बनवाओ।
प्रभु का फिर अर्चन वंदन कर,
प्रभु भोग प्रसादी खुद पाओ।

खिचड़ी प्रसाद जग नाथ का है,
धनधान्य स्वास्थ्य से पूरित है।
यदि खिचड़ी दान करो इस दिन,
इस दान का पुण्य असीमित है।

जनसंकुल की खिचड़ी एकत्र,
है महाकुम्भ में संगम तट।
यदि मिले प्रसादी खिचड़ी की,
भवबंधन रोग कटें झटपट।

sushil bajpai

सुशील चन्द्र बाजपेयी

लखनऊ (उत्तर प्रदेश)

यह भी पढ़ें :-

Similar Posts

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *