मरने भी नहीं देते

मरने भी नहीं देते

वो देते हैं ज़हर मुझको मगर मरने भी नहीं देते,
बनाते हैं ताबूत, मेरी लाश बिखरने भी नहीं देते।

करूं मैं प्यार सिर्फ उनसे ये भी तो ज़िद्द है उनकी,
वो ज़ाहिर इश्क मुझको मगर करने भी नहीं देते।

वो देते रहते हैं ज़ख्म पे ज़ख्म मेरे इस सीने पर,
मगर इन ज़ख्मों को वो कभी बिसरने भी नहीं देते।

गुज़ारकर शब ग़ैर की ख़्वाबगाह में जलाते हैं मुझे,
मगर मुझको कभी भी वो आहें भरने भी नहीं देते।

वो कहते हैं रोज़ अपना चेहरा दिखा जाया करो,
मगर कभी वो अपनी गली से गुज़रने भी नहीं देते।

मैं बनकर नदी चल‌ पड़ी हूंँ मिलने उस सागर में,
वो बनकर सागर मुझे खुद में ठहरने भी नहीं देते।

वो चाहते हैं वो बने दुल्हा ‘प्रेम’ उनकी दुल्हन बने
मगर वो मुझे अपने प्यार में संवरने भी नहीं देते।

प्रेम बजाज © ®
जगाधरी ( यमुनानगर )

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