माया का बंधन

माया का बंधन | Maya ka Bandhan

माया का बंधन

माया का बंधन हमको छलता
प्रेम फिर भी मन में पलता
यह राज न जाने कोई ।
मां का बंधन सबको प्यारा
सारा जग यह जानता ।
प्रेम माँ का होता निश्छल
सारा जग यह मानता ।
भूखे रहकर खाना देती
सहती रहती कुछ न कहती
यह राज न जाने कोई ।
कई रूप होते बंधनो के
बुझना होता कठिन ।
जन्म देना सरल होता
पालना होता कठिन ।
कोई बंध जाने पर हँसता
कोई बंधन में जा फँसता
यह राज न जाने कोई ।
रिश्तो का बंधन हमें दिम्भ्रमित
करता रहता है ।
एक पग हँसाता दूजे पग रुलाता रहता है ।
पल में कोई रूठ जाता
दूसरे पल मान जाता
यह राज न जाने कोई ।
माया के बंधन में बंध कर
भूल जाते प्रभु को हम . ।
शाम जीवन की जब होती
याद करते प्रभु को हम ।
दिल से जब हम याद करते
पार भवसागर से करते
यह राज न जाने कोई ।

आशा झा
दुर्ग ( छत्तीसगढ़ )

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