मेरे होंठों की उसने हंसी छीन ली

मेरे होंठों की उसने हंसी छीन ली

तीरगी बख़्श दी रोशनी छीन ली।
मेरे होंठों की उसने हंसी छीन ली।

मुस्कुराती थी जो मेरे रुख़ पर सदा।
उसने ख़ुशियों की वो चांदनी छीन ली।

जाम नज़रों से उसने पिला कर मुझे।
मेरे होंठों की सब तिश्नगी छीन ली।

मुस्कुरा कर मुझे इक नज़र देख कर।
मेरी आंखों की उसने नमी छीन ली।

चैन देती थी तन्हाई में जो मुझे।
उसकी आमद ने वो बेकली छीन ली।

चाह कर भी हंसी आ न पाएगी अब।
उसने मेरी हंसी सर्मदी छीन ली।

ज़ातो मज़हब के नामों पे भड़के हैं जो।
उन फ़सादों ने दिल की ख़ुशी छीन ली।

चुप ही रहते थे हम तो हमेशा फ़राज़।
ज़ुल्म ने आपके ख़ामुशी छीन ली।

सरफ़राज़ हुसैन फ़राज़

पीपलसानवी

यह भी पढ़ें:-

हमदम मेरे | Humdum Shayari

Similar Posts

  • हो सब्ज़ा शाख हर | Ho Sabza Shaakh Har

    हो सब्ज़ा शाख हर ( Ho Sabza Shaakh Har ) हो सब्ज़ा शाख हर अपने चमन की इनायत चाहिए हमको गगन की नज़र दुश्मन की टेढी दिख रही है हिफ़ाज़त करनी है सबको वतन की जवानों आज माता भारती को ज़रूरत है तुम्हारे बाँकपन की ज़माना जानता है किस तरह से कमर तोड़ी है हमने…

  • बोलेंगे | Bolenge

    बोलेंगे ( Bolenge ) रोज़ हम इंकलाब बोलेंगे ? रोज़ ही बेहिसाब बोलेंगे ख़ूबसूरत बड़ी फ़बन इसकी देश अपना गुलाब बोलेंगे रोशनी प्यार की ही देता है देश को आफ़ताब बोलेंगे ये ही मेरी पहचान है जय हिंद जोर से ही ज़नाब बोलेंगे पूछेगा जो गवाह में जय हिंद ये ही अपना ज़वाब बोलेंगे है…

  • उसे पास बुलाते क्यों हो

    उसे पास बुलाते क्यों हो टूटने है जो मरासिम वो निभाते क्यों होदूर जाता हो उसे पास बुलाते क्यों हो। वक्त माकूल नहीं हो तो बिगड़ती चीज़ेंदौर-ए-तूफाॅं में चिराग़ों को जलाते क्यों हो। तुम हमारे हो फ़कत है ये नवाज़िश हम परबस गिला ये है कि एहसान जताते क्यों हो। आइना सबको दिखाकर के गिनाकर…

  • यार तू हँसना हसाना छोड़ दे

    यार तू हँसना हसाना छोड़ दे यार तू हँसना हसाना छोड़ देलोगो की बातों में आना छोड़ दे इस तरह तू मुस्कराना छोड़ देगम को अपने तू छुपाना छोड़ दे अब न राधा और मीरा है कोईश्याम तू बंशी बजाना छोड़ दे प्यार भी ये इक बला है मान करगीत उल्फ़त के सुनाना छोड़ दे…

  • जब से देखी है | Jab se Dekhi Hai

    जब से देखी है ( Jab se Dekhi Hai ) जब से देखी है पढ़कर ख़ुदा की किताब।छोड़ दी हम ने तब से जफ़ा की किताब। राहे ह़क़ से भटक जाओगे दोस्तो।भूल कर भी न पढ़ना अना की किताब। दिल कहीं पर भी लगता नहीं बाख़ुदा।दूर जब से हुई वो वफ़ा की किताब। औने-पौने भी…

  • खेल ये है तमाम रोटी का | Roti

    खेल ये है तमाम रोटी का ! ( Khel ye hai tamam roti ka )    सबसे ऊँचा मुक़ाम रोटी का हर कोई है गुलाम रोटी का अर्ज़ है सबके वास्ते कर दे ऐ ख़ुदा इंतज़ाम रोटी का मुफ़लिसों के लबों पे रहता है ज़िक्र बस सुब्ह ओ शाम रोटी का और कोई न कर…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *