मेरी प्यारी हिन्दी

मेरी प्यारी हिन्दी

हिंदी भाषा का गुणगान कैसे करूं,
हिंदी भाषा का बखान कैसे करूं।
अपरिभाषित है मेरी हिंदी भाषा,
परिभाषा ही नहीं परिभाषित कैसे करूं।।

सबको मान व सम्मान हिंदी देती है,
अपना नया रूप एक छोटी सी बिंदी देती है।
हलन्त, पदेन, रेफ का महत्व होता है,
गद्य पद्य के रूप नए-नए शब्द गढ़ देती है।।

हिंदी अपनी सीमा में रहने वाली भाषा है,
एकता का पाठ पढ़ने वाली हिंदी भाषा है।
झुकना सीखा और सिखाती है सारे जहां को,
मर्यादा में रहने वाली ही हमारी भाषा है।।

मर्यादा में रहने वाली, मेरा गौरव गान है,
संपूर्ण विश्व को है ये पिरोती हिंदी महान है।
घर-घर की दुलारी, जाती है यह पिचकारी,
जन-जन के हृदय में बसती,हिंदी मेरी महान है।।

प्रभात सनातनी “राज” गोंडवी
गोंडा,उत्तर प्रदेश

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