म्हारो गांव अलबेलो | Marwadi poem

म्हारो गांव अलबेलो

( Mharo gaon albelo )

 

ठंडी ठंडी भाळ चालै चालो म्हारा खेत म
काकड़िया मतीरा खास्यां बैठ बालू रेत म

 

पगडंडी उबड़ खाबड़ थोड़ा सा मत हालज्यो
गांव री गुवाड़ घूमो म्हारा चोपालां म चालज्यो

 

अलबेला है लोग अठै सगळो मस्तानो काम
मस्ती में सगळा झूमै नाचै खेजड़ली री छांव

 

सीधा-साधा मिनख बसै हेत घणो है हिवड़ा म
काळजै री कोर बसै म्हारा प्यारा जीवड़ा म

 

हरियाली सूं हरि भरी धरा घणी मुळकावै
खेतां री पाळा पलट खेत घणी घर आवै

 

धोती कुर्तो पगड़ी राखै बाबो उंँट गाड़ो
बैलगाड़ी बैल जोत्यां सागै सागै पाडो

 

मीठां मोरां री घरती अठै मीठा मीठा बोल
आव आदर होय घणेरो पलक पांवड़ा खोल

 

गीत गावै बैठ लुगायां सागै मीठी मीठी राग म
बाजरा री रोटी सागै स्वाद फळयां रा साग म

 

खलिहानां म खुशियां बरसै मस्त बाजै डोल
म्हारो प्यारो गांव अलबेलों प्यारा प्यारा बोल

 

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कवि : रमाकांत सोनी सुदर्शन

नवलगढ़ जिला झुंझुनू

( राजस्थान )

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