नरेन्द्र सोनकर की कविताएँ | Narendra Sonkar Poetry
रोटी बड़ी या देश बड़ा?
संसद गूंगी
सांसद गूंगा
न्यायालय गूंगा
न्यायाधीश गूंगा
सत्ता गूंगी
शासन गूंगा
दल-दल गूंगा
गण-गण गूंगा
बस्ती गूंगी
घर-घर गूंगा
जन-जन गूंगा
कण-कण गूंगा
धरम-करम का परचम गूंगा
पढ़ें-लिखें का दमखम गूंगा
इस देश का सिस्टम गूंगा
अशिक्षा का ग्राफ न पूछो?
महंगाई की भाप न पूछो?
बेरोज़गारी ज़िंदा डसती
छात्र लटकते हैं फांसी पर
हताशा, निराशा इतनी
खून, मांस, लोग बेचें किडनी!
नगर-सिटी क्या,
बस्ती क्या,
लोग भटकते दर-बदर
रोटी इतनी
सस्ती क्या?
किसानों-युवाओं का
बढ़ रहा नित मृत्यु-आंकड़ा
इस प्रश्न के उत्तर में
संसद ने किया प्रश्न खड़ा
रोटी बड़ी या देश बड़ा?
रोटी बड़ी या देश बड़ा?
संसद गूंगी
सांसद गूंगा
न्यायालय गूंगा
न्यायाधीश गूंगा
सत्ता गूंगी
शासन गूंगा
दल-दल गूंगा
गण-गण गूंगा
बस्ती गूंगी
घर-घर गूंगा
जन-जन गूंगा
कण-कण गूंगा
धरम-करम का परचम गूंगा
पढ़ें-लिखें का दमखम गूंगा
इस देश का सिस्टम गूंगा
अशिक्षा का ग्राफ न पूछो?
महंगाई की भाप न पूछो?
बेरोज़गारी ज़िंदा डसती
छात्र लटकते हैं फांसी पर
हताशा, निराशा इतनी —
खून, मांस, लोग बेचें किडनी!
नगर-सिटी क्या,
बस्ती क्या,
लोग भटकते दर-बदर
रोटी इतनी
सस्ती क्या?
युवाओं-किसानों का
बढ़ रहा नित मृत्यु-आंकड़ा
इस प्रश्न के उत्तर में
संसद ने किया प्रश्न खड़ा —
रोटी बड़ी या देश बड़ा?
जमाना
❝ मेरी खूबियाँ
कहीं निगल जाए न —
ईर्ष्या बनकर।
लगता डर
अब औरों से नहीं —
अपनी ही सादगी से है। ❞

नरेन्द्र सोनकर ‘कुमार सोनकरन’
नरैना,रोकड़ी,खाईं,खाईं
यमुनापार,करछना, प्रयागराज ( उत्तर प्रदेश )
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