Noche Wahi Varak

नोचे वही वरक़ | Noche Wahi Varak

नोचे वही वरक़

( Noche wahi varak )

 

बाक़ी हुरूफ़ जो ये मेरी दास्तां के हैं
अहसान यह भी मुझ पे किसी मेहरबां के हैं

रह रह के बिजलियों को है इनकी ही जुस्तजू
तिनके बहुत हसीन मेरे आशियां के हैं

क़ुर्बानियाँ शहीदों की भूले हुए हैं लोग
गुमनाम आज नाम उन्हीं पासबां के हैं

इन रहबरों ने आज वफ़ा की किताब से
नोचे वही वरक़ जो मेरी दास्तां के हैं

इन तेज़ आँधियों का चराग़ों न ग़म करो
फानूस बन के लोग खड़े आशियां के हैं

फिर मकड़ियों ने जाल बुने हैं जगह जगह
गर्दिश में अब नसीब क्या अपने मकां के हैं

हम दुश्मनों के सर को उड़ा देंगे जिस्म से
फ़रज़न्द हम भी दोस्तो हिन्दोस्तां के हैं

रौशन चराग़ कर के रहेंगे ए-सुन हवा
पाबंद हम तो आज भी अपनी ज़ुबां के हैं

साग़र चमन को दिल से जो सींचा है इसलिए
हर सू महकते फूल मेरे गुलसितां के हैं

 

कवि व शायर: विनय साग़र जायसवाल बरेली
846, शाहबाद, गोंदनी चौक
बरेली 243003
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