• सरहदें

    सरहदें कौन कहता है,सरहदों का कोई रंग नहीं होता,वो बताएँगे सरहद का रंग,जिसने इन लकीरों को बनते देखा,बहते गर्म लहू से,बनती खिंचती रेखा सरहद का रंग लाल होता हैगाढ़ा तरल लालजो बहता रहता हैगलेशियर से निकलीनदी की तरहजो कभी सूखती नहीं धर्म और भाषा का भेदबड़ा होता है, बहुत बड़ाजिसे नहीं मिटा पायागाँधी जैसा महामानव…

  • क्योंकि अधूरे ख्वाबों का जवाब नहीं होता

    ‘क्योंकि अधूरे ख्वाबों का जवाब नहीं होता’ अधूरे ख्वाबों का जवाब नहीं होता,किसी की स्वार्थपूर्ति का हिसाब नहीं होता।ज़िंदगी की राहों में चलते हैं हम,कभी खुशी तो कभी गम का सामना करते हैं हम। कभी राहों में फूल मिलते हैं,कभी काँटों से घायल होते हैं हम।फिर भी चलते रहते हैं अपनी मंज़िल की ओर,क्योंकि अधूरे…

  • संवेदना व यथार्थ : ‘अंतर्मन की यात्रा’

    संवेदना व यथार्थ हाँ, ‘दया’ मेरे कवि-हृदय का,एक महान तथा विशेष गुण है |सरलता,धैर्य तथा करुणा का धनी हूँ |‘दया’ मेरा सबसे बड़ा धर्म है |निर्मल मन को,असाधारण रूप से,शांत, स्थिर होना चाहिए |अनमोल जीवन को समझने के लिए |कवि की आवश्यकता से अधिकसम्वेदनशीलता नुकसानदायक है |मानवता, प्रेम, एकता, दया, करुणा,परोपकार, सहानुभूति, सदभावना,तथा उदारता का…

  • पुलक उठा

    पुलक उठा पुलक उठा रितुराज आते ही मन।नाप रहे धरती के पंछी गगन ।। पनघट के पंथ क्या वृक्षों की छाँवधरा पर नहीं हैं दोनों के पाँवलगा हमें अपना गोकुल सा गाँवकहा हमें सब ने ही राधा किशन।पुलक उठा –++++ प्रेम राग गाती हैं अमराइयांँउठती हैं श्वासों में अंगड़ाइयांँरास रंग करती हैं परछाइयांँभीग गया प्रेम…

  • धन्यवाद ओ सूखे दरख़्त

    राजस्थान का जो इलाका आज चमन बना हुआ है आधी शताब्दी के पहले अत्यधिक पिछड़ा हुआ क्षैत्र हुआ करता था.. मेवाड़ की भूमि पर अकाल का साया रहा करता था और लोगबाग रोजी रोटी के लिए महाराष्ट्र की और पलायन करने लगे थे। बाबूजी भी जन्म भूमि छोड़ अकोला पहुँचे और वहीँ रम गए.. अकोला…

  • सुशील चन्द्र बाजपेयी की कविताएं | Sushil Chandra Bajpai Poetry

    आकांक्षा ये भी कर लूं वो भी कर लूं,आकांक्षाएं अनगिन पाली।उधर नियति का क्रूर चक्र है,कोई बजा रहा है ताली। कर्मकाल सब है निश्चित फिर,जो भी करना, लग, कर जाओ।फल तो ऊपर वाला जाने,बस अपना कर्तव्य निभाओ। फिर भी याद रहे बस इतना,दिल ना दुखे किसी का भाई।ऐसा कोई काम करो ना…दिख जाए प्रभु की…

  • श्रीमती बसन्ती “दीपशिखा” की कविताएं | Srimati Basanti Deepshikha Poetry

    बारिश की वो भीगी यादें भीगी सड़कों पे जब पाँव पड़े,यादों की भीड़ अचानक घिर आए।हर बूँद में कोई किस्सा जगा,कुछ हँसाए, कुछ चुपचाप रुलाए। बिन कहे सब कह जाती है ये बारिश,जैसे मन के राज़ पढ़ लेती है।पिता की छाँव, माँ का सहारा,हर बूँद में अपना-सा एहसास देती है। कभी बचपन की किलकारियाँ लोरी…

  • सच्चा अमृत स्नान

    स्नानर्थियों का रेला चला आ रहा था। श्रद्धा का सैलाब था कि रुकने का नाम नहीं ले रहा था। 144 वर्ष बाद लगने वाले अमृत कुंभ की अमृत बूंद पाने के चक्कर में लोगों का उत्साह देखते ही बन रहा था। सबको यही लग रहा था कि गंगा मैया बुलाए हैं तो जरूर शरण देंगी।…

  • टेडी डे – दिकु के नाम

    टेडी डे – दिकु के नाम तेरी बाहों सा एहसास लिए,टेडी को दिल से लगा रखा है।तेरी यादों की ख़ुशबू संग,हर लम्हा इसमें बसा रखा है। रुई सा कोमल, प्यार सा प्यारा,तेरे जैसी मासूमियत समेटे,रहती है इसमें मेरे मन की बातें,तेरी यादें धागों की तरह मुझको है लपेटे। दिकु, तू जो होती यहां,टेडी की जगह…

  • ज़फ़रुद्दीन ज़फ़र की ग़ज़लें | Zafaruddin Zafar Poetry

    “नभ में बिछड़ा सपना” ✈️ उड़ा था एक सपना आसमान की ओर,उम्मीदों से भरा, मुस्कानों का संजोर।अहमदाबाद से लंदन की थी राह,किंतु विधि ने रच दिया दुखों की चाह। हवा में था विश्वास, प्रगति की बात,किंतु पल में टूटा सब, हो गई रात।धुएं के गुबार में छुप गया जहान,जलते हुए आकाश में बुझ गई पहचान।…