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TheSahitya – द साहित्य
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TheSahitya – द साहित्य
  • राजनीतिक घृणा
    आलेख

    राजनीतिक घृणा मूक जीवों पर कहर ढा रही है

    ByAdmin February 3, 2025February 3, 2025

    आज यह फ़िल्म देख कर मन उदास हो गया.. मन के भीतर कही गहरे में खून के आंसू रोने की इच्छा हो रही है.. उफ कितने गिर गए हैं हम.. उफ कितनी हीन मानसिकता से भर गए हैं हम.. बदला लेना चाहते हैं.. सामने वाले को नीचा दिखाना चाहते हैं.. मगर किस स्तर पर..? किसी…

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  • Dr. Chander Datt  Sharma Poetry
    कविताएँ

    डॉ. चंद्र दत्त शर्मा की कविताएं | Dr. Chander Datt  Sharma Poetry

    ByAdmin February 3, 2025May 29, 2025

    रक्तदान – रागनी तरज मानी नी माई मुंडेर… रक्तदान तै बड़ा दान ना, सबने न्यूं समझा दयो।18 वर्ष की उम्र हुवे जब परोपकार मैं ला दयो ।।भाइयों रै, सजनों रै…. भाइयों रै, सजनों रै….। आदमी का दुनिया मैं ना सदा एक-सा बख्त होवैघायल हो या कोए बीमारी संजीवनी यू रक्त होवैबख्त होवै जब काम आण…

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  • Dr. Sunita Sharma Sudha
    कविताएँ

    डॉ. सुनीता सिंह ‘सुधा’ की रचनाएँ | Dr. Sunita Singh Sudha Poetry

    ByAdmin February 3, 2025August 27, 2025

    गणेश पूजन है! श्री गणेशाय नमःछंद-मनहरण घनाक्षरी शिव शक्ति के हैं प्यारे, जगत भर में न्यारे,गजानन गणेश को,हमारा नमन है ! गणपति सुखकर्ता, भव बाधा सब हर्ता,एकदंत चरणों में,सदैव वंदन है ! रिद्धि सिद्धि के है पति, देते सबको सन्मति,बुद्धि यश प्रदाता वो,पार्वती नंदन है ! प्रतिदिन सेवा करूँ , वियानक का ध्यान धरुँ,कामिनी करती नित,गणेश…

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  • शारदे
    गीत

    वंदना माँ शारदे की

    ByAdmin February 2, 2025February 2, 2025

    वंदना माँ शारदे की कुछ ऐसा प्रखर प्रकाश हुआ ।जगमग सारा आकाश हुआ ।। उर में आंनदित लहर उठी ,बह रही सुरभि भी कल्याणी ।क्या उतर रही है शिखरों से ,अब श्वेत कमल वीणापाणी ।सुरभित कुसमित है भूमंडल,नख शिख तक यह आभास हुआ ।।जगमग——- छँट जायेगी हर आँगन से ,तम की छाया काली-काली ।पुलकित होगी…

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  • मॉं शारदे
    कविताएँ

    मॉं शारदे, विद्या, विवेक मान दो

    ByAdmin February 2, 2025February 2, 2025

    मॉं शारदे, विद्या, विवेक मान दो माँ शारदे, विद्या विवेक मान दो,मुझे सुर साम्राज्ञी जैसी तान दो।मेरा वाचन दिव्यमयी हितकारी हो,माँ शारदे, ब्रह्माणी ये वरदान दो।टेक। मेरे सिर-माथे वरद हस्त रख दो,सुमन शब्द-अक्षर ज्ञान-मख दो।प्रतिभा स्वयं,पर अल्पज्ञ मूरख हूँमाँ-कल्याणकारी शुभम कर दो ।पूजा अर्चन करूॅ तेरी आराधना,नारियाँ हों सशक्त,स्वाभिमान दो।माँ शारदे विद्या विवेक मान दो,मुझे…

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  • मां सरस्वती
    कविताएँ

    श्रुत स्तुति | सरस्वती वंदना

    ByAdmin February 2, 2025February 2, 2025

    श्रुत स्तुति ( सरस्वती वंदना ) वीतरागी सर्वज्ञ और हितोपदेशी जो तीर्थंकर हैं,अष्ट कर्मों और अठारह दोषों से रहित जिनेश्वर हैं,अनंत चतुष्टय के धारी हैं अनंत कैवल्य ज्ञानी हैं,ऐसे त्रिकालदर्शी जिनमुख से झरती वाणी श्रेयस्कर है!! सरस्वती कहो या श्रुतमाता एक दूजे के पर्याय कहाएं,जैन धर्म में देव शास्त्र गुरु भव्य जनों को मोक्षमार्ग दिखाएं…

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  • Avnish Kumar Gupta Poetry
    कविताएँ

    अवनीश कुमार गुप्ता ‘निर्द्वंद’ की कविताएं | Avnish Kumar Gupta Poetry

    ByAdmin February 2, 2025August 18, 2025

    बरखा की गोद में सोती संध्या घन गगन में गूँज रही बादल की मंद पुकार,धरती के आँगन में झर-झर मोती की बौछार। सूरज की लाली थककर पथ से धीरे खो जाए,बूँदों की चादर में संध्या चुपके सो जाए। पीपल की डाली से टपके मोती-से आँसू,भीगती हवाओं में छुप जाए दिन का मानसू। दीपक की लौ…

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  • सुमंगला सुमन की कविताएं
    ग़ज़ल

    सुमंगला सुमन की ग़ज़लें | Sumangla Suman Poetry

    ByAdmin February 2, 2025May 22, 2025

    न कोई सफ़र, न किनारा मिला न कोई सफ़र, न किनारा मिलाहमें डूबने का इशारा मिला हवा साथ थी, फिर भी ठहरे रहेमुहब्बत में ना कुछ सहारा मिला कभी ख़्वाब लहरों पे लिखते रहेलिखा जो नहीं था, दुबारा मिला हमें ख़ार समझा था फूलों ने जबफ़िज़ा से वही फिर इशारा मिला भटकती रही कश्ती दरिया…

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  • बुलावा माँ का
    ग़ज़ल

    बुलावा माँ का

    ByAdmin February 1, 2025February 1, 2025

    बुलावा माँ का कहाँ पिकनिक मनाने को वो नैनीताल जाता है, बुलावा माँ का आये तो वहां हर साल जाता है, खुले बाज़ार में जबसे बड़े ये मॉल हैं यारों, दुकानों से कहाँ फिर कोई लेने माल जाता है, बहुत तारीफ करता है सभी से माँ की तू अपने, मगर कब पूछने तू अपनी माँ…

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  • संजीव सलिल की कविताएं
    कविताएँ

    संजीव सलिल की कविताएं | Sanjeev Salil Poetry

    ByAdmin February 1, 2025July 22, 2025

    सेमल अनुभूति की मिट्टी मेंविचारों के बीजसंवेदना का पानी पीकरफूले न समाए।फट गया कठोरता काकृत्रिम आवरण,सृजन के अंकुरपैर जमाकर मुस्काए।संकल्प की जड़ेंजमीं में जमीँ,प्रयास के पल्लव हरियाए।गगन चूमने को आतुरतना तना औरशाखाओं ने हाथ फैलाए।सूर्य की तपिश झेलीपवन संग करी अठखेलीचाँदनी संग आँख मिचौलीचाँद संग खिलखिलाए।कभी सब्जी बन मिटाई क्षुधाकभी चर्म रोग मिटाएघटाकर बढ़ती उम्र…

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