पैसों की जुबा सुनलो

पैसों की जुबा सुनलो | Kavita paison ki zuban

पैसों की जुबा सुनलो

( Paison ki zuban sunlo )

 

 

हर बार कसूर क्यों
मुझ पर ठहराते हो?
मेरे लिए क्यों इंसान
अपनों से अलग हो जाते हो ?

 

मैं आज हुँ कल नहीं
फिर क्यों इतना इतराते हो ?
मेरी मामूली किमत
रिश्तों से क्यों लगाते हो ?

 

तुम्हारी बेमतलब की चाह के
हेतु अपना मान क्यों गवाते हो ?
मेरा तोल लवण जैसा फिर क्यों
हकीकत से अंजान बने रह जाते हो?

 

माना की मैं जरूरी हुँ जीवन में,पर क्यों
सबसे किमती माँ बाप मुंह मोड जाते हो ?
मैंने तो तुम्हें उठाया है, क्यों बरसो का दिया
सहारा कुछ क्षण भर में गवाते हो ?

 

❣️

लेखक : दिनेश कुमावत

( सुरत गुजरात )

 

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