Kavita Parimarjak Prakriti

परिमार्जक प्रकृति | Kavita Parimarjak Prakriti

परिमार्जक प्रकृति

 

चलायमान सृष्टि को

 गौर से देखो कभी

 मंद -मंद सुरभित बयार,

 सभी को प्राण वायु से भरती

 दिनकर की प्रखर रश्मियांँ

 सृष्टि को जीवंतता प्रदान करती ।

चढ़ते, उतरते चांँद से

 शीतलता,

मृदुलता की शुभ वृष्टि,

 हरी – भरी वसुंधरा जो

सभी का पोषण है करती

रंग-बिरंगे पांँखी,

 मधुर तान सी छेड़ जाते

 धरा में सृजन के

बीच बिखरा के

 अपना कर्तव्य हैं निभाते ।

अवनि से तपन खींच

आर्द्र कणों में समेट

  घने- घने मतवाले बादल

 निरंतर जलचक्र बना,

 जग पर छाते

प्यासी विकल धरा,

जीवन को

झर-झर झरती बूंँदों से

 तृप्त कर जाते ।

प्रकृति को जब भी

गौर से देखा

 उससे सिर्फ देना और

 देना ही सीखा

 प्रकृति से जाना

 निरंतर दाता भाव से,

सृष्टि निर्माण ,पालन

 और संचालन का

नित्य अद्भुत तरीका ।

जीवन जब-जब हर्षाया

सिर्फ यही समझ में आया

देने में जो सुख है ,

पाने में कब पाया

आज का सुविधाभोगी मानव

 यह राज कहांँ समझ पाया ।

प्रकृति पर कहर ढा कर

अपनी सुविधाओं को सजाया

 पेड़ ,जंगल काटे, कंक्रीट बढ़ाया

 पक्षियों के घोसलों पर कहर बरपाया

 जल,वायु,धरा,आकाश सभी जगह

 रसायनों विषैले पदार्थों को मिलाया ।

कचरा तो साफ हुआ नहीं

 अब मोबाइल, नए गैजेट्स

 इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों ने,

 ई-वेस्ट का खतरा भी बढ़ाया

 प्रकृति से खिलवाड़ कर के जनजीवन

 नैसर्गिक से असमान्य बनाया!

जिस प्रकृति से सब कुछ मिलता है

उसकी तरफ हमारा

बड़ा फर्ज है ।

जिन नदियों ने धरा

 व तन- मन में

प्रवाहित हो,

जीवन संचालित किया

व्यवसायीकरण एवं

 गंदगी के पुजारी ,

स्वार्थी मानव ने

उन्हें भी डुबाने का

काम कर दिया ।

 सृष्टि पर जो सुंदर रुप है

इसी जीवनदायनी

 प्रकृति का स्वरुप है

सिर्फ पाने का इच्छुक

मानव करता उसे विद्रूप है

कब मानव पर्यावरण के

प्रति जागरूक होगा

फिर से वातावरण,

सुरम्य, शुद्ध

 नैसर्गिक,प्रदूषण मुक्त होगा।

@अनुपमा अनुश्री

( साहित्यकार, कवयित्री, रेडियो-टीवी एंकर, समाजसेवी )

भोपाल, मध्य प्रदेश

 aarambhanushree576@gmail.com

यह भी पढ़ें :-

बात उस चांँद की है | Baat us chand ki

Similar Posts

  • होकर उल्लू पर सवार

    होकर उल्लू पर सवार होकर उल्लू पर सवार ,चली लक्ष्मी हर घर-द्वार। यश, धन की करने बरसात,अनिल मंद स्वर गाए मल्हार । सोने का रथ,रजत पालकी,रथ पर हुए कुबेर सवार । ऋद्धि-सिद्धि व बुद्धि प्रदाता ,संग गणेश हैं , दीप आधार। मन भावन प्रिय लगे सुरुचिकर,दीपावली, धनतेरस त्यौहार। जीवन में शुभ-लाभ है छाया ,दीप जले…

  • तब होगी मेरे मन में हरियाली | Man mein Hariyali

    तब होगी मेरे मन में हरियाली ( Tab hogi mere man mein hariyali )    घर-परिवार रहें सुखी और सम्पन्न, रहें आशीष भगवान ‌का सभी पर। प्रेम महोब्बत से रहें हम सारे लोग, कलह कलेश कोई रहें न धरा पर। तब होगी मैरे मन में हरियाली।। बीज-बुवाई सभी खेतों में हो जाएं, बारिश होकर फ़सल…

  • विद्या शंकर विद्यार्थी की कविताएं

    गीत चैती छठ के केकर कटोरवा अब खाली बाटे होभरल अंखिया में लोरमारेला रूखनिया करेजवा में होदरद उठेला पुरजोर, केकर,,,,,। निर्धन कटोरवा अब खालि बाटेभरल अंखिया में लोरमारेला रूखनिया महंगिया नू होदरद उठेला पुरजोर, केकर,,,,। आदितमल गोसंईया मनाई कइसे होछठिया करे जाई घाटछठी माई से दुखवा बताई कइसे होगड़ल गोड़वा में कांट, केकर ,,,,,। भला…

  • तस्वीरें भी कुछ कहती हैं

    तस्वीरें भी कुछ कहती हैं   आज मेरे सामने एक तस्वीर नहीं , अनेकों तस्वीरें पड़ी हैं  | अपनी – अपनी व्यथा , दुख और दर्द को लेकर खड़ी हैं | ? आज माँ की तस्वीर को देखा , जो नम आँखों से मुझे देख रहीं थीं , आपनी ममता और स्नेह से दुलार रहीं…

  • मेरा अस्तित्व | Kavita Mera Astitva

    मेरा अस्तित्व ( Mera Astitva ) क्या मेरे अस्तित्व के कोई मायने रहेंगे ? अगर मैं उतार भी दूं चेहरे पर से चेहरा मेरे स्वयं का अस्तित्व ही पिघल जायेगा और—- मैं अनाम हो जाऊँगी तेज झंझावतों में उठे धूलकणों की तरह हो चुका होगा जर्जर मेरा अंग-प्रत्यंग मेरा वर्ण धीमा हो जायेगा चेहरा, चेहरा…

  • मदिरालय | Madiralay par Kavita

    मदिरालय ( Madiralay )    पड़ा धुत नशे में राही मदिरालय को जाता। लड़खड़ाती जिंदगी है समझ नहीं वो पाता। मय प्याला हाथों में छलके जामो पे जाम। ये कैसी दीवानगी छाई घर हो जाए नीलाम। बेखुदी में रह बेसुध है मधुशाला को जाए। पीने वाले पी रहे हैं हाला हाला मद भाए। सोमरस सुधारस…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *