पशीना

पसीना | Paseena par kavita

पसीना ( Paseena ) 

 

चाहे हो ऋतुराज अथवा सरस सावन का महीना।

रक्त जलता है तब बनता है पसीना ।।

स्वेद रस में सनके ही रोटी बनी है।

ये भवन अट्टालिका चोटी बनी है।

वो कुटज में रहता है थक-हार कर।

खाली पेट सो गया मन मार कर।

रिक्शे की पहिये से पूछो कितना पीती है पसीना।।

                                              रक्त जलता है०

चीर कर धरती की छाती अन्न उपजाता है वह।

पर सारा तुम छीन लेते कितना का रख पाता है वह।

पत्थरों को तोड़ कर मोम बनाता है वह।

हाय उसी खान में दब करके मर जाता है वह।

जोंक धनपशु अनचारी भला क्या जाने पसीना।।

                                        रक्त जलता है०

निर्धनता धनता जगत ब्यवहार है ।

सूर्य शेष अंधेरे पर ही वार है।

पशीना वंचन बड़ा अभिशाप है।

इससे बढ़कर भी क्या कोई पाप है।

ब्लड बैंक तो मिल भी जाते पर कहां मिलता पसीना।।

                                                   रक्त जलता है ०

 

लेखक: शेष मणि शर्मा “इलाहाबादी”
प्रा०वि०-बहेरा वि खं-महोली,
जनपद सीतापुर ( उत्तर प्रदेश।)

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