पायल | Payal kavita

पायल

( Payal )

 

कहीं सीमा का बंधन देखो
कहीं रात अलबेली है
पैरों की पायल है मेरी
या जंजीर की बेडी है

 

रुके रुके कदमों से देखो
अठखेली ये करती है
रुनझुन रुनझुन करते करते
सांझ सलोनी कटती है

 

छम छम करता बचपन बीता
झनक झनक करते यौवन
छनक छनक सी बीती उमरिया
खनक खनक बरसे बादल

 

एक पायल बाबुल घर देखी
एक पायल मिली पिया घर
एक पहनाई नन्ही गुड़िया को
खेली जो फिर मेरे आंगन

 

ताल स्वर पर गूंज उठे जो
कोयली जैसी तान सुनाये
धनक धनक कर बजती हैं जो
शांत हृदय को पल पल हर्षाय

 

मन मयूर सा बन जाता है
उड उड गगन तक जाता है
पायल मेरी पाँव में देखो
सीमा मेरी बतलाता है

 

बाबुल ने तो शौंक में डाली
पिया जी ने अलंकार सजाया
दुनिया ने बंधन है माना
मैने मौन धर कर स्वीकारा

 

पर पायल के घुघरू मुझको
बहुत अधिक भा जाते है
भीग बारिश की बूदों में
अपना मुझे बनाते है

 

मेरी सदा रही बेडिया
बिटिया की ना बनने दूंगी
गगन छूने की असीम उमगें
ये गिरहे धीरे धीरे खोलूंगी

☘️☘️


डॉ. अलका अरोड़ा
“लेखिका एवं थिएटर आर्टिस्ट”
प्रोफेसर – बी एफ आई टी देहरादून

यह भी पढ़ें :-

माँ | Maa

 


Posted

in

by

Comments

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *