Poem in Hindi on kasak

कसक | Poem in Hindi on kasak

कसक

( Kasak )

रौशनी की तलाश में हम बहुत दूर निकल आये
जहाँ तक निग़ाह गई बस अन्धेरे ही नजर आये

जिन्दगी ने हमें दिया क्या और लिया क्या
सोच के वक्त के हिसाब आँसू निकल आये

कसक दिल में रहती है अपनो को पाने की
समझ  नहीं  आता अपना किसे कहा जाये

अपनो  में  छिपे  बेगानों  को  देखकर
लगता  है  बस अब साँसे ही थम जायें

थक  गई  हूँ  जिन्दगी  के अकेले सफर में
ऐ -काश वक्त की ये रफ्तार ही ठहर जाये

जाना है बहुत दूर मंजिल का निशाँ कोई नहीं
इस बेनिशां सफर में कोई जाये तो कहाँ जाये

 

माहेनाज़ जहाँ ‘नाज़’
( नई दिल्ली )

यह भी पढ़ें :-

हे नारी तुझे नमन | Kavita he nari

Similar Posts

  • प्यार की कश्ती | Poem Pyar ki Kashti

    प्यार की कश्ती ( Pyar Ki Kashti )   शाम सलोनी भी लौटा दो। सागर की लहरें लौटा दो। कश्ती में जो गुजरी रातें, वो मीठी करवट लौटा दो। कोरे कागज पे जो लिखा , सारी मेरी ख़त लौटा दो। भींगे थे हम जिस सावन में, वो मेरा सावन लौटा दो। शोहरत,दौलत तुम रख लो,…

  • निद्रा

    निद्रा     शांत क्लांत सुखांत सी पुरजोर निद्रा। धरती हो या गगन हो हर ओर निद्रा।।   विरह निद्रा मिलन निद्रा सृष्टि निद्रा प्रलय निद्रा, गद्य निद्रा पद्य निद्रा पृथक निद्रा विलय निद्रा, आलसी को दिखती है चहुंओर निद्रा।।धरती०   सुख भी सोवे दुख भी सोवै सोना जग का सार है, सोना ही तो…

  • संसार | Sansar par Kavita

    संसार ( Sansar )  ईश्वर तेरे संसार का बदल रहा है रूप-रंग, देख सब हैं चकित और दंग। क्षीण हो रहा है वनों का आकार, जीवों में भी दिख रहा बदला व्यवहार। कुछ लुप्त भी हो रहे हैं, ग्लेशियर पिघल रहे हैं। वायु हुआ है दूषित, विषैले गैसों की मात्रा बढ़ी है अनुचित। समझ नहीं…

  • अज़ान | Poem on Azaan in Hindi

    अज़ान ( Azaan ) *****   मोमिनों की शान खुदा का फरमान बुलावे की कलाम होती पांच वक्त अज़ान। जब हो जाए नमाज़-ए-वक्त, मुअज्जिन लगाते- आवाज़ -ए- हक़। सुन नमाज़ी दौड़ पड़ते- मस्जिदों की ओर, कुछ नहीं भी पढ़ते दिखाकर अपनी बीमारी कामों की फेहरिस्त और व्यस्तताओं का हवाला दे करते हैं इग्नोर । अभी…

  • मित्र कहां तक छुपोगे | Mitra Kahan tak

    मित्र कहां तक छुपोगे ( Mitra kahan tak chupoge)  लेखन की सुंदर वाटिका में, मित्र कहां तक छुपोगे। कब तक आंख मिचौली खेलोगे। हम भवरे हैं एक कली के, मंडराते हुए कभी मंच में,। कभी कविताओं में, कभी आमंत्रित करोगे कविता की चार पंक्ति में। कभी कविता के मंच में, कभी अनुभवों में, तो कभी…

  • हाथरस की भीड़ में

    हाथरस की भीड़ में हाथरस की भीड़, में शून्य हुआ जीवन रस अंधविश्वासी बनकर बाबा के दरबार में मैं तो नत मस्तक करने गई थी। अपनों के पास पहुंचने से पहले मैं बाबा धाम पहुंच चुकी थी। सुलझाने कुछ समस्या उलझन में सांसे फस गई थी अंधविश्वासी बनकर मैं तो बाबा के दरबार में गई…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *