संसार | Sansar par Kavita

संसार

( Sansar ) 

ईश्वर तेरे संसार का बदल रहा है रूप-रंग,
देख सब हैं चकित और दंग।
क्षीण हो रहा है वनों का आकार,
जीवों में भी दिख रहा बदला व्यवहार।
कुछ लुप्त भी हो रहे हैं,
ग्लेशियर पिघल रहे हैं।
वायु हुआ है दूषित,
विषैले गैसों की मात्रा बढ़ी है अनुचित।
समझ नहीं आ रहा मानव का व्यवहार,
चहुंओर सुनाई दे रही बेटियों की चीत्कार।
गरीबों के यहां मची है हाहाकार,
धनी दरवाजे से दे रहे उन्हें दुत्कार।
खत्म हो गई है भावना सहकार की,
रिश्तों में भी दिख रही कूटनीति व्यापार की।
आपसी भाईचारा व सद्भाव हुआ है मलिन,
दंगाइयों का चेहरा हुआ है हसीन।
आदमी अब आदमी न रहा!
मशीन हो गया है,
दूसरे के बटन दबाने पर ही आॅन हो रहा है।
धीरज धैर्य और स्वविवेक समाप्त हो गया है,
कुछ ऐसी ही स्थिति धरा पर व्याप्त हो गया है।
हे ईश्वर!
क्या रूष्ट हो गए हैं मानवों के व्यवहार से?
या मोह भंग हो गया है आपका संसार से!
सुधारने का कुछ जतन कीजिए,
वरना अब पतन ही बुझीए !

ईश्वर तेरे संसार का बदल रहा है रूप-रंग,
देख हैं सभी चकित और दंग।

 

नवाब मंजूर

लेखक– मो.मंजूर आलम उर्फ नवाब मंजूर

सलेमपुर, छपरा, बिहार ।

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