Poem on sun in Hindi

प्यारा भास्कर | Poem on sun in Hindi

प्यारा भास्कर

( Pyara bhaskar )

 

रोज़ाना निकलता आसमान चीरकर,
अंधेरा मिटाता आता प्यारा भास्कर।
ख़ुश होते सब सूर्य नारायण देखकर,
वन्दना करों सूरज को जल चढ़ाकर।।

देता सारे जग को प्रकाश, उजियारा,
हर लेता यह सारे ब्रह्मांड का अंधेरा।
प्यारी- प्यारी भोर लगे बहुत निराली,
सवेरे सवेरे सुहानी लगती यह लाली।।

नदियों का जल रंग जाता इस रंग में,
लहरें भी घुल जाती ये भगवा रंग में।
सिखाती है आपस में मिलकर रहना,
पक्षियों का उड़ना और रहना संग में।।

रोज़ नया भोर सब को सीखा जाता,
समय से आना जाना सबको करना।
समय को जिसने भी लिया है काम,
आज वही इंसान किया अपना नाम।।

जलवायु प्रकृति स्वच्छ रखो निरन्तर,
फिर देखें प्रकृति को हॅंसेगी खुलकर।
करों सब लोग योग व सूर्य नमस्कार,
व आपस में रहो सभी एक मिलकर।।

 

रचनाकार : गणपत लाल उदय
अजमेर ( राजस्थान )

यह भी पढ़ें :-

अजमेर | Ajmer par kavita

 

Similar Posts

  • कोई ऐसी गजल लिखूं | Poem Koi aisi Ghazal likhoon

    कोई ऐसी गजल लिखूं ( Koi aisi ghazal likhoon )    कोई ऐसी गजल लिखूं, वो प्रेम सितारा हो जाए। अपनापन अनमोल बरसे, नेह की धारा हो जाए। रच लूं सुंदर गीत सुरीला, नगमा ये प्यारा हो जाए। रस में भीगे शब्द मोहक, हसीं काव्यधारा हो जाए। दोहा मुक्तक छंद सोरठा, सवैया भी सारा हो…

  • औरत समपर्ण है | Aurat Samarpan Hai

    औरत समपर्ण है ( Aurat Samarpan Hai )   औरत को एक जन्म में समझना चाहते हो ग़लत फ़हमी में हो औरत को समझने के लिये एक जन्म नहीं, कई जन्म चाहिए औरत का दिल समन्दर की तरह है मोम की तरह है, पत्थर की तरह है औरत समपर्ण है आकर्षण है पारे जैसा दर्पण…

  • मैं अकेला | Kavita Main Akela

    मैं अकेला ( Main Akela ) अकेला हूँ पर अकेला नहीं मेरे साथ है तारो भरी रात चाँद की चाँदनी मुहँ पर आई झुर्रियां माथे पर पड़ी सकीन एक सुनसान रात में जब बिस्तर पर होता हूँ। घड़ी की सुईयों की आवाज भयभीत कर देती है मुझे झाड़ि‌यों की झुण्ड की छाँव आवारा पशुओं की…

  • नया साल | Poem Naya Saal

    नया साल ( Naya Saal )     सर्द सी इस शाम में सोचा कुछ तेरे नाम लिख दूँ…..   शायद लफ्ज़ों की गर्मी से पिघल जाये जमी है जो बर्फ तेरे मेरे दरमियां   गिले शिकवे जो हो ‘ गर चले जायें साथ ही जाते हुये साल के….   क्यों न आगाज़ करें इक…

  • छाया है पिता

    छाया है पिता बरगद की घनी छाया है पिताछाँव में उसके भूलता हर दर्द। पिता करता नहीं दिखावा कोईआँसू छिपाता अन्तर में अपने।तोड़ता पत्थर दोपहर में भी वोचाहता पूरे हों अपनों के सपने।बरगद की घनी छाया है पिताछाँव में उसके भूलता हर दर्द। भगवान का परम आशीर्वाद हैपिता जीवन की इक सौगात है।जिनके सिर पे…

  • याद न आये, बीते दिनों की

    याद न आये, बीते दिनों की बैठी हूँ नील अम्बर के तलेअपनी स्मृतियों की चादर को ओढेजैसे हरी-भरी वादियों के नीचेएक मनमोहक घटा छा जाती हैमन में एक लहर-सी उठ जाती है।जैसे कोई नर्म घास के बिछौनों परकोई मन्द पवन गुजर जाती हैदेखकर प्रकृति नटी के इस रूप मेंबचपन में की गई शरारतेंफिर से आंखों…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *