Poem on zindagi in Hindi

जिन्दगी का गुलिस्तां | Poem on zindagi in Hindi

जिन्दगी का गुलिस्तां !

( Zindagi ka gulistan ) 

 

झुकता है आसमां भी झुकाकर तो देखो,
रूठने वाले को तू मनाकर तो देखो।
प्यार में होती है देखो ! बेहिसाब ताकत,
एक बार जीवन में अपनाकर तो डेखो।

 

सिर्फ दौलत ही नहीं सब कुछ संसार में,
किसी गरीब का आंसू पोंछकर तो देखो।
दुनिया की किसी हाट में खुशी बिकती नहीं,
बुजुर्गों की दुवाएँ आप लेकर तो देखो।

 

संवर जाएगा आपकी जिन्दगी का गुलिस्तां,
कुदरत से उसका रंग चुराकर तो देखो।
राजगुरु, सुखदेव, भगत अपनी जान लुटाये,
वतन की खातिर खुद को लुटाकर तो देखो।

 

सियासी अदावत से नहीं बन सका महाशक्ति,
इस तरह की नफ़रत आप जलाकर तो देखो।
अपनी ही बेहयाई पर खिलखिलाते यहाँ कुछ,
उन्हें सच का आईना दिखाकर तो देखो।

 

जो हताश, निराश हुए हैं अपनी जिन्दगी से,
ऐसे लोगों का हौसला बढ़ाकर तो देखो।
मशीन -सी बना ली है आपने ये जिन्दगी,
समंदर से कुछ लम्हें चुराकर तो देखो।

 

उदास हुए आजकल दरख्त अपने साये से,
खामोश वादियों को गले लगाकर तो देखो।
चाँद पर जब बस्ती बसेगी, तब बसेगी,
दुश्मनी की बीमारी मिटाकर तो देखो।

 

रामकेश एम यादव (कवि, साहित्यकार)
( मुंबई )
यह भी पढ़ें:-

अब रहते नहीं परिन्दे | Poem on parindey

 

 

Similar Posts

  • चतुर्दश मणि रत्न अनूप | Chaturdash Mani Ratna Anup

    चतुर्दश मणि रत्न अनूप ( Chaturdash Mani Ratna Anup )    स्वर्गलोक वैभव ऐश्वर्य हीन, महर्षि दुर्वासा ऋषि शाप । संकट समाधान देव अनुनय, विष्णु सानिध्य विमुक्त संताप । परम सुझाव नीर निधि विलोड़न, श्री हरि दैविक कृपा स्पंदन से । चतुर्दश मणि रत्न अनूप,जलधि सुधा मंथन से ।। देवगण असुर वासुकि नाग संग, मंदार…

  • सफलता | Safalta

    सफलता ( Safalta )    उनको आज कल,  एक ही धुन सवार है,  चाहे कुछ भी करना पड़े , परंतु सफलता पाकर रहूंगा । इस सफलता को पाने के लिए, उन्होंने त्याग दिए घर बार , दोस्ती यारी को भी भुला दिया,  मशीनों की तरह , सोचना छोड़ दिया है,  सामाजिक रिश्तों के बारे में…

  • दलित | Dalit

    दलित ( Dalit ) वो हिंदू थे न मुसलमानवो थे मेहनतकश इंसानवो कहीं बाहर से नहीं आए थेवो मूलनिवासी थेवो आदिवासी थे वो जुलाहा थे बंजारा थेवो भंगी थे तेली थेवो धोबी थे कुर्मी थेवो कोरी थे खटीक थेवो लुहार थे सुनार थेवो चर्मकार थे महार थेवो मल्लाह थे कुम्हार थे ब्राह्मण कहते थे:वे शुद्र…

  • कविता की हूंकार | Poem on kavita ki hunkar

    कविता की हूंकार ( Kavita ki hunkar )   कलमकार कलम के पुजारी लोग कवि कहते हैं सुधारस बहाते कविता का छाये दिलों में रहते हैं   लेखनी ले कवि हाथों में ओज भरती हुंकार लिखे मां भारती का वंदन भारतमाता की जयकार लिखें   वंदे मातरम वंदे मातरम गीत लिखते हम वीरों के शीश…

  • शिक्षित बनो संगठित रहो संघर्ष करो | Baba Saheb Ambedkar par Kavita

    शिक्षित बनो संगठित रहो संघर्ष करो ( Shikshit bano sangathit raho sangharsh karo )   भारत-वर्ष को देकर गयें है वो बाबा संविधान, युगों-युगों तक याद करेंगा आपकों हिंदुस्तान। सबसे अलग वो कर गुज़रें रचा ऐसा इतिहास, हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई पहलें आप इन्सान। ऊॅंच नीच व जाति धर्म का किया सदा विरोध, करतें रहें…

  • कहाँ थे पहले?

    कहाँ थे पहले? खिड़की के हिलते पर्दों के पासतुम्हारी परछाईं नज़र आती हैकाश !तुम होते –ख़यालों में, कल्पनाओं मेंकितने रंग उभरते हैंदूर कहीं अतीत कीझील में डूब जाते हैंकभी लगता है, स्वप्न देख रही हूँकभी लगता है जाग रही हूँ यह बोझिल सन्नाटा, यादों का तूफ़ान,तुम्हारे ख़यालों की चुभती लहरें,मेरे भीतर कहीं टूटती, बिखरती,एक अनकही…

One Comment

  1. आदरणीय रामकेश जी,
    आपने जीवन व देश दुनिया की सच्चाई और अनुभव को बेहतरीन तरीक़े से सार्थक रूप में लिखा है।
    बहुत बहुत बधाई व शुभकामनाएँ।
    🌺🌺🙏🙏

Leave a Reply to शांतिलाल सोनी Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *