Poem Sagar ki Lahren

सागर की लहरें यूं कहती | Poem Sagar ki Lahren

सागर की लहरें यूं कहती

( Sagar ki lahren yoon kahati ) 

 

सागर की लहरें उठती मन में जोश नया जगाती है
जलधारा मानस पटल शीतल आभास कराती है
हिलोरे भरता जब समंदर सागर की लहरे गाती है
बढ़ते रहना अपनी मौज में बूंद बूंद छलकाती है
सागर की लहरें उठती

दयासागर कृपासागर करुणा सागर सुख हो विशाल
सिंधु की लहरें कहती हमको प्रेम का हम बने रसाल
अंबुज जल राशि विपुल नीर धाराएं अथाह जाती है
जलनिधि नाथ जलेश मिलन सरिताएं दौड़ी आती है
सागर की लहरें उठती

खारा होकर भी विशालता हो यही बड़ों का धर्म है
दुख भुगत कर भी सुख बांटे परोपकार का मर्म है
हिम्मत हौसला जोश भरो जलधि लहरें मुस्काती है
रत्नाकर सुखसागर मोती लहरें गीत प्रेम के गाती है
सागर की लहरें उठती

 

कवि : रमाकांत सोनी

नवलगढ़ जिला झुंझुनू

( राजस्थान )

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