Poem shabdon ka safar

शब्दों का सफर | Poem shabdon ka safar

शब्दों का सफर

( Shabdon ka safar )

 

शिकस्त

शिकस्त कर देंगे मंसूबे हम अपने प्यार से।
कह देंगे राज सारे आज अपने दिलदार से।
दुश्मनों से कह दो आंखें खोलकर देखें जरा।
तूफानों में पलने वाले डरते नहीं तलवार से।

 

चौबारा

घर का आंगन दीवारें वो चौबारा भी गाता है
बिटिया आंगन की तुलसी आओ तुम्हें बुलाता है
बाबूजी का लाड प्यार वो मां की सीख भरी बातें
बहन भाई की अठखेली हंसी सुहानी वो रातें

 

मासूम

मासूम मुस्कान प्यारी मन में उमंग जगाती
खुशियां बरसे घर में नन्ही किलकारी आती
नन्ना बालक मंद मंद मुस्काता अपनी मौज में
खिल जाते मुखमंडल चेहरों पर रौनक आती

 

कयामत

कयामत तक साथ निभाने का हम वादा करते हैं।
हमसफर जिंदगी में प्यार हद से ज्यादा करते हैं।
महकती है सांसे दिल की वादियों में बहारें आती।
खुशियों से झूम झूम हम जीवन में कदम धरते हैं।

 ?

कवि : रमाकांत सोनी सुदर्शन

नवलगढ़ जिला झुंझुनू

( राजस्थान )

यह भी पढ़ें :-

पलके अपनी खोल प्रभु | Poem palke apni khol prabhu

Similar Posts

  • गीतों को सौगात समझना | Poem geeton ko saugaat samajhna

    गीतों को सौगात समझना ( Geeton ko saugaat samajhna )   काव्य भावों को समझ सको तो हर बात समझना मैंने लिखे हैं गीत नए गीतों को सौगात समझना   दिल का दर्द बयां करते उर बहती भावधारा मधुर तराने प्यारे-प्यारे हर्षित हो सदन सारा   शब्द शब्द मोती से झरते बनकर चेहरे की मुस्कान…

  • ये क्या हुआ

    ये क्या हुआ तू सत्य की खोज में चल मानव,क्योंकि हर तरफ दिख रहा है दानव।। सब एक दूसरे को खाने में लगे हुए हैं,रईस गरीब को सताने में लगे हुए हैं।। मानवता बिकी पड़ी है बाजार में,यह दुनिया फंसी फरेबी मक्कार में।। ये बाप और बेटे रिश्ते भूल गए हैं,बच्चे संस्कार वाले बस्ते भूल…

  • मेरा अस्तित्व | Kavita Mera Astitva

    मेरा अस्तित्व ( Mera Astitva ) क्या मेरे अस्तित्व के कोई मायने रहेंगे ? अगर मैं उतार भी दूं चेहरे पर से चेहरा मेरे स्वयं का अस्तित्व ही पिघल जायेगा और—- मैं अनाम हो जाऊँगी तेज झंझावतों में उठे धूलकणों की तरह हो चुका होगा जर्जर मेरा अंग-प्रत्यंग मेरा वर्ण धीमा हो जायेगा चेहरा, चेहरा…

  • लघुदीप | Kavita Laghudeep

    लघुदीप ( Laghudeep ) सघन तिमिर में तिरोहित कर देती है कक्ष में नन्हीं-सी लौ लघुदीप की। टहनी में आबद्ध प्रसुन बिखर जाते है धरा पर सान्ध्य बेला तक पर असीम तक विस्तार पाती है– उसकी गंध। रहता है गगन में चन्द्र पर, ज्योत्सना ले आती है उसे इला के नेहासिक्त अंचल तक बाँध उसके…

  • चांद पर भारत | Chand par Bharat

    चांद पर भारत! ( Chand par Bharat )    आशियाना चांद पे मिलके बनायेंगे, दूसरे ग्रहों पे भी कदम हम बढ़ाएंगे। गिर करके उठना दुनिया की रीति है, हौसले से फासले खुद हम घटाएंगे। अश्कों से जंगल होता हरा नहीं, हकीकत की दुनिया वहां अब बसायेंगे। महकेंगी सांसें पर अभी है तपाना, नए मंजरों पे…

  • अर्थ जगत | Kavita Arth Jagat

    अर्थ जगत ( Arth Jagat )   अर्थ जगत अनुपमा, प्रेरणा पुंज मारवाड़ी समाज ************ उद्गम राजस्थानी मरुथल धरा, न्यून वृष्टि संसाधन विहीन । तज मातृभूमि आजीविका ध्येय अंतर्मन श्रम निष्ठ भाव कुलीन । प्रायः राष्ट्र हर क्षेत्र श्री गमन , लघु आरंभ बुलंद आर्थिक आवाज । अर्थ जगत अनुपमा, प्रेरणा पुंज मारवाड़ी समाज ।।…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *