प्रेम दीवानी!
( Prem Deewani )
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छलकती आंखों से वो ख्वाब दिखता है,
महबूब मेरा बस लाजवाब दिखता है।
पहन लिया है चूड़ी बिंदी पायल झुमका,
आ जाए बस तो लगाऊं ठुमका!
बैठी हूं इंतजार में,
दूजा दिखता नहीं संसार में।
लम्हा लम्हा वक्त बीत रहा है,
जाने कहां अब तक फंसा हुआ है?
पहले तो ऐसा कभी नहीं हुआ है!
टिक टिक टिक टिक करती घड़ी-
चलती जा रही,
फिक्र हो रही अब तो बड़ी।
तभी दरवाजे पर दस्तक हुई,
आकर मां कह गई!
अरी उठ जा पगली!
कब का भोर हुई!
क्या सुध-बुध है तेरी खोई?
चल उठ! तैयार हो,
इंतजार कर रही रसोई!
मानों बिजली हो कौंधी,
मैं झट उठ बैठी।
सच में वो सपना ही था?
जो देख रही थी,
आने में उसने बड़ी देर कर दी ।
आया भी नहीं,
आ तो जाता?
सपने में सही।
पर नहीं!
मां आ गई,
चिल्लाकर गई;
मैं राह तकती रह गई।
नाइंसाफी मुझसे हुई,
जो तेरे प्यार में पागल हुई।
अल्ल्लाह बचाए मौला बचाए,
फिर कभी ऐसा ख्वाब न दिखाए।


लेखक-मो.मंजूर आलम उर्फ नवाब मंजूर
सलेमपुर, छपरा, बिहार ।
Hindi Kavita | Hindi Poetry -गलतफहमी!
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