Priyatam Tumko

प्रियतम तुमको प्राण पुकारें | Priyatam Tumko

प्रियतम! तुमको प्राण पुकारें

( Priyatam tumko pran pukare ) 

 

अंतस्तल की आकुलता को
देख रहे हैं नभ के तारे।
निविड़ निशा की नीरवता में,
प्रियतम तुमको प्राण पुकारे।

सब कुछ सूना सा लगता है।
प्रतिपल व्यथा भाव जगता है।
कोई दस्यु सदृश ठगता है।

रोम रोम कंपित हो जाता,
किसी अनागत भय के मारे।
निविड़ निशा की नीरवता में,
प्रियतम तुमको प्राण पुकारे।

मेरे इस एकाकीपन में।
उद्वेलन हो रहा है मन में।
कंटक से चुभते हैं तन में।

बांध नहीं पाते हैं क्षण भर,
जगती के संबंध यह सारे।
निविड़ निशा की नीरवता में,
प्रियतम तुमको प्राण पुकारे।

जो तुम हो पाये नहिं अपने।
क्या होगा बुनकर के सपने।
छोड़ न देना मुझे तड़पने।

मेरे नष्ट प्राय जीवन को,
बिना तुम्हारे कौन संवारे।
निविड़ निशा की नीरवता में,
प्रियतम तुमको प्राण पुकारे।

अनाद्यंत इस जग माया में।
त्राण तुम्हारी कर छाया में।
मोह नहीं नश्वर काया में।

मुझमें आत्म ज्योति बन चमको,
अंधकार में हों उजियारे।
निविड़ निशा की नीरवता में,
प्रियतम तुमको प्राण पुकारे।

श्वांस श्वांस है ऋणी तुम्हारी।
भ्रमित हुआ मैं, मति थी मारी।
दिन क्या, एक एक पल भारी।

कर अविलम्ब कृपा करुणाकर
नष्ट करो त्रय ताप हमारे।
निविड़ निशा की नीरवता में,
प्रियतम! तुमको प्राण पुकारें।

sushil bajpai

सुशील चन्द्र बाजपेयी

लखनऊ (उत्तर प्रदेश)

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