प्रियवर

प्रियवर

प्रियवर

 

मेरे तन मन प्रान महान प्रियवर।
प्रात:सांध्य विहान सुजान प्रियवर।।

 

इस असत रत सृष्टि में तुम सत्य हो,
नित नवीन अनवरत पर प्राच्य हो,
मेरे अंतस में तुम्हारा भान प्रियवर।।प्रात:०

 

ललित वीणा तार तुमसे है सुझंकृत,
ये षोडस श्रृंगार तुमसे है अलंकृत,
प्रेयसी का मान स्वाभिमान प्रियवर।।प्रात:०

 

प्रणयिका बन चरण की चेरी हुयी मैं,
आ मुझे ले चल कि अब तेरी हुयी मैं,
असह्य हृदय पीर को पहचान प्रियवर।।प्रात:०

 

मैंने ठुकराया जगत के द्वंद्व को,
इससे आगे क्या लिखूं मतिमंद को,
मृत्यु ही अब लग रही आसान प्रियवर।।प्रात:०

 

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कवि व शायर: शेष मणि शर्मा “इलाहाबादी”
प्रा०वि०-बहेरा वि खं-महोली,
जनपद सीतापुर ( उत्तर प्रदेश।)

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क्या कहना

 

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