दूर होकर भी पास

दूर होकर भी पास

दूर होकर भी पास

तू दूर है, मगर दिल के पास है,
तेरी यादों में हर पल का एहसास है।
आँखों में ये आंसू तुझ तक पहुँचने को बेकरार हैं,
काश तू सुन सके, मेरी दिल की ये पुकार है।

रातों की तन्हाई में तेरा नाम पुकारता हूँ,
हर धड़कन में तुझे ही तो महसूस करता हूँ।
दूरी चाहे जितनी भी हो, तू मेरी रूह का हिस्सा है,
तेरे बिना ये जीवन, सच में एक अधूरा सा किस्सा है।

काश मेरी आवाज़ बनके हवा तुझ तक आए,
तेरे दिल में मोहब्बत की मिठास फिर से जग जाए।
इंतजार की हर घड़ी अब भारी सी लगती है,
तेरे बिना ये दुनिया वीरानी सी लगती है।

जहाँ भी हो, बस खुश रहना ये दुआ है मेरी,
याद रखना, तुझ पे हर साँस निसार है मेरी।

तेरे लौटने की उम्मीद में दिल अब भी बेज़ार है,
और तेरी राहों में आज भी आँखें बेशुमार हैं।
आँखों में ये आंसू तुझ तक पहुँचने को बेकरार हैं,
काश तू सुन सके, मेरी दिल की ये पुकार है।

कवि : प्रेम ठक्कर “दिकुप्रेमी”
सुरत, गुजरात

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