Raat Thehri si

रात ठहरी सी | Raat Thehri si

रात ठहरी सी

( Raat thehri si )

 

कुछ रात ठहरी सी है ,स्याह सी,गहरी सी है

धुंध को ओढ़े सी है ,कई राज  समेटे  सी है

सर्द सी , जर्द सी ,सीने में अलाव लिए हुए

कांपती, कंपाती सी ,दिल को हाथ में थामे सी है

सांसों की हरारत से ,जमा लहू पिघलाते हुए

इक आतिश की चाह में ,ज़िन्दगी सोच में खड़ी सी है

ऐ खुदा, तू तो था जुदा ,संगदिल, तंगदिल या , बुजदिल  नहीं

तेरी फितरत में  क्यूं  अब  खुदगर्ज़ी, खुदफरामोशी सी है…

 

लेखिका :- Suneet Sood Grover

अमृतसर ( पंजाब )

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