Rabindranath Tagore par Kavita

गुरुदेव रविंद्रनाथ टैगोर | Rabindranath Tagore par Kavita

गुरुदेव रविंद्रनाथ टैगोर

( Gurudev Rabindranath Tagore )

 

गुरू देव सादा जीवन जीनें वालें,
नोबल पुरस्कार आप पानें वालें।
रविन्द्र नाथ टैगोंर आप थें हमारें,
साहित्य किंग जो कहलानें वालें।।

महान शख्सियत और रचनाकार,
ब्रह्म-समाज दार्शनिक चित्रकार।
आध्यात्मिक एवंम् मर्यादा ज्ञाता,
समाज सुधारक एवं संगीतकार।।

धर्म परायण 13 बच्चों की माता,
महान थी देवी शारदा गुरु माता।
बह्म-समाज के पिता वरिष्ठ नेता,
साहित्य जग की आप परिभाषा।।

8 वर्ष में ही आप रचना रच दियें,
म्रणालिनी देवी संग विवाह कियें।
साहित्य से सभी के दिल है जीते,
राष्ट्रगान जन गण मन लिख दियें।।

बंग्लादेश का ऐसा राष्ट्रगान लिखें,
जापान अमेरिका में पहचान बनें।
श्रीलंका राष्ट्रगान पर कलम चली,
कविताएँ प्रकाशित पुस्तकें छापी।।

कई लघुकथाएँ रचना संग्रह लिखें,
अनेंको कहानियाॅं उपन्यास लिखें।
गुरुकबीर रामप्रसाद सेन से सीखें,
रीतरिवाज़ नकारात्मक पक्ष लिखें।।

 

रचनाकार : गणपत लाल उदय
अजमेर ( राजस्थान )

 

 

Similar Posts

  • धीरे-धीरे | Poem Dhire Dhire

    धीरे-धीरे ( Dhire Dhire ) धीरे-धीरे शम्मा जलती रही, रफ्ता-रफ्ता पिंघलती रही ! दिल तड़पता रहा पल पल, रूह रह-रह मचलती रही ! शोला-जिस्म सुलगता रहा, शैनेः शैनेः रात ढलती रही ! ख़्वाब परवान चढ़ते रहे, ख़्यालो में उम्र टलती रही ! धड़कने रफ्तार में थी ‘धर्म’ सांसे रुक-रुक चलती रही !! डी के निवातिया…

  • मुंडो देख टीकों काडै | Marwadi geet

    मुंडो देख टीकों काडै ( Marwadi geet )   घर तरसै बार बरसै, घर घर की कहाणी है मुंडो देख र टीकों काडै बातां आणी जाणी है दुनिया घणी स्याणी है   दुनिया सारूं हंस बतलावै काम निकाळै सगळो टैम निकळ ज्या जाणै कोनी च्याहे चोखो धड़ो   ईब पीसां री पूछ होय री बुजुर्गा…

  • नदी का किनारा

    नदी का किनारा बहती नदी संग मैं ठहरा सा बैठा,तेरी राहों में उम्मीदों को समेटा।लहरें भी अब तो कहने लगीं,दिकु, लौट आओ,इन्हीं दुआओं के धागों से हूँ मैं लिपटा। धूप-छाँव का ये खेल भी सुना सा है,तेरी हँसी के बिना हर रंग धुंधला सा है।पानी में देखूँ तो चेहरा तेरा उभरे,तेरी आहटों का हर साया…

  • जिन्दगी पहलू नहीं पहेली है

    जिन्दगी पहलू नहीं पहेली है जिन्दगी परिणाम कम परीक्षा ज्यादा लेती है, खुशियों से खेलती बहुत, दुख ज्यादा देती है। इरादों पर बार बार चोट कर निराशा जगाती , जब हों हताश, निराशा में आशा उपजा देती है। कभी निहारती अपने को, कभी भूल जाती श्रृंगार करती हो बेखबर, प्रेम जगा देती है वक्तव्य कब…

  • प्रकृति की सीख | Poem prakriti ki seekh

    प्रकृति की सीख ( Prakriti ki seekh )   बदलना प्रकृति की फितरत फिर क्यों इंसान हिस्सेदार हैं। प्रकृति के बदलने में कहीं ना कहीं इंसान भी बराबर जिम्मेदार हैं।   जैसे तप और छाया देना प्रकृति का काम हैं। वैसे ही कभी खुशी कभी गम, जिंदगी का नाम हैं।   कभी कबार पूछता, आसमां…

  • ज्ञान अनमोल खजाना है | Kavita gyaan anamol khazana hai

    ज्ञान अनमोल खजाना है  ( Gyaan anamol khazana hai )   ज्ञान अनमोल खजाना है बांट सका है कौन इसे ?   न भाई बंधु जमाना है अनमोल रतन है हर रत्नों में   पर इसको नहीं छुपाना है ज्ञान की ज्योति जले घर-घर में   ज्योति से ज्योति जलाना है घर-घर महके ज्ञान की…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *