Parinde par Kavita

परिन्दे | Parinde par Kavita

परिन्दे!

( Parinde ) 

 

परिन्दे ये तारों पे बैठने लगे हैं,
बेचारे ये जड़ से कटने लगे हैं।
काटा है जंगल इंसानों ने जब से,
बिना घोंसले के ये रहने लगे हैं।

तपने लगी है ये धरती हमारी,
कुएँ, तालाब भी सूखने लगे हैं।
उड़ते हैं दिन भर नभ में बेचारे,
अपने मुकद्दर पे बिलखने लगे हैं।

खाने लगे हैं खौफ देखो परिन्दे,
दौैर- ए- जमाने से डरने लगे हैं।
कुदरत बनाई है सुन्दर-सी धरती,
इनके मगर दिन सिसकने लगे हैं।

चलाओ न आरी शाखों पे कोई,
परिन्दों के अरमां लुटने लगे हैं।
पतझड़ को लाके खुशबू न ढूँढों,
हवाओं के दम भी उखड़ने लगे हैं।

प्यासा है सूरज,ये प्यासी है धरती,
औकात अपनी हम खोने लगे हैं।
लहरें विकास की तोड़ी किनारा,
बिना पंख देखो हम उड़ने लगे हैं।

 

रामकेश एम यादव (कवि, साहित्यकार)
( मुंबई )
यह भी पढ़ें:-

चराग- ए – मोहब्बत | Poem Charagh-E-Mohabbat

Similar Posts

  • दीबार | Deewar kavita

     “दीबार”  ( Deewar )   –>मत बनने दो रिस्तों में “दीबार” || 1.अगर खडी हो घर-आंगन, एक ओट समझ मे आती है | छोटी और बड़ी मिलकर एक, सुंदर आवास बानाती है | मत खडी होने दो रिस्तों मे, टकरार पैदा कारती है | हंसते गाते हमारे अपनों मे, दरार पैदा करती है | –>मत…

  • धोनी का अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट से संन्यास | Dhoni par kavita

    धोनी का अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट से संन्यास ( Dhoni ka antarrashtriya cricket se sanyas)   धोनी ने लिया अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट से संन्यास देख सुनकर फैन्स हो गए उदास । एक विकेट कीपर बल्लेबाज, जिस पर पूरे विश्व को है नाज। अब उसे मैदान पर खोजेंगी निगाहें, न मिलने पर भरेंगी आहें। भारतीय क्रिकेट में तो एक…

  • मैं अक्सर

    मैं अक्सर   मैं अक्सर गली में बजती तुम्हारी पायल के घुँघरुओं की रुनझुन से समझ लेता हूँ तुम्हारा होना……   बजती है जब-जब सुबह-शाम या दोपहर जगाती है दिल की धड़कन और देखता हूँ झांक कर बार बार दरवाजे से बाहर…….   बहुत बेचैन करती है मुझे छनकती तुम्हारी पायल और खनकती पायल के…

  • सांवरियो आंगणिये आयो | Rajasthani Bhasha Poem

    सांवरियो आंगणिये आयो ( Sanwariyo aanganiye aao )    सांवरियो आंगणिये आयो, जाग्या म्हारा भाग। सुखसागर बरसण लाग्यो,घट उमड़यो अनुराग। मनमंदिर म जोत जागी,घट म उजाळो दमक्यो। नैणां गिरधर री मूरत, किस्मत रो तारों चमक्यो। मिल्यो खजानों शबदां रो, सुरसत री महर होगी। सुरभित बणी केसर क्यारी, काया कंचन निरोगी। फूट पड़या गीता रां सुर,…

  • प्रेयसी | Preyasi

    प्रेयसी ( Preyasi )    सृष्टि में  संचरित अथकित चल रही है। प्रेयसी ही ज्योति बन कर जल रही है।।   कपकपी सी तन बदन में कर गयी क्या, अरुणिमा से उषा जैसे डर गयी क्या, मेरे अंतस्थल अचल में पल रही है।। प्रेयसी०   वह बसंती पवन सिहरन मृदु चुभन सी, अलक लटकन नयन…

  • चूड़ियों की खनक | Chudiyon ki Khanak

    चूड़ियों की खनक ( Chudiyon ki khanak )   चूड़ियों की खनक में,नारीत्व की परिभाषा दिव्य सनातन धर्म संस्कृति, कंगन कर कमल अलंकरण । परम प्रतिष्ठा दांपत्य शोभा, सरित प्रवाह माधुर्य अंतःकरण । हर धर्म पंथ समाज क्षेत्र, महिला शक्ति अनूप अभिलाषा । चूड़ियों की खनक में,नारीत्व की परिभाषा ।। विविध वर्णी अनुपमता, आकृति मोहक…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *