रेशम के धागे | Resham ke Dhaage

रेशम के धागे

( Resham ke dhaage )

 

रेशम के इस धागे की ये बात ही बड़ी-निराली है,
सजाकर लाती बहनें इसदिन प्यारी सी थाली है।
लम्बी उम्र की कर कामना तिलक वह लगाती है,
बिठाकर बाजोट भैय्या के हाथ राखी बाॅंधती है।।

रोली-मोली और मिठाई नारियल लेकर आती है‌‌,
ख़ुश रहना सदैव प्यारे भैया ऐसी दुआऍं देती है।
कर‌ किलकारी वह बहना संपूर्ण घर चहकाती है,
जब भी आये ये त्यौहार वो फूले नही समाती है।।

यह कच्चें धागो की राखियां शक्तिशाली होती है,
श्रावण शुक्ल पंचमी को बहनें पीहर में लाती है।
माॅं जैसी मूरत वैसी सूरत सब बहनों की होती है,
रिश्तें निभाने यही बहनें मीलों से चली आती है।।

भईया के आने से पहले थाल सजाकर रखती है,
साथ पले एवं बड़े हुऍं वें यादें ताज़ा हो जाती है।
बान्धकर राखी बहना गिले शिकवे भूल जाती है,
ऐसे रिश्तों से सबकी ख़ूबसूरती निखर जाती है।।

हर रिश्ते में अपनी-अपनी ख़ास सीमाऍं होती है,
मान मर्यादा आत्मसम्मान सुन्दरताऍं ये होती है।
राजा भैया प्यारा भैया नाम से संबोधन करती है,
पीहर की छोटी ख़बर से दौड़कर चली आती है।।

 

रचनाकार : गणपत लाल उदय
अजमेर ( राजस्थान )

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