ऋतु गर्ग की कविताएं | Ritu Garg Poetry
पढ़ी-लिखी बेटी मजबूत पीढ़ी
बस यहां पर आकर
मैं कमजोर हो जाती हूं!
जब कोई पूछता है
बिटिया की शादी करोगी क्या
अरे भाई !
यह कोई पूछने की बात है
बेटियों को भी तो अपना घर बसाना है,
उनको भी तो अपने घर जाना है।
बस मैं यहां पर आकर,
कमजोर हो जाती हूं!
जब कोई पूछता है,
बेटी को खाना बनाना आता है,
क्या उसे घर संभालना आता है।
हां !उसे सभी आता है,
मैंने पढ़ाई के साथ-साथ,
उन्हें संस्कार भी दिए हैं।
छोटे बड़ों का सम्मान,
करना भी सिखाया है।
अपनी राह पर बढ़ाना भी सिखाया है।
मैंने उन्हें सिखाया,
संस्कारों में रहकर आगे बढ़ना।
मैंने उन्हें सिखाया,
अपनी काबिलियत पर भरोसा रखना।
बस मैं यहां पर आकर,
कमजोर हो जाती हूं!
जब लोगों के प्रश्नों का,
जवाब देने का मन नहीं करता।
क्योंकि उन्हें स्वयं पर ही भरोसा नहीं,
आंकलन तो करना आता ही नहीं।
क्या शिक्षित बच्चा संस्कार विहीन हो सकता है,
क्या शिक्षित बच्चा,
अपनी गृहस्थी नहीं संभाल सकता है?
मेरा प्रश्न है उन सभी से ?
जो समझते हैं,
बेटियों को ज्यादा पढ़ने से क्या फायदा,
जो समझते हैं?
बेटियों को संबल बनाने से क्या फायदा।
घर तो बेटे से ही चलता है,
बेटियों को पढ़ने से क्या फायदा?
फिर भी मैं अपने को संभालती हूं,
उनके प्रश्नों का हल खोजती हूं?
उन्हें बताती हूं ,
बेटियों की पढ़ने से क्या फायदा
बेटियों के पढ़ने से शिक्षित समाज बनेगा
घर में संस्कार आएंगे
और आने वाली पीढ़ी को
उनके जीवन का महत्व पता चलेगा।
भविष्य संवरेगा,
और घर कभी बिखरेगा नहीं।
क्योंकि वह बेटियां जो शिक्षित होते हुए
अपने घर को संभाल लेती है
छोटे बड़े सभी का सम्मान कर लेती है।
घर की मर्यादा को बांधकर रखती है,
घर पर बोझ नहीं ,
बल्कि वह रीड की हड्डी बनती है,
और कभी भी वह शिक्षा का घमंड नहीं,
बल्कि सभी का आत्म बल बनती है ।
समाज की दिशा बनती है, समाज की दिशा को बदलती है।
बिंदी और सुहाग की चूड़ियां बिछड़ गई
कभी ये वादियाँ सुकून देती थीं…
अब हर हवा में आहें घुली हैं।
बुझा बुझा दिया है, बोझ हो गई ज़िंदगी।
लाल कंगन की लालिमा खो गई।
कश्मीर की वादियों में… विधवा हो गई।
सुर्ख लाल होकर वो धरती,
ऐसे लगता है अब… बंजर हो गई।
हँसती खिलखिलाती दुनिया… वीरान हो गई।
बंदूक की गोलियों का निशान हो गई।
आतंकियों के सामने परस्त हो गई।
सुहागन की बिंदी और चूड़ी… शर्मिंदा हो गई।
ये हर दिल की चीत्कार है।
दुआ कीजिए…
फिर से वादियाँ मुस्कराएँ।
परंपराओं की छांव
शुक्र है, पिछला जमाना साथ चल रहा है,
कुछ अरमान, कुछ तहज़ीब संग पल रहा है।
कुछ बातें अधूरी रह जाती हैं,
कुछ सपने मुकम्मल नहीं हो पाते हैं।
जो साथ न होता उस बीते कल का,
हम अपनी राहें कहाँ से पाते?
हां, वही पुराना जमाना हमें राह दिखाता है,
परंपराओं की सीख सहेज कर लाता है।
कुछ रिश्तों की अहमियत समझाता है,
गांव की गलियों की याद दिलाता है।
बेर की शाखाओं से मीठे बेर खिलाता है,
हममें कुछ गुनगुनाने का हौसला जगाता है।
वही हमें स्वस्थ जीवन की सीख बताता है,
उसका साथ ही सुकून के पल दे जाता है।
साथी हो तुम मेरे
साथी हो तुम मेरे, तो हर राह मुस्काएगी,
संग तेरे चलूँ जब, बहारें भी लहराएंगी।
दिल की धड़कन गाएगी, मधुर एक गीत प्रेम का,
संगीत की इस धुन में, रूह भी झूम जाएगी।
साथी हो तुम मेरे तो कोई, गीत बाँध पाएगा।
साथ तुम हो मेरे, कोई राग गीत गाएगा।
तेरी हँसी की झंकार में, सुर मधुर जब मिलेंगे।
तेरी बातों की गूंज में, सपने नए सजाएंगे।
संग तुम्हारा हर इक लम्हा, संगीत बन जाएगा।
हर धड़कन में प्रेम होगा, जीवन संगीतमय हो जाएगा।
रंगों की बौछार में तन मन भीग जाएगा,
आओगे जब करीब, मन संवर जाएगा।
आगोश में भी जब चमक चांदनी आएगी,
मन भीग जाएगा, तन भी चहक जाएगा।
मुस्कुराएंगे हम, गुनगुनाएंगे हम,
जिंदगी अब नई रोशनी हो रही।
कविता की अभिव्यक्ति
दमकती धड़कती गमकती है कविता
वाणी की वीणा से सजती है कविता
लहराते बागों की महक है कविता
भीगी पलकों की भाषा है कविता।
गीत गजलें कहानियों की गाथा है कविता
मधुर मधुर संगीत को सजाती है कविता
स्वर पुलकित से आह्लादित है कविता
कभी घनघोर घटाओं की गर्जन है कविता
मां की लोरी और पिता की आशा है कविता
कभी मंद मंद मुस्कान है कविता
गुरुजनों का प्यार और आशीर्वाद है कविता
हर पथ की अनुगामिनी है कविता
मुझे युद्ध मंजूर नहीं गीता ज्ञान
रणभेरी की ध्वनि गूंज रही थी,
मृदंग का ताल था नहीं कहीं।
अर्जुन रथ से उतरकर,
हाथ जोड़कर खड़ा था वहीं।
कृष्ण सम्मुख थे खड़े,
मधुसूदन बन मुस्कुरा रहे।
कहो अर्जुन क्या हुआ,
रथ से क्यों उतर गए?
क्यों शोक से संतप्त हो,
क्यों पात से तुम फड़क रहे?
क्यों इस धर्म क्षेत्र से तुम,
आज फिर घबरा गए?
बंधु बांधव परिजनों के,
मोह से ढके हो कहीं।
या फिर अक्षौहिणी सेना से,
भयभीत हो रहे हो कहीं?
क्यों हाथ जोड़ खड़े हो तुम,
क्या आज तुमको हो गया?
क्यों तुम्हारा गांडीव आज,
तुम्हारे हाथ से भी छूट गया?
हे पार्थ! तुम मेरे मीत हो,
सखा, सहोदर प्रिय भी हो।
कहो मन की बात कहो,
क्यों भयभीत तुम हो रहे?
हे! माधव, हे! कृष्ण मुरारी,
हे! जगत के रखवाले।
मन में मेरे संशय हो रहा,
यह युद्ध क्यों हो रहा?
परिजनों से विमुख हो,
क्या कभी शांति पाऊंगा मैं?
इन्हीं से जीवन बना मेरा,
इन्हीं के साथ भी मृत्यु निश्चित।
मुझे युद्ध मंजूर नहीं,
मुझे वध मंजूर नहीं।
मुझे इतना वरदान दो,
शांति हो चिरस्थाई यहीं।
तुम ही बताओ क्या करूं,
कैसे विधि के विधान से लड़ूं।
तुम ही बताओ मित्र मेरे,
कैसे धीरज कर शोक सागर
से हटूं।
हे पार्थ! क्यों भयभीत होते हो,
क्यों स्वयं से हारे हो तुम?
तुम्हारे साथ कृष्ण सदा है,
मिलता रहेगा बल सदा।
क्यों भूल तुमसे हो रही,
क्यों स्वयं से पराजित हो रहे?
क्यों भरी सभा की अमर्यादा का,
विषपान तुम कर रहे?
तुम्हारी भुजाओं में बल असीम,
गांडीव उठाओ हे! पार्थ।
रणभेरी तुम्हें पुकार रही,
उठ खड़े हो जाओ पार्थ।
धर्म क्षेत्र में डटे रहो,
साहस कर उठ खड़े रहो।
सत्य के लिए हे! पार्थ,
तुम अडिग रहो अडिग रहो।
बात मेरी मान लो और
यह सत्य भी जान लो।
जो हो रहा है,जो होगा,
और जो हुआ अच्छा हुआ।
भविष्य की चिंता न कर,
सिर्फ मेरा स्मरण कर।
मैं ही करता हूँ, मैं ही कर्म हूँ,
मैं ही कारक और सर्वज्ञ भी हूँ।
मैं ही अभय, मैं ही हर्ष,
मैं ही शोक-विषाद भी हूं।
मैं ही उन्माद, मैं ही संशय,
मैं ही हर्षातिरेक भी हूं।
मैं ही द्वंद, मैं ही प्रचंड
मैं धड़कती ज्वाला भी हूं।
मैं ही नदियां, मैं ही बिंदु,
मैं ही क्षीरसागर भी हूं।
मैं ही होठों की मुस्कान,
मैं इन सांसों में भी हूं।
मैं ही कण कण में समया,
में ही अंतर्मन में व्याप्त भी हूं।
मुझसे सभी हैं, और मैं सभी में,
सप्त सुर बनकर समया भी हूं।
मैं सभी जीवो में व्याप्त,
सकल सृष्टि की माया भी हूं।
मैं ही धरा, गगन, वायु,
सूर्य की रश्मि भी हूं।
मैं ही अन्न, धन वैभव,
में ही भ्रम कल्पना भी हूं।
मैं ही अभिलाषा, मैं ही कांति,
मैं ही संकल्पना भी हूं।
मैं ही अस्त्र मैं ही शस्त्र,
मैं ही भुजाओ का बल भी हूं।
हे पार्थ! अनगिनत रूप मेरे,
अनगिनत आयुध भी है।
अनगिनत लक्षण मेर,
अनगिनत मुख भी है।
सकल सृष्टि का मंथन,
मेरे ही अधीन भी है।
आदि, अंत और उदय,
में ही हूं! मैं ही हूं!!
हे पार्थ! उठकर देख,
सदैव साथ कृष्ण है तेरे।
तुझे क्यों भय व्याप्त है,
जब विश्वेश्वर साथ है तेरे?
मेरी ही शरण में आ,
मुझे तू अपना बना।
मेरी ही भुजाओं में,
तेरा समर्पण सर्वस्व हो।
अभय हो मेरी शरण में आ,
तू मुझे अपना मान ले।
सुख दुख से परे हो,
मोह को तू त्याग दे।
सर्व इच्छा त्याग कर,
आ मेरी शरण में आ।
सकल विश्व कौतूहल से भरा,
राज यह तू जान ले।
मेरी भक्ति से तू,
संसार सागर से पार आ।
मेरा चिंतन, मेरा भजन,
बस यही है मुक्ति की राह।
अनन्य भक्ति से,
सर्वो मुझको सौंप दे।
निर्लिप्त होकर कर्म कर,
सर्वशक्तिमान मुझको मान ले।
गीता के ज्ञान से,
चक्षु अर्जुन के खुल गए।
विराट रूप सम्मुख देख,
नयन पार्थ के सजल हुए।
कृष्ण की कृपा से,
अर्जुन का मन शांत हो गया।
तूफान समुद्र का अब पूरी तरह से थम गया।
धन्य धन्य है त्रिपुरारी,
धन्य तुम्हारी माया है।
धन्य है यह जीवन
जिसने मानव जीवन पाया है।
धन्य धन्य सांसों का आवागमन,
धन-धन्य है भाग्य हमारे।
धन्य धन्य है लीला धारी,
धन्य नेत्र सत्य दर्शन उपकारी।
धन्य भारत देश है,
धन्य धरा धाम है।
धन्य है सर्व परमार्थी,
कृष्ण सर्वशक्तिमान है।
यह युद्ध आज हो रहा है,
धर्म की रक्षा के लिए,
अधर्म का नाश करने के लिए,
सत्य की स्थापना करने के लिए।
करुणा
समाज सेवी होना बहुत जरूरी
समाज के नाम थोड़ी जिंदगी है जरूरी।
बिना सेवा परोपकार का भाव न आएगा
यह जन्म मानव यूं ही गवाएगा।
निस्वार्थ भाव से कदम जब बढ़ाएगा,
स्वयं की राहों को आसान ही बनाएगा।
क्षमा दया सत्य जब जीवन में लाएगा
निष्कंटक राहों पर फूल वह आएगा।
करुणानिधि के पथ जब बढ़ता जाएगा
जीवन की अमूल्य निधि को समझ जाएगा।।

ऋतु गर्ग
सिलीगुड़ी, पश्चिम बंगाल
यह भी पढ़ें :-






