शाश्वत नाम मॉं

शाश्वत नाम मॉं

शाश्वत नाम मॉं

मुझ अनगढ़ माटी को भी इंसानी रुप दिया करती हो मां,
नित प्रति हर पल हम पर कितने उपकार किया करती हो मां !

मेरी हर गलती को आगे बढ़ हंसकर तुम अपना लेती हो,
मेरा किया धरा सब होता भरपाई तुम भरती हो मां !!

दुखों का पहाड भी टूटे खुद पर तो मौन हो सह लेती हो,
क़तरा भर तकलीफ़ मिटाने मेरी हर जतन करती हो मां!

तेरा आंचल आसमान सम गोद तेरी जन्नत मेरी,
ब्रम्हांड समाया तुम में सारा तुम मेरी धरती हो मां !

दर्द टपकने लगता है जब झीनी परतों से जीवन की,
हाथ फिराकर सिर पर प्यार से तुरपाई करती हो मां!!

अनगिन धर्मों में बंटी है दुनिया माने सब स्वारथ साधे,
तुम बस एक मातृत्व धर्म ही सदा निभाया करती हो मां!

गर्भ की पहली श्वास से लेकर जीवन के अंतिम क्षण तक
एक ही शाश्वत नाम तुम्हारा अधरों पर रहती हो मां!!

सागर जितनी स्याही लेकर आसमान के कागज पर
लिखी कविता फिर भी तुम पर अधूरी रहती हो मां!!

मातृदिवस पर बस यही “माहिर” ईश्वर से करें प्रार्थना ,
रहो सदा तुम संग हमारे जब तक गगन धरती हो मां ||

विरेन्द्र जैन

( नागपुर )

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