शेर सिंह हुंकार की कविताएं | Sher Singh Hunkaar Poetry
पीड़ा
ना छेड़ो हमें हम सताए हुए हैं।
कई राज दिल में छुपाए हुए हैं।
ये सदियों की पीड़ा उभरने लगी हैं,
जो हिन्दू हृदय में दबाए हुए हैं।
हमे ना सीखाओ हमे ना दिखाओ।
जुल्म क्या हैं होता हमें ना बताओं।
जो हमने सहा हैं कहाँ वो लिखा हैं,
मगर सच हमारा जहाँ को बताओ।
जो दिल मे जख्म हैं उभरने लगा हैं।
धरा से ही हिन्दू सिमटे लगा हैं।
मैं चुप हूँ अगर तो मुझे ना जगाओ,
लहू धमनियों में उबलने लगा हैं।
दीनार ए दो लेकर हमे बेच डाले।
हरम भर गए हिन्दू थे हम बेचारे।
जो मारा है शमशीर काफिर बनाके,
जिस्म ही नही रूह भी काट डाले।
बहस ना करो हम भी जगने लगे हैं।
जो खोया था पाने को लड़ने लगे हैं।
वो मन्दिर हमारे हमे फिर से दे दो,
सजग हिन्दू बनके दहके लगे है।
हमें ना जगाओ जो हम जग गए तो।
कही छुप ना पाओगे जो तन गए तो।
तपन वेदना की जला देगी तुमको,
जो इतिहास का सच उभर से गए तो।
जो मन्दिर पे मस्जिद बने है तुम्हारे।
घुटन बढ रही है हृदय में है ज्वाले।
उन ज्वालों को हूंकार दबाए हुए हैं,
ना छेड़ो हमें हम सताए हुए है।
मदिरा
छोड़ हालात पे उसको,क्यों अपना सर खपाता है।
लगा ले पैक व्स्हिकी की, ये अच्छी नींद लाता है।
गमों को भी मिटाता हैं, खुशी को ले के आता है।
कि जबतक साथ है तेरे, तुझे जन्नत दिखाता है।
बहुत है नाम इसके पर, कभी नामों मे मत उलझो।
जो मिल जाए उसे पी लो,मरम बातों मे है समझो।
जो इसको पी के सो जाए,वही मन खुश रहा हरदम।
यही तो गम गलत करता, सुनो हुंकार ये हरदम।
मधुरस सोमरस मदिरा मिलेगा मय के प्यालों में।
कभी जूठा नही होता है पूछो, पीने वालो सें।
गिरा दो बूद धरती पर, तभी शुरूवात करते है।
अलग है जाति इनकी जिसमे,सारी जाति होते है।
मेरे तपते मन की पीडा है
मेरे तपते मन की पीडा है…..
चिथडो मे नही मुझे जीना है..
मेरे धूमिल गौरव गरिमा को…
मोदी तुम्हे जीवन देना है…….
..
यह मथँन है भारत का…….
विष-अमृत सब निकलेगा…
तुम्हे नीलकंठ बनना है…….
सुख, सोम, सुधा को तँज कर
…
इतिहास बदलना है तुमको….
सम्मान दिलाना है तुमको……
अस्मत को गिद्ध भेडियो से…
निस्कंट बनना है तुमको……..
..
जो धुँध बसा है मस्तक पर…..
वो धुँध हटाना है तुमको………
लालच की गर्द हटा कर के…..
मेरा देश बचाना है तुमको……
क्या मै बूढा हो गया हूँ…???
देखो तो क्या मै बूढा हो गया हूँ…….
बाइस साल का बेटा होने को है……..
जिन्दगी नए रिश्तो को निभाने की तैयारी में है….
आँखो के नीचे कुछ सिलवटे पडने लगी है….
नजरे भी कुछ कमजोर हो रही है….
कुछ कुछ बातो को भूलने लगा हूँ….
कुछ नादानिया अभी कर जाता हूँ…..
खुद सेल्फी लेकर तुमको टैग कर देता हूं…..
सूनो ना मै रील बनाने लगा हूँ…..
औरों की घिन्ता छोड खुद ही मुस्काने लगा हूँ……
उम्र को छुपाने के लिए मै खिजाबी हो गया हूं….
कु मस्तौला तो कुछ आलसी हो गया हूँ……
पर पुछता हूँ तुमसे दिल से बताना….
मै एक कश्मीरी हिन्दू हूँ
कभी फूलो का गुलशन था, दहकता आग बन गया ।
कभी धरती का जन्नत था, वो अब विरान बन गया ।
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कभी वो ताज फूलो का, जो अब बेजार बन गया ।
जो बसता है मेरे दिल मे, वो नस्ल ए खास बन गया ।
*
वो घाटी देवदारो की , जहाँ केसर की खूँशबू है।
जहाँ मदमस्त मौसम था, वो सब बेकार हो गया ।
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निकाला है जिन्हे घर से, चिनाँरो के सिकारे से ।
वो पंडित अब नही जाते है, घाटी के किनारो पे ।
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सियासत ने सिखाया है, की भाई है सभी नस्ले ।
क्यो जीना जख्म है इतना, वहाँ हिन्दू ने ये बोला।
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जो चाहे कह लो तुम मुझको, मै काफिर था मै काफिर हूँ।
नही बनना मुझे भाई, जो कातिल है चिँनारो के।
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मची है कत्ल दंगे रूह भी, इल्जाम देती है ।
जो घाटी मे सहा हमने, वो चीख कर हालात कहती है।
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मै कैसे मान लू की, हिन्दू मुस्लिम एक है बोले ।
यहाँ जो गैर मुस्लिम है, हलाल ए ईद के बकरे ।
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चिता श्मशान के राखो से ये,आवाज निकली है ।
कोई तर्पण करे मेरा,यही बस आह निकली है ।
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मेरे मासूम दिल के जख्म को,चुपचाप सुनते हो ।
नही कहना है कुछ तो थूक दो,हालात पर मेरे ।
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मै घाटी का वही पंडित ,जहाँ शिव और भवानी है ।
मेरा इतिहास उज्जवल है, किताबो मे कहानी मे ।
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यही पे बन्द करता हूँ मै लिखना, दिल के जख्मो को ।
कभी फुर्सत मिले तो तुम भी, पढना मेरे जख्मो को ।
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दो आसू क्यो गिराओ गे, वो मेरा काम है अब तो ।
वो घाटी घर नही मेरा, हम रहते है अब तम्बू मे ।
*
हमे साजिश न तोडा है, जो हमने घर वो छोडा है।
की अब तो दर्द है जीवन, इसी के संग जीना है ।
*
होली
फागुन के दिन थोडे रह गये, मन मे उडे उमंग।
काम काज मे मन नही लागे, चढा श्याम दा रंग।
नयन से नैन मिला लो हमसे, बिना पलक झपकाए।
जिसका पहले पलक झपक जाए, उसको रंग लगाए॥
बरसाने मे राधा नाचे गोकुल मे श्रीश्याम।
सीता के संग होली खेले,अवध मे राजा राम॥
काशी मे होली के रंग मे, उडे है भांग गुलाल।
मस्ती मे शिव शम्भू नाचे, गौरा पिसे भांग॥
पीली पीली सरसो खिल गए, बहे है मदन बयार।
अंग अंग टूटे है तन मे, कामदेव का चढ बुखार॥
हम भी खेले तुम भी खेले, लाज का घुँघट त्याग।
शेर के तन पे मस्ती चढ गयी,आओ खेले फाग॥

कवि : शेर सिंह हुंकार
देवरिया ( उत्तर प्रदेश )
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