श्रीगोपाल नारसन की कविताएं | Shreegopal Narsan Hindi Poetry

विषय सूची

यातायात सुचारू रहे

यातायात सुचारू रहे
करिए मिलकर प्रयास
मार्ग अवरोधक न बने
संकल्प कर लो आज
नियमों का पालन करे
सुरक्षित गति पर चले
दुर्घटना न होने पाए
हैलमेट जरूर अपनाये
सड़क हादसा होने पर
मदद को हाथ बढ़ाये
कानून सख्त हो गया
दंड प्रावधान बदल गया
अब लापरवाही ठीक नही
कानून तोड़ना उचित नही।

बालमन है सबसे सुंदर

बालमन है सबसे सुंदर
पवित्र यही कहलाता है
अबोधता ही इसका गुण
छल, कपट नही आता है
विकार मुक्त रहता है मन
पवित्रता गुण ही भाता है
राग ,द्वेष से भी दूरी रहे
कोमल तन मन सुंदर रहे
अबोध से जो बोध बने
बालक से जो बड़े बने
माया मोह में फंसकर वे
सतपथ से भटक जाते है
देखते ही देखते ऐसे लोग
जीवन मे कष्ट उठाते है।

नवजात के मन मे

नवजात के मन मे
कोई भय नही होता
जब तक वह जीवन मे
कुछ पा नही लेता
कुछ पा लेने पर उसके
खो जाने का डर है
यही तनाव, चिंता ,
परेशानी का घर है
इसी के लिए भाग्य रेखा में
अपना भविष्य खोजते है
हाथ की लकीरों में
तरक्की की राह खोजते है
पर जिनके हाथ नही होते
क्या रह जाते है वे
जीवन मे खोटे!
नही ,वे बिना हाथ के भी
अपना कर्म यज्ञ रचते है
परमात्मा स्वयं उनकी
सफलता की इबारत लिखते है।

एक फ़रिश्ता धरा पर आया

एक फ़रिश्ता धरा पर आया
60 बरस मे परमात्मा पाया
वानपरस्ती जीवन अपनाया
छोड़ दी सब मोह और माया
हीरो का व्यापार छोड दिया
भरा पूरा परिवार छोड़ दिया
धन दौलत न्यास मे दे दी
न्यास की चाबी बच्चियो को सौंपी
बच्चियां ब्रह्माकुमारी कहलाई
चरित्र निर्माण की अलख जगाई
सिंध कराची से माउंट आबू आये
शांतिदूत जगतभर मे फैलाये
वह फ़रिश्ता दादा लेखराज है
पूरी दुनिया को उनपर नांज है।

ईश्वरीय वाणी सुना करो

ईश्वरीय वाणी सुना करो
फिर उसको गुणा करो
सच्ची राह मिल जायेगी
दिनचर्या बदल जायेगी
अमृत बेला उठने लगोगे
प्रभु ध्यान करने लगोगे
मुख मे भी मीठे बोल होंगे
चरित्र से सिरमौर होंगे
चेहरे पर तुम्हारे नूर होगा
घमण्ड चकनाचूर होगा
ईश्वर सानिदय मिल जायेगा
जीवन स्वर्णिम बन जायेगा।

देवता हो या फिर हो मानव

देवता हो या फिर हो मानव
मां रखती है समान ही भाव
ममत्व उसका देवत्व पर भारी
उकमणी की यही थी लाचारी
पुत्र प्रद्युम्न का हरण हुआ
मां रुकमणी का रुदन हुआ
तीनो लोक की ज्ञाता रुकमणी
पुत्र सुरक्षित है जानती रुक्मणी
मां के मन को कौन समझाये
प्रद्युम्न बिना रहा न जाए
शक्ति स्वरूपा भी विलाप करे
मां की ममता विवेक हरे।

किससे छिपाना, क्या छिपाना

किससे छिपाना, क्या छिपाना
क्यों छिपाना,कैसे छिपाना
इसी उलझन में उलझे है लोग
कोई देख तो नही रहा है
किसी ने कुछ देखा तो नही
इसी भय में जी रहे है लोग
क्या सच, छिपा सकते हो
क्या झूठ पचा सकते हो
यह सच से आंख मुंदने जैसा है
स्वयं को स्वयं से धोखा देने जैसा है
लोग न सही, परमात्मा तो देखता है
फिर काहे को सच से मुंह मोड़ता है।

आत्मा की आवाज से

आत्मा की आवाज से
निर्णय लीजिए भरपूर
जन्म होगा न्याय का
अन्याय हो जाएगा दूर
निराकार आत्मा
नही करती भेदभाव
न्याय की तराजू में
है समता का भाव
आत्मा की आवाज को
जो अनदेखा करते है
वे विवेकहीन हो जाते है
अयोग्य निर्णायक कहलाते है।

सन 1922 में परमात्मा ने

सन 1922 में परमात्मा ने
रमा को धरा पर भेजा था
सिंध प्रांत में जन्म लिया
जन्म से धार्मिक नाता था
14 वर्ष की आयु में ही
ईश्वरीय मार्ग अपना लिया
राजयोग का अभ्यास किया
पवित्रता को पा लिया
ब्रह्माबाबा की पालना लेकर
रमा ज्यो ज्यो बड़ी हुई
अंतर्चेतना जागृत हुई
रमा यूं प्रकाशमान हुई
तपस्या में जब सफल हुई
प्रकाशमणि नया नाम मिला
दिव्य व्यक्तित्व चमका बहुत
ब्रह्माकुमारीज मुकाम मिला
शिव परमात्मा की बेटी बनकर
ब्रह्माकुमारीज को आगे बढाया
दुनियाभर में अध्यात्म पहुंचाकर
चरित्र निर्माण का पाठ पढ़ाया
विश्व शांति की संवाहक रही
ध्यानयोगिनी मिशाल रही
ओम मंडली की शान रही
ब्रह्माबाबा-आज्ञा आधार रही
अंतर्मन को ज्ञान प्रकाश मिला
प्रकाशमणि कोहिनूर मिला
ब्रह्माकुमारीज विस्तार का डंका
उन्होंने दुनिया मे फैहराया
नेतृत्व करके नारी शक्ति का
ईश्वरीय यज्ञ बखूबी चलाया
सन 2007 में दादी का
बुलाया परमधाम से आ गया
खुशी खुशी अलविदा हुई
स्मृति भाव बस रह गया।

कभी अपने लिए भी

कभी अपने लिए भी
समय संभाल कर रख
कभी स्वयं से स्वयं का
संवाद तो करके रख
किस लिए आया यहां
आखिर में जाना कहां
कौन है नियंता हमारा
तहकीकात करके रख,
हवा,पानी,भोजन मिला
तुझे ही नही सबको मिला
कौन है यह सब देने वाला
उसे खोजकर रख
उससे दिल लगाकर रख
उसे अपना बनाकर रख।

माना शब्द तुम खूबसूरत हो

माना शब्द तुम खूबसूरत हो
लेकिन तुमसे भी खूबसूरत है
तुम्हारी वह भाव अंतर्चेतना
जहां जन्म लेता है तुम्हारा
शब्द सागर सा संसार
जहां बुने जाते है स्वप्न
यही स्वप्न जब शब्द बनकर
कलम को रास्ता दिखाते है
तब जन्म होता है नई उम्मीदों का
एक नई शुरुआत के रूप में
एक नई सूरत के रूप में
नया शब्द संसार रचने के लिए।

ख्वाइशों ने हमसे कहा

ख्वाइशों ने हमसे कहा
चलो एक ख्वाब बूनते हैं ।
दिल हंसकर बोला
इसके लिए धागा चाहिए
धागा जो जीवन डोर है
नही मिला इसका छोर है
इससे तो बेहतर है
रेडीमेड ख़्वाब खरीद ले
अव्यक्त लोक की मंडी से
लेकिन वहां जाने के लिए
आत्मा से परमात्मा तक का
याद का सफ़र करना होगा
राजयोग के रथ में बैठकर।

अपने अवगुण देखकर

अपने अवगुण देखकर
तौबा करलो आज
अवगुण के अवसान से
स्वयं पर करोगे नाज़
अवगुण की विदाई से
गुणों का आता राज
जो गुणों में अव्वल हो
सिर पर सजता ताज
गुणवान बनने पर ही
जीवन में होता परिवर्तन
मनुष्य से देवता बनने का
यही मन्त्र है स्वपरिवर्तन।

जाना है हर किसी को

जाना है हर किसी को
इस जहान् को छोड़ कर
कुछ नही हाथ आएगा
इस सच्चाई को भूलकर
जब तक सांस बची है
तभी तक जीवन है भाई
अगर सांस रुक गई तो
देह भी मिटटी हो जाई
जब जाना ही है जहान से
कुछ अच्छे काम कर चलो
जो बुराइयां व्याप्त है
उन्हें जड़ से खत्म कर चलो
जीवन परमात्मा की देन है
परमात्मा के ही नाम कर चलो।

एक छोटी सी गलती ने

एक छोटी सी गलती ने
अरमान सारे बिखेर दिए
जिस हिमालय पर नाज़ है
वही प्रलय के पंख खोल दिए
ग्लेशियर पिखल रहा है
पहाड़ की जड़े कमजोर है
स्वार्थ में उलझा मानव अब
मनमानी पहाड़ से कर रहा
पेड़ काटकर पहाड़ के वह
कमजोर पहाड़ को कर रहा
विकास के नाम पर सरकार ने
सड़को का जाल बिछा दिया
पेड़ कट गए पहाड़ उखड़ गए
प्रकृति का विनाश हो रहा
नदियों तक मे पिलर खड़े है
वन्य जीवों को आश्रय नही
भूख-प्यास में जीव भटक रहे
आम जन तक सुरक्षित नही
इंद्र देव भी कुपित हो गए
प्रलय पहाड़ पर मची हुई
बस्तियां तक ध्वस्त हो गई
जिंदगियां बहुत दफन हो गई
सड़के बह गई,पहाड़ दरक गए
नदियों में उफान मचा है
देवभूमि में कयामत आई
कुदरत क्यो हमसे खफ़ा है
काश!पहाड़ को पहाड़ समझते
पेड़ो की रक्षा मिलकर करते
नदियों के रास्ते बंद न करते
ऐसा अगर हमने किया होता
स्वर्ग सा सुख हमने पाया होता।

व्यक्ति नही फ़रिश्ता था

व्यक्ति नही फ़रिश्ता था
उनसे गजब का रिश्ता था
जीवन मे उनके कविता थी
वाणी मे बहुत मधुरता थी
सोच समझकर बोलते थे
एक एक शब्द तोलते थे
दल से ऊंचा कद था उनका
सत्यवादी मन था उनका
राष्ट्र के वे सजग नेता थे
पत्रकारिता के प्रणेता थे
भारत के अनूठे रत्न बने
मौत से तो कभी नही डरे
मौत से उनकी ठन गई थी
पर 15 अगस्त आ गई थी
राष्ट्रीय पर्व मनवाकर गए
मौत को ही हराकर गए
अटल जीवित रहेंगे सदा
अमरता को पाएँगे सदा
परमात्मा उन्हें आत्म शांति दे
फिर से उन्हें माँ भारती दे।

राखी बंधवाई है तो निभाओ भी

राखी बंधवाई है तो निभाओ भी
बुराइयों को दूर अब भगाओ भी
एक रस्म नही एक संकल्प है ये
इस संकल्प को पूरा करो भी
बहन चाहती है दीर्घायु रहे आप
व्यसन से खुद को बचाव भी
रक्षा का वचन दिया बहन को
अब उस वचन को निभाओ भी
खुद तो बहन के साथ नही रहोगें
बहन रहेगी कैसे सुरक्षित बताओ भी
परमात्मा हो सकते है बहन के रक्षक
बहन की रक्षा का योग लगाओ भी।

ग्रहस्थ आश्रम में रहकर

ग्रहस्थ आश्रम में रहकर
हम बन सकते सन्त समान
मन सन्तों सा हो जाए
घर मन्दिर के समान
व्यर्थ के विचारो पर
अगर लग जाए विराम
नकारात्मकता दूर हो जाए
घर बन जाए स्वर्ग समान
देह अभिमान छोड़कर
जब हम विदेही बन जायेगे
सच मानिए तभी से हम
ईश्वरीय सन्तान कहलायेगे।

आजादी आंदोलन का नाता

आजादी आंदोलन का नाता
अगस्त क्रांति है अनूठी गाथा
सन 1857 से पहले रची गई
इतिहास बनी जो क्रांति गाथा
रुड़की के कुंजा बहादुर गांव की
इतिहास में दर्ज है अमर कहानी
जब 1824 में बगावत करके
खूब धूल चटाई थी अंग्रेजों को
राजा विजय सिंह ने इतिहास रचा
हक दिलवाया था किसानों को
लड़ते लड़ते शहीद हो गए थे
सिर नही झुकाया था राजा ने
152 को वट वृक्ष पर लटकाया
बलिदान दे दिया वीरो ने
राष्ट्र प्रेम की यह गौरव गाथा
कुंजा गांव में हर कोई गाता।

निराकार परम शिव है

निराकार परम शिव है
जो है सबके भगवान
जो शिव का स्मरण करें
मिले तीन लोक का ज्ञान
आदि,मध्य,अंत के
रचियता है शिव परमात्मा
जब जब पाप बढ़े धरा पर
हो जाता सबका खात्मा
पांच हजार साल के कल्प मे
सतयुग,त्रेता,द्वापर आते
कलियुग,संगम पाप धरा के
दुनिया को मायावी बनाते
सुखद परिवर्तन शिव ही लाते
पतित से सबको पावन बनाते।

मित्र वही जो निभा सके

मित्र वही जो निभा सके
समय पर काम आ सके
सगो से भी निकट रह सके
अपनत्व खुशबू बिखेर सके
गरीबी अमीरी का भेद न हो
जाति धर्म का छेद न हो
विश्वास कभी डगमगा न सके
मित्र की बुराई भा न सके
मित्र को सद्ऱाह दिखा सके
विकार उसके भगा सके
सत्य समान उसे बना सके।

काल बनकर बरसे बादल

काल बनकर बरसे बादल
फट फटकर बरसे बादल
पत्थर-पेड़ सब बह गए
खेत खलिहान घर बह गए
मलबे में तब्दील बस्तियां
दफन हो गई कई जिंदगियां
इंद्रदेव ने कहर बरपाया
पहाड़ फिसल धरा पर आया
प्रकृति के दोहन का फल यह
पहाड़ को नंगा करने फल यह
सड़क नही अब पेड़ लगाओ
पहाड़ को जड़ से मजबूत बनाओ।

अहंकार है शत्रु बड़ा

अहंकार है शत्रु बड़ा
रहता है पास खड़ा
नज़र कही आता नही
हमसे दूर जाता नही
मन के किसी कोने में
जगह अपनी बनाता है
जब भी अवसर मिलता
हावी वह हो जाता है
काम,क्रोध,मोह,लोभ
भाई इसी के होते है
अहंकार के आने पर
वे दौड़े चले आते है
विनम्रता का एहसास
अहंकार का ही रूप है
बचकर रहो इससे
यही असली यमदूत है।

वर्षा ऋतु में प्रकृति पर

वर्षा ऋतु में प्रकृति पर
हरियाली मुस्कुराहट आती है
सूखे वृक्ष पर भी जब
नई कोपलें फूट जाती है
गर्मी से राहत देने को
बादल बरस कर जाते है
नारी शक्ति निर्जला रहकर
पति कल्याण कामना करती है
परमात्मा शिव की साधना कर
क्रोध मुक्ति का संकल्प करती है
रिमझिम सावन की फुहारों में
झूले की सैर भी होती है
प्रकृति में खिले पुष्पो की भांति
नारी खुलकर तब हंसती है।

मन मे मैल कतई मत रखना

मन मे मैल कतई मत रखना
तन को सदा स्वच्छ रखना
तन-मन दोनो खिल जायेगे
परमात्मा याद जगाये रखना
धूप और छांव जीवन की रस्मे
समान भाव को बनाये रखना
छोटे बड़े मे भेद कभी न हो
जाति धर्म की दीवार खड़ी न हो
मानवता का पाठ पढ़े रखना
देश को अखण्ड सुरक्षित रखना
स्वयं से पहले देश को तरज़ीह
देश में तरक्की तो खुशहाल जी।

शिव को जिसने पा लिया

शिव को जिसने पा लिया
हो जाएगा कल्याण
शिव मात्र एक परमात्मा
जो देते सबको मान
याद करने मात्र से
मिल जाते है शिव
पवित्र राह अपनाने से
खुश हो जाते शिव
पिता सबके शिव है
रूप है निराकार
आत्म स्वरूप में हम रहे
न रहे देह विकार
आओ जीवन परिवर्तन हेतु
करे शिव आवहान
इह लोक सफल होगा
मिले परलोक का ज्ञान।

रिमझिम रिमझिम वर्षा रानी

रिमझिम रिमझिम वर्षा रानी
रोज सुना रही हमे कहानी
गरज गरज कर बादल आते
झम झमाझम पानी बरसाते
विकास की भी पोल खोल रहे
बदहाली की कहानी बोल रहे
गरीबो की छत टपक रही है
सेठो के यहां पकोड़ी बन रही है
उधर अमेरिका टैरिफ लगा रहा
इधर राजनीतिक शोर मच रहा
आस्था बेचारी मौन हो गई है
मां गंगा तक मैली हो गई है
देश बचाने आगे आना होगा
अध्यात्म का अलख जगाना होगा।

आज मुंशी याद किए जा रहे है

आज मुंशी याद किए जा रहे है
प्रेमचंद के गीत गाए जा रहे है
लमही से लेकर देश-विदेश तक
उनकी जयंती मनाई जा रही है
अलमारियों की दराज़ खोलकर
नमक का दारोगा,पूस की रात
दो बैलो की जोड़ी,गोदान पर
पड़ी धूल को हटाया जा रहा है
पुस्तकालयों का भी यही हाल है
मुंशी प्रेमचंद वहां भी बेहाल है
नई पीढ़ी तो जानती ही नही
मुंशीजी की मुफ़लिसी के बारे में
कहानियों-उपन्यासों के बारे में
काश,उन्हें बच्चों को पढ़ाया होता
प्रेमचंद संस्कार नज़र आया होता।

राह हमारी तकता परमात्मा

राह हमारी तकता परमात्मा
कैसी है हमारी दिव्य आत्मा
हम उनको भूले रहते है
किस धुन में खोए रहते है
अमृत बेला उठ करके हमको
परमात्मा को प्रणाम करना है
कुछ अपनी सुनानी है प्रभु को
कुछ संवाद उनसे करना है
कुछ भी खाऊँ सबसे पहले
प्रभु की सेवा में अर्पण करू
यह जीवन प्रभु की देन है
उन्ही को मैं धन्यवाद करू।

प्रत्यक्षदर्शी बनकर

प्रत्यक्षदर्शी बनकर
देखो यह संसार
जीवन रूपी ड्रामे में
आप है एक किरदार
जो भूमिका मिली है
उसे निभाते जाना है
परमात्मा है निर्देशक
उनका हुक्म बजाना है
भूमिका पूरी होते ही
यहाँ से चले जाना है
संसार की यही गति है
यही जीवन का ताना बाना है
जो आया है, उसे जाना है
जो गया है उसे फिर आना है।

दुःख है परीक्षा की घड़ी

दुःख है परीक्षा की घड़ी
सुख है परीक्षा का प्रतिफल
जो भी दुःख को सह गया
हो गया उसका जीवन सफल
सुख दुःख है धूप छाँव जैसे
उन्ही सा जीवन बदलता वैसे
दुःख में धैर्य जो खोता नही
सुख में अहंकार जिसे आता नही
दोनों में रहते जो एक समान
वही जीवन मे बनते है महान
जीवन उन्ही का सुखमय होता है
मन परमात्मा से जिसका जुड़ता है।

सूरज मेरी मुठठी में आया

सूरज मेरी मुठठी में आया
दूर हो गई अंधेरो की छाया
मुझसे चाँद तारे चमकने लगे
गर्दिश के सितारे बदलने लगे
किस्मत बदलने का आगाज़ है
गैर भी बुला रहे यही राज है
‘मेरी मुठ्ठी ‘यह अहंकार न हो
नियति को श्रेय यह आभास हो
तभी सूरज टिक सकेगा मुठ्ठी में
जग रोशन हो सकेगा मुठ्ठी में
किस्मत भी बुलन्द हो जाएगी
परमात्म कृपा आ जायेगी।

वर्तमान अगर अच्छा है

वर्तमान अगर अच्छा है
सब कुछ अच्छा जानिए
वर्तमान की उपलब्धियों को
भविष्य से बस आंकिए
खिलता पुष्प वर्तमान है
सुगन्ध सभी को देता है
मंदिर में होगा या शव पर
इस फिक्र को नही ढोता है
कल क्या होगा ,सोचना छोड़िए
आज अच्छा हो,इतना करिए
आज को अच्छा बना लीजिए
स्वर्णिम भविष्य पा लीजिए।

आत्मा जैसा ही रूप है

आत्मा जैसा ही रूप है
परमात्मा कहलाते हो
ज्योतिबिंदु से महीन हो
सारा ब्रह्मांड समा लेते हो
दुःखो को हर लेते हो
संकटमोचक बन जाते हो
प्रेम,दया,सुख के सागर
करुणा मन मे उपजाते हो
भक्तो की भक्ति सुनते हो
ज्ञान का पाठ पढ़ाते हो
जो बनते परमात्म समान
उन्हें वारिस अपना बनाते हो।

अभिवादन करना किसी का

अभिवादन करना किसी का
है खुशी का काम
दूसरे का मान बढाकर
खुद को मिलता सम्मान
मन मे दुसरो की इज्जत होती
गुण बढ़ता निरहंकार
स्वयं को छोटा समझने से
व्यक्ति बनता सदा महान
पर जो अभिवादन पाकर भी
पचा न पाये अपनेपन को
अहंकार के वशीभूत रहकर
उपहास उड़ाये अपनेपन को
उसकी ख्याति छू न पाये
सफलता के सोपान को
परमात्म प्यार भी मिल न पाये
ऐसे निष्ठुर इंसान को।

शिव- पार्वती याद का पर्व

शिव- पार्वती याद का पर्व
पावनता के उदय का पर्व
शिव रचता है, शक्ति रचना है
इसी ज्ञान को धारण करना है
रचता में जब रचना खो जाती
प्रकृति तभी जीवंत हो जाती
शिवरात्रि का आगाज़ होता
शिव सर्वसुख,आंनद दाता
पार्वती प्रकृति जगत माता
स्नेह,पोषण,ममत्व से नाता
नारी को प्रथम पूज्य बनाया
गृह लक्ष्मी का सम्मान पाया।

परमात्मा शिव की महिमा

परमात्मा शिव की महिमा
हरिद्वार भूमि में छाई है
सड़के सारी जाम हो गई
व्यवस्था तक चरमराई है
भोलो में है उर्जा का संचार
कदम बढ़ रहे शिवालय द्वार
कंधो पर कांवड़ ले जा रहे है
बम बम भोले बोले जा रहे है
भले ही पड़े गए पैरों में छाले
चले जा रहे फिर भी मतवाले
कुछ कांवड़ियों से आहत है मन
हिंसा भाव नही शिव को पसंद
फिर क्यों बवाल काटते कांवड़िए
निर्दोषों पर वार करते कांवड़िए।

‘शिव भोले’ जयकारे से

‘शिव भोले’ जयकारे से
गुंजायमान हरिद्वार है
नई नई कांवड़ सज रही
गंगा जल भरी गगरी है
भक्तिभाव से कांवड़िए
बम बम भोले कर रहे
कंधे पर कांवड़ लेकर
शिवालयों तरफ चल रहे
उधम नही, शांति की
कांवड़ पावन यात्रा है
मन की मुराद पूरी हो
शिव से यही आराधना है।

एक निवेदन मेरा भी

एक निवेदन मेरा भी
सुन लो आप ध्यान से
कुछ तो समय निकालो
अपने लिए भी काम से
जीवन सारा बीत न जाये
रोटी,कपड़ा,मकान मे
परमात्मा का नाम लेना भी
न आ पाये ख्याल में
जीवन है प्रभु की देन
कुछ अपेक्षा है आपसे
व्यस्तता से समय निकालो
मिल लो परमात्म बाप से
वही तुम्हारा मीत सखा है
वही माता पिता तुम्हारे
उन्ही में ध्यान लगा लो
मिट जाएंगे संकट सारे।

हर रोज सोचिए

हर रोज सोचिए
करे कोई अच्छा काम
हर बच्चा खुश रहे
जैसे बाल भगवान
जाति धर्म को छोड़कर
देखे सबमे इंसान
जिसमे भी प्रतिभा हो
उसी को दे प्रोत्साहन
कोई बच्चा घर न रहे
स्कूल जाकर पाये ज्ञान
भविष्य भारत का
उज्ज्वल हो
विश्व मे कहलाये
भारत मेरा सबसे महान।

लोभ ,मोह,अहंकार में

लोभ ,मोह,अहंकार में
डूबे रहे जो जीवनभर
हिसाब लगाया कमाई का
हाथ न आई रत्तीभर
जिनपर लुटाया धन अपना
वे पीठ दिखाकर चले गए
जिन्हें अपना समझते रहे
उनसे ही हम छले गए
अच्छा हुआ परमार्थ करके
परमात्म पथ पर आगे बढ़े
जीवन से अंधियारा छंटा
उम्मीदों का सूरज उगा
सुसंस्कारो से लबरेज हुए
शांत,सुखी और सम्पन्न बने।

हरेला पर पौधारोपण

आज सरकारी छुट्टी है
हरेला पर्व मनाने की
हमारी भी इच्छा है
नये वृक्ष लगाने की
छुट्टी का उपयोग इससे
बेहतर क्या हो सकता है
प्रकृति के प्रति कृतयज्ञता का
यह सुअवसर हो सकता है
जुगाड़ लगाकर वन विभाग से
एक पौधा हम भी ले आए
मौहल्ले के लोग एकत्र हुए
एक फ़ोटोग्राफ़र बुला लाए
एक पौधे के रोपण में
पूरा मौहल्ला जुट गया
कैमरे में लोग तो आ गए
पर बेचारा पौधा छिप गया
दस मिनट के कार्यक्रम मेंत
रौनक हरेला की बढ़ गया
एक दूसरे को बधाइयां दी
शुभकामनाओं की झड़ी लग गई
हरेला के बाद जलपान में
लज़ीज़ व्यंजन हमने उड़ाये
पर्यावरण संरक्षण को लेकर
भाषणों के भी दौर चलाएं
कार्यक्रम समाप्त होने पर
फिर लोग घरों को लौट गए
जिस पौधे का रोपण हुआ
उसे असहाय हम छोड़ गए
सुरक्षा पौधे की कोई कर न सका
एक मवेशी न जाने कहां से आया
उसने पौधे को भोजन बनाया
निवाला बनाकर उसे निगल गया
अवशेष पौधे के सब मिटा गया
अगले दिन सब अखबारों में
दिवंगत पौधे की याद छपी थी
फोटो में दर्जनों लोग खड़े थे
पर पौधे की तस्वीर नदारद थी
हरेला पर्व ऐसे न मनाओ
सच मे पौधे जरुर लगाओ।

यह कैसी शिव की भक्ति है

यह कैसी शिव की भक्ति है
हिंसा में आसक्ति है
भगवा पहनकर भी तन पर
विकार ग्रसित प्रव्रत्ति है
शिव पूजा अगर मकसद है
कांवड़ ले जाना सद्कर्म है
गंगा जल से निर्मल स्वयं बनो
शिव भक्ति शांत भाव से करो
लाठी-डंडो का त्याग करो
डीजे का बहिष्कार करो
जो व्यवस्था बनी उस पर चलो
धैर्य गुण आत्मसात करो
शिव सहज ही खुश होंगे
जलाभिषेक स्वीकार करेंगे
ऐसा हो तो वंदन होगा
जगह -जगह अभिनन्दन होगा
बम -बम भोले जयघोष करेंगे
इंसान से फिर देवता बनेंगे।

( मेरे जीवन की साथी डॉ सुनीता पुण्डरीक ,एमए संस्कृत,बीटीसी,विद्या वाचस्पति(मानद),विद्या सागर(मानद) को उनके जन्मदिवस पर हार्दिक बधाई,परमात्मा की कृपा सदैव बनी रहे, )

डॉ सुनीता पुण्डरीक

ईश्वरीय भक्ति में रहती हो
कर्तव्य पथ पर चलती हो
झँझवातो से नही घबराती
अविरल नदी सी बहती हो
शुभकामना भले की करती
सबकी हितचिंतक रह्ती
निर्लेप भाव सा जीवन है
धूप छांव दोनो ही सहती
मां शांति की प्यारी बेटी
प्रकाशवती की राजदुलारी रही
मुझको कृष्ण सरीका चाहा
स्वयं राधा सी बनकर रहती
नारी शक्ति प्रतिबिंब सुनीता
पावन प्रिय सखी सुनीता।

नफरत में नफा नही

नफरत में नफा नही
प्यार गजब उपहार है
सबका पिता परमात्मा
फिर कैसी तकरार है
भाईचारे में अपनत्व होता
मिलता सबसे प्यार है
हर कोई अपना कहे
सुखमय होता संसार है
रूप रंग से भिन्न मानव
आत्मस्वरूप समान है
परमात्म याद बनी रहे
होता 21 जन्म का उद्धार है ।

बम बम भोले की गूंज है

बम बम भोले की गूंज है
सावन की रिमझिम बरस रही
शिवभक्तों की भीड़ अपार
मंदिरो के दर्शन कर रही
जगह जगह भंडारे सजे है
कांवड़ियों की सेवा के लिए
पुलिस-प्रशासन जुटा हुआ है
कांवड़ियों की सुविधा के लिए
शिवभक्त हो सद्गुण अपनाओ
कांवड़ यात्रा में सयंम अपनाओ
जरा सी बात पर हिंसा न करो
धर्म के नाम पर विभाजन न करो
शिव प्रसन्न होते है उन्ही पर
विकार मुक्त रहते जो धरा पर।

जैसी दृष्टि वैसी सृष्टि

जैसी दृष्टि वैसी सृष्टि
विधि का यही विधान
ईश्वर को याद करो तो
आकर देते स्वयं ही ज्ञान
दृष्टि अच्छी रखने के
अनेक होते है फायदे
सदगुणो का भण्डारण होता
जीवन जीने के आते कायदे
अच्छी दृष्टि देने से
होता है ह्रदय परिवर्तन
सभी प्रसन्न रहते सदा
खुशियो में होता संवर्धन।

प्रेरक प्रेमलता बहन

जीवन समर्पित किया ईश्वर को
ईश्वरीय ज्ञान की संवाहक बनी
साधु-संतों को भी ज्ञान दिया
अबोध को ज्ञान एहसास दिया
ईश्वरीय याद में रहती थी सदा
सबको अपना बना लेती सदा
शांति स्वरूपा, शिव लाडली
सदकर्म को रहती उतावली
बचपन से अच्छा बनने की ललक
योग में पहुंचती परमात्मा तलक
अनूठा उनका तपस्विनी जीवन
प्रेरक था प्रेम बहन का जीवन।

इंसान बन्द मुठ्ठी लेकर जन्मता है

इंसान बन्द मुठ्ठी लेकर जन्मता है
भाग्य अपना बनाता है
जैसे कर्म करता जाता है
भाग्य उसका बदलता जाता है
सदकर्म से जीवन निखरता
बुरे कर्म से जीवन बिखरता
जैसा करोगें वैसा भरोगे
यह परिणाम हर रोज निकलता
फिर भी हम समझ नही पाते
दोष भाग्य पर देने लग जाते है
जो दौलत कमाई यही रह जायेगी
मुठ्ठी हाथ की खुली ही जायेगी।

जैसी करनी वैसी भरनी

जैसी करनी वैसी भरनी
है कुदरत का दस्तूर जी
न्याय सदा करते परमात्मा
बदसूरत हो या कोई हूर जी
सकारात्मक सोच से हम
कर सकते है तनाव को दूर
प्रेम से बढ़ता अपनत्व रिश्ता
वैमनस्य करता अपनों से दूर
शांत मन से चिंतन करों
अच्छा सोचो अच्छा करों
ईश्वरीय मुराद मिल जाएगी
पहले स्वयं पर विश्वास करों ।

जीवन में फूल है तो कांटे भी

जीवन में फूल है तो कांटे भी
कही धूप है तो कही छाँव भी
कही रिश्तों में मिठास है
कही अपनों में खटास है
कही व्यर्थ चिंतन में उलझे है
कही विकारों से घिरे है
मकड़ी के जालों की तरह
कब तक उलझते रहेंगे हम
कभी एकांत में जाने स्वयं को
कभी पहचाने परमात्म को
हम शांत स्वरूप आत्मा है
शान्ति ही हमारा स्वधर्म है
पवित्रता हमारा आभूषण है।

मन मे बुरे विचार न आए

मन मे बुरे विचार न आए
संस्कार दूषित होने न पाए
अपनी अवस्था खराब न हो
अच्छाई का अवसान न हो
सद्गुण मिले जो किसी से
ग्रहण करों अपना समझ के
अच्छा सोचो ,अच्छा बोलो
वाणी में मिश्री सी घोलो
सबसे अच्छे बन जाओगे
बीमार कभी न हो पाओगे
आत्मा में पवित्रता होगी
परमात्मा में जब निष्ठा होगी ।

विकर्मो से जो घिरा रहता

विकर्मो से जो घिरा रहता
होता सदा वहीँ बदनाम
मन जिसका अशांत रहता
नही मिलता उसको ज्ञान
सद्कर्म जिसने भी किये
उसी का होता यशज्ञान
जीवन संवारता वह अपना
जग में मिलता उसे सम्मान
प्रेरक रूप में ख्याति मिलती
मिलता सदा सन्तोष का दान
शांत स्वरूप आत्मा रहती
होता उसे ही परमात्म ज्ञान।

जीवन मे जो सदराह दिखा दे

जीवन मे जो सदराह दिखा दे
तीनो कालो की बात बता दे
स्वयं का स्वयं से बोध करा दे
नश्वर देह का एहसास भूला दे
आत्म स्वरूप में रहना सीखा दे
ऊंगली पकड़कर हमे चला दे
जीवन जीने की कला सीखा दे
हे परमात्मा ऐसा गुरु बता दे
ऐसा गुरु मिला न जगत में
धरती,आकाश, न भू मंडल में
हम सबके रचियता तुम हो
गुरु,शिक्षक परमात्मा तुम हो।

उगता सूरज देखकर

उगता सूरज देखकर
हर कोई होता प्रसन्न
नवसृजन जब भी हो
मनाओ नया जश्न
कालचक्र रुकता नही
करता अपना काम
उगते सूरज की सुबह है
ढलते सूरज की शाम
जीवन रहस्य भी यही है
कभी सुबह कभी शाम
परमात्म ज्ञान जिसे मिले
सदा रहे बिना अभिमान।

परमात्म याद में खोये रहो

परमात्म याद में खोये रहो
शान शौक़त से दूर रहो
मन के आवेग से उड़ान भरो
परमधाम की सैर करो
ईश्वरीय बोध सहज हो जाएगा
ईश्वर से संवाद जुड़ जाएगा
स्वेत वस्त्रो में स्वेत मन होगा
पवित्रता का प्रतिबिंब होगा
मोह- माया पास न आएगी
संसारिक विरक्ति हो जाएगी
प्रारब्ध भोग कर प्रयाण होगा
जीवन यथार्थ का ज्ञान होगा।

रोम रोम में बसा लो

रोम रोम में बसा लो
परमात्मा की याद
जब तुम्हे अवसर मिले
करो परमात्म संवाद
अगर कुछ चाहिए तुम्हे
हक से मांगो ईश्वर से
पिता पुत्र का रिश्ता है
कैसी उनसे फरियाद
रिश्ता भी पक्का उनसे
तुमको ही निभाना होगा
परमात्मा जो भी कहे
वही तुम्हे अपनाना होगा ।

सुख ईश्वर की देन है

सुख ईश्वर की देन है
दुःख कर्मो का लेखा
जैसे कर्म करेंगे हम
वैसे बनेगी भाग्य रेखा
कर्म खराब अगर हमारे
दुःख हिस्से में आएगा
सद्कर्म किए अगर हमने
सुख चैन हमे मिल जाएगा
ईश्वर परमपिता हमारा
करता नही कभी बुरा हमारा
वह तो अच्छा ही करता है
पर प्रारब्ध आड़े अड़ता है
जैसा किया वैसा भरोगे
ईश्वर इसमे कुछ न करेंगे।

सिर्फ संवारे आज

सिर्फ संवारे आज
संवर जायेगे काज़
कल की चिन्ता में
न बिसारो आज
आज है तो कल है
आप है तो हम है
रिश्तों का यही अंदाज
करे मधुरता का आगाज़
यही मधुरता एक बेहतर
समाज बनाएगी
हमे स्वयं की
पहचान कराएगी
इसी से नई दुनिया
बन जायेगी
ईश्वरीय कृपा
सब पर नजर आएगी ।

पिता हमारा है परमात्मा

पिता हमारा है परमात्मा
चिंता का कर दो खात्मा
सारी फिक्र वही करेगा
सारे दुःख भी वही हरेगा
हमें तो बस कर्म करना है
कर्म को ही धर्म समझना है
रोटी,कपड़ा ,मकान मिलेगा
सुख,सम्रद्धि, सम्मान मिलेगा
सन्तोष को गहना बना लो
ओमशांति की माला बना लो
सब कुछ अच्छा हो जाएगा
परमात्म पिता मिल जाएगा।

मिले सफलता सबको

मिले सफलता सबको
यह दुआ दीजिए
सबको मिले सुख शान्ति
ऐसी शुभ चाहत कीजिए
तरक्की पर सभी की
खुश होना सीख लीजिए
खुद भी तरक़्क़ी पा जाओगे
यह आज़माइस कर लीजिए
कोई भूखा न रहे कही पर
ऐसा कुछ प्रयास कीजिए
कुछ समय गुज़रे प्रभु याद में
राजयोग अभ्यास कीजिए।

अच्छा कर्म करने पर

अच्छा कर्म करने पर
असीम सुख मिलता है
ईश्वरीय सेवा करने पर
संतोष बहुत मिलता है
परहित सेवा करने पर
आंनद बहुत मिलता है
अपनत्व भावना रखने पर
बन्धुत्व सुख मिलता है
पराया नही कोई जगत में
सबमें प्रेम झलकता है
आत्मस्वरूप में जीते जो
शांति गुण उनमे मिलता है
परमात्म याद में रहते है जो
सतयुग उन्ही से बनता है।

राजयोग के अभ्यास से

राजयोग के अभ्यास से
जीवन बदल जाता है
जो कमियां है मनुष्य में
सुधार उनमे हो जाता है
स्वयं को जानने के लिए
राजयोग बड़ा कारगर है
परमात्मा से मिलने का
यह सहज एक माध्यम है
राजयोग अपनाने से
विकार दूर हो जाते है
जो राजयोग पथ पर चलते
इंसान से देवता बन जाते है।

यह जिंदगी है पल दो पल की

यह जिंदगी है पल दो पल की
हमने समझ ली बरसो बरस की
भूल जाते है एक दिन जाना है
न साथ लाए न लेकर जाना है
नवजात थे तो विकार मुक्त रहे
बड़े हुए तो विकारग्रस्त हो गए
अगर बुद्धि से काम लिया होता
ईर्ष्या, द्वेष त्याग दिया होता
लोभ,मोह ,क्रोध भी न आ पाते
तिल तिल कर हमें जला न पाते
अगर ‘काम’ को शत्रु मान लिया होता
परमधाम मार्ग जान लिया होता।

अमृतसर की पावन धरा पर

अमृतसर की पावन धरा पर
एक दिव्य कन्या ने जन्म लिया
राधे नाम से पुकारी गई थी
देवी शक्ति का उदभव हुआ
परमात्मा शिव की लाडली बेटी
ननिहाल सिंध में जा पहुंची
ओम मण्डली सत्संग से जुड़कर
दादा लेखराज की बेटी बनी
युग परिवर्तन करने को जगत का
परमात्मा ने उन्हें निमित्त बनाया
राधे हो गई सरस्वती जगदम्बा
नारी शक्ति का मान बढ़ाया।

एक दिन के योग दिवस से

एक दिन के योग दिवस से
अखबारों में सेहत बन गई
बीतते ही योग दिवस के
जिंदगी पुरानी पटरी पर आ गई
सूरज चढ़े उठते है अब
भूल गए योग की महिमा
खा रहे है देश को नेताजी
अकूत सम्पत्ति से सेहत बना
योग क्या व्यायाम था
सरकार का पैगाम था
तारीख बीती योग खत्म
बजट का पैसा हजम
योग का अर्थ जोड़ है भाई
राजयोग बेजोड़ है भाई
तन- मन दोनों स्वस्थ रहेंगे
विकार सारे मिटकर रहेंगे
पहले स्वयं को जान लीजिए
फिर प्रभु को पहचान लीजिए
प्रभु से योग अगर लग जाएगा
तब जीवन सफ़ल हो पाएगा।

आपकी जिंदगी में

आपकी जिंदगी में
सदा सवेरा हो
जहाँ आप हो
वहां न अँधेरा हो
दिल की आँखों से
देखो स्वयं को
आप चमकता हुआ
एक सितारा हो
आपकी आत्मा है
एक ज्योति बिंदु
परमात्मा भी है
वही ज्योति बिंदु
ज्योति का ज्योति से
योग लगा लो
सहजता से फिर
परमात्मा को पा लो।

योग दिवस की आहट हो गई

योग दिवस की आहट हो गई
महामहिम उत्तराखंड आ गई
राष्ट्रपति निकेतन तैयार हो गया
महामहिम का स्वागत हो गया
योग दिवस में प्रतिभाग करेंगी
राजयोग का भी अभ्यास करेंगी
तन-मन दोनों स्वस्थ हो जाएंगे
योग के पैगाम दूर तक जाएंगे
योग का अर्थ जोड़ना मानिए
पर व्यायाम को बेजोड़ मानिए
शरीर के लिए वरदान है दोनों
अशांत मन का समाधान है दोनों
राजयोग का आत्मा से है नाता
परमात्मा से भी जुड़ता है नाता
विकार सारे खत्म हो जाते है
तन -मन सब पावन बन जाते है।

संसार है दुनियां का मेला

संसार है दुनियां का मेला
नही यहां स्थाई आशियाना
असली घर तो परमधाम है
जहाँ है हम सबको जाना
फिर काहे का झगड़ा करते
काहे को द्वेष-बैर हम रखते
विकारो से क्यों घिरे हुए है
माया मोह में क्यों फंसे हुए है
मेरी मानो छोड़ो यह सब
छोड़ दो यह झूठी मोह माया
परमात्मा में ध्यान लगाओ
जन्म अपना सफ़ल बनाओ।

चिंतन प्रभु का करते रहो

चिंतन प्रभु का करते रहो
संवर जाएंगे सब काम
अशांत मन भी शांत होगा
घर बन जाएगा सुखधाम
घर की नारी बने लक्ष्मी
नारायण समान नर समाज
प्रभु चिंतन से संवर जाएगा
लोक -परलोक का ताज़
यह जीवन श्रेष्ठतम होगा
अगला जन्म स्वर्णिम जान
परमात्म पथ पर चलने से
मिलेगी शांति अविराम।

सुबह उठकर आओ करें

सुबह उठकर आओ करें
परमात्मा का ध्यान
दिनभर आपका शुभ होगा
परमात्मा संवारेगे सब काम
परमात्मसंग का आभास रहे
कर्मयोग में बस ध्यान रहे
मिलेगी सफलता जीवन में
परिवार हमेशा आबाद रहे
सोते समय भी प्रभु याद रहे
दिनभर का किया साफ रहे
ईश्वरीय लीला का खेल देखिए
सुख-स्मृद्धि सब साथ रहे।

गुरु जी आपकी याद बहुत आती है

गुरु जी आपकी याद बहुत आती है
जब से आप गए याद नही जाती है
आप ही थे मुझे गोपाल बोलने वाले
मुझे अपना सारथी बनाने वाले
अपने से पहले मुझे सम्मान दिलाते
मंचो पर अपने साथ मुझे बैठाते
साहित्य की पगडंडियों पर मुझे
हाथ पकड़कर चलना सिखाया
साहित्यकार कभी मरता नही है
इस सच से हमे रूबरू कराया
कनखल के किस्से खूब सुनाते थे
ईमली मोहल्ले में गोटी से लेकर
योगेंद्रनाथ शर्मा अरुण की कहानी
पिता महेंद्रनाथ,मां विद्यावती की
मधुर स्मृतियां थी उनकी जुबानी
मां मरे बोलती तो उम्र बढ़ जाती थी
दो पैसों में तब चाट मिल जाती थी
जमीन से जुड़कर उन्होंने नभ छुआ
गमो को सहकर भी हंस कर जिया।

प्रभु याद बनी रहे

प्रभु याद बनी रहे
ऐसी युक्ति रचते रहो
हर स्वांस में प्रभु हो
योग ऐसा लगाते रहो
माता,पिता,गुरु,शिक्षक
सब कुछ प्रभु ही तो है
चाहे जिस रूप में देखो
पालनहार प्रभु ही तो है
विस्मृत याद न होने पाए
विकार कोई मन मे न आए
निर्मल,पावन मनोभाव से
प्रभु स्मृति में खोये रहो।
भला सबका करे प्रभु जी
प्रार्थना यही करते रहो।

राज की बात

सुखी जीवन का
एक राज बताऊं
सुनो खोल कर कान
शाम को जब घर लौटो
सुनो उसकी बातें मत टोको
जब अपने मन की बातें बोलेगी
अपने दिल के राज वो खोलेगी
मात्र उसकी सुनो बातें
हां हूं वाला मंत्र अपनाओ
दिल हल्का हो जाएगा
चैन उसके दिल को आएगा
अपनी समस्याओं का
हल ना चाहिए
उसकी बातें सुनने
वाला चाहिए
मिला कोई बातें
सुनने वाला
हर्षित पुलकित होगा गात
घर में चहके खुशियों की सौगात
घर में हो सुख-शांति की बरसात

चिंतन सार्थक होता अगर

चिंतन सार्थक होता अगर
कष्ट मिट जाता है हर हाल
जीवन जीना हो जाता सुलभ
खुशियां मिल जाती है अपार
मानव शरीर यन्त्र मात्र है
आत्मा उसकी वाहक है
विकारमुक्ति गुण है उसका
पवित्रता श्रंगार है उसका
आत्मस्वरूप में टिकने से
कट जाते है सारे पाप
परमात्मा से योग लग जाता
इंसान से तब देवता बन जाता।

हर क्षण को आखिरी समझ कर

हर क्षण को आखिरी समझ कर
वर्तमान में जीना सीख लीजिए
कब,कैसे,कहां मौत आ जाए
विमान हादसे से सबक लीजिए
242 में से केवल एक ही बचा
फ्लाइट छुटी एक ओर जीवन बचा
जो जिंदा जल गए उन्हें याद कीजिए
श्रद्धा सुमन उनको अर्पित कीजिए
भविष्य में न हो ऐसा कोई हादसा
कुछ तो सुरक्षा के जतन कीजिए
जो जीवन बचा है परमात्मा की देन है
परमात्मा की याद में ही बीता दीजिए।

घोर कलियुग का काल है

घोर कलियुग का काल है
शांति का छाया अकाल है
अब दुल्हन से लोग डर रहे
दूल्हे पर खतरा अपार है
दहेज नही दूल्हे को बख्श दो
जान की रक्षा दुल्हन से कर दो
संस्कारो पर चली कुदाल है
यह सब मोबाइल का कमाल है
विश्वास रिश्तों में जमाना होगा
सदाचरण को अपनाना होगा
वर-वधु बने एक-दूसरे के रक्षक
ऐसा वातावरण बनाना होगा।

जीवन में सदैव संघर्ष है

जीवन में सदैव संघर्ष है
यह स्वीकार लो जरूर
सदा आराम मेँ रहना
होती है भारी भूल
संघर्ष का कठिन रास्ता
जीवन को कुंदन बनाता है
विकास के रास्ते पर
संघर्ष लेकर जाता है
जिंदगी में संघर्ष से ही
खुशहाली का रंग आता है
अच्छा ही अच्छा होता है
बुरा कभी नही होता है।

कर्म सभी का यह हो

कर्म सभी का यह हो
बढ़े चरित्र का मान
अच्छे चरित्र से बनती है
अपने देश की शान
संस्कार ,संस्कृति,मानवता
अपने भारत की पहचान
इन गुणों को अपनाने से
बनता भारत महान्
अहिंसा के हम है प्रहरी
शक्ति के हम है पोषक
परमात्म मार्ग पर हम चलें
बन जाए दुनियां के प्रेरक।

प्रकृति की बात ही निराली

प्रकृति की बात ही निराली
कभी खज़ाना न हो खाली
खनिज संपदा भरपूर देती
बदले में कुछ भी न लेती
दोहन कितना भी हम कर ले
आरी,कुल्हाड़ी से वार कर ले
तनिक भी रुष्ट प्रकृति न होती
फिर भी हमे पोषण ही देती
मां का दूसरा रूप है प्रकृति
अपने आंचल में छाया ही देती
पेड़ पौधो के पल्लवित होने पर
फल,फूलों से झोली भर देती
पेड़ पौधों को कटने से बचा ले
प्रकृति संरक्षण कर कर्ज उतारे ।

कल ही उन्होंने वृक्षारोपण कर

कल ही उन्होंने वृक्षारोपण कर
अखबार में ख़बर छपवाई थी
साथ मे उनकी फोटो भी आई थी
वृक्ष महत्ता पर दिया था भाषण
करना होगा पर्यावरण संरक्षण
आज उन्होंने ही कटवा डाला
आंगन में खड़ा नीम का पेड़
जो दे रहा था पूरे घर को छांव
वही आशियाना था कोयल का
खोखर में रह रही गिलहरी का
पेड़ न कटवाते तो क्या करते
घर की जगह फ्लैट्स बनाने है
घर की जगह से पैसे कमाने है
एक ही झटके में शहीद हो गया
जीवन- चाह लिए नीम का पेड़
पास ही पड़े अखबार की ख़बर
मुहं चिढा रही थी उन सभी को
जिन्होंने कल ही पेड़ लगाए थे
बड़े बड़े फोटो खिंचवाए थे ।

युवाओं की दिशा बदलनी होगी

युवाओं की दिशा बदलनी होगी
चरित्र उत्थान से उसे जोड़नी होगी
दिनचर्या में भी हो परिवर्तन
अमृत बेला में हो मेडिटेशन
सुसंस्कारित उन्हें बनाना होगा
विकार मुक्ति का पाठ पढाना होगा
अध्यात्म से युवाओं का नाता हो
स्वयं को जानने की अभिलाषा हो
यही चेतना सबको जगानी है
युवाओ को सदराह दिखानी है
युवाओं से ही होगा युग परिवर्तन
कलियुग से सतयुग का आवर्तन।

नकारात्मक सोच है अगर

नकारात्मक सोच है अगर
उसपर लगा लीजिए विराम
नकारात्मक सोचने से
ना चैन मिलता, न आराम
दूसरे का जो अहित सोचे
उसका हित भी नही होगा
मनोदशा खराब होगी
जीवन जीना दूभर होगा
इन सबसे बचने को
सकारात्मक सोच अपनाओ
शांति से जीना चाहते हो तो
सबके भले की सोच बनाओ।

पानी है ईश्वर का वरदान

पानी है ईश्वर का वरदान
इसके बिना नही जहान
पानी व्यर्थ न बहाइये
इसकी कीमत समझ जाइये
नल,टोटी खुली न छोड़िए
पानी की बर्बादी रोकिए
जहां पानी की कमी है
वहां एक बार जाकर देखें
प्यास बुझाने के लिए
लोगो को लड़ता देखे
पानी सबको मिले
ऐसा प्रयास करना होगा
बून्द बून्द से घड़ा भरता है
एक एक बूंद को बचाना होगा।

पवित्र है तभी तो

पवित्र है तभी तो
पूजे जाते देव
कन्या की पवित्रता पर
हम छूते है उनके पाँव
समय के साथ जब
कन्या वधु बन जाती है
वधु खुद पाँव छूती हुई
सबको नजर आती है
पवित्रता से पतित
बनने की यह बात
सहज ही समझ में
सबके आ जाती है
पूजा देव की नही
पवित्रता की होती है
आओ हम भी पवित्र
बनने की पहल करे
इंसान से देवता
बनने का मार्ग चुने ।

हर रात के बाद

हर रात के बाद
सवेरा जरूरी है
कलियुग के बाद
सतयुग जरूरी है
विकारो से आत्मा पर
जो कालिख चढ़ी है
पवित्रता से उसे
हटाना जरूरी है
चौबीस घण्टे में से
कुछ समय निकालो
जिसने पैदा किया है
उसे याद करना जरूरी है
न जाने किस घड़ी
हो जाये आखिरी घड़ी
हर पल परमात्मा की
याद में बिताना जरूरी है।

मन के जीते जीत होती

मन के जीते जीत होती
मन के हारे हार हो जाती
मन भटकने से बच जाता है
हार का डर नही सताता है
आत्म स्वरूपता से
मिलती है मन को
सदा सकारात्मक ऊर्जा
यही बुद्धि को सम्रद्ध बनाती
सुसंस्कारो की राह दिखाती
मन,बुद्धि,संस्कार से होगा
स्वयं से स्वयं का परिवर्तन
कर्मयोग से मिलेगी सफलता
हो जाएगा जगत परिवर्तन ।

साधु- संत सभी पधारे

साधु- संत सभी पधारे
आज आबू की धरा पर
सनातन पर चर्चा हो रही
चरित्र निर्माण की धरा पर
बहनों के सिर ताज बंधा है
राह आध्यात्म दिखाएंगी
साधु संतों का साथ मिला है
सद परिवर्तन वे कर पाएंगी
परमात्मा की इस सेवा का
अनूठा फल मिलने वाला है
हर इंसान राज्ययोग में तपकर
स्वयं ही देवता बनने वाला है।

नारायण नारायण अभिवादन से

नारायण नारायण अभिवादन से
महर्षि नारद ख़बर सुनाते थे
तीनो लोको में क्या हो रहा है
घूम घूमकर ख़बरों को लाते थे
उनके ही प्रतिरूप है मीडिया
बेहद सशक्त है आज मीडिया
पर मिशनरी भाव चला गया
व्यवसायिकता पत्रकारिता पर हावी हुई
निष्पक्षता का भाव छला गया
धन्य है,ब्रह्माकुमारीज मीडिया
विज्ञापन मुक्त का इतिहास रचा
आध्यात्मिकता से रचा बसा है
सुसंस्कारो का विश्वास बना
गणेश शंकर के बने हम अनुयायी
सकारात्मक पत्रकारिता आधार बना।

तपती पगडंडियों के राही थे

तपती पगडंडियों के राही थे
रिपोर्ताज विधा आविष्कारक
शैलियों के शैलीकार कहलाते
आजादी के थे वे अधिनायक
कन्हैया लाल मिश्र प्रभाकर ने
साहित्य में पदमश्री सम्मान पाया
दर्जनों पुस्तकों का प्रकाशन कराया
देवबंद से था उनका जन्म से नाता
साहित्य साधना को मसूरी भाता
अंग्रेजों की क्रूरता को सहते गए
विकास प्रेस पर जुल्म अंग्रेज ढहाते रहे
धरोहर जिंदा रखने वाला चला गया
प्रभाकर पुत्र अखिलेश अलविदा हो गया।

मुझे स्वयं को समझना होगा

मुझे स्वयं को समझना होगा
स्वयं से युद्ध करना होगा
जितनी है बुराइयां मुझमे
उन सबको दूर करना होगा
शांति और सत्य की चाहत में
सिद्धार्थ से बुद्ध बनना होगा
बुद्ध बनने के लिए खुद को
पहले शुद्ध करना होगा
शुद्धता क्या है समझना होगा
काम,क्रोध,मोह,लोभ,अहंकार से
खुद को मुक्त करना होगा
स्वयं बुद्ध समान बनना होगा।

जीवन का रस

जीवन का
रस प्यार है
जितना चाहे
बांट लो
जितना बंटता
उतना बढ़ता
हर संकट को
प्यार ही हरता
प्यार है सच्ची दौलत
जिससे आती
जीवन में रौनक़
प्यार जहाँ है
परमात्मा वहाँ है
आओ प्यार के
पेड़ उगाये
भाईचारे के
फल हम खाएं।

सबको सब कुछ मिलता नही

सबको सब कुछ मिलता नही
हर पेड़ पर पुष्प खिलता नही
पराजय के डर से परीक्षा छोड़ दे
ऐसे जीवन में जीवटता नही
सफलता चाहिए तो हारना सीखो
दुश्मन को गले लगाना सीखो
मिल जायेगी मंजिल हर एक
परमात्मा से योग लगाना सीखो
विकारों पर विजय का यही मार्ग है
पतित से पावन का यही मार्ग है
जीवन सार्थक सहज हो जाएगा
परमात्म मिलन का यही उपाय है।

सार्थक जीवन हो जाए

सार्थक जीवन हो जाए
ऐसी हो जाए सोच हमारी
परमात्मा की याद बनी रहे
योग अभ्यास करें हम भारी
देश का हर शख्स अगर
चरित्र निर्माण से जुड़ जाए
मर्यादा का पालन हो
आध्यात्म की गंगा बहे
देश के शहीदों को भी
मिलता रहे सदा सम्मान
राष्ट्र भावना के साथ
सबके भले की हो बात
सबसे पहले देश की सेवा
साथ मे हो अच्छे संस्कार
परमात्मा भी साथ रहेंगे
बनेगा एक नया इतिहास।

कनखल में जन्मे गंगा पुत्र

कनखल में जन्मे गंगा पुत्र
सरस्वती पुत्र बनकर चमके
मां विद्यावती की पालना ली
पिता महेन्द्रनाथ से पाया सबक
शब्दो की गंगा में गोते लगाकर
साहित्य के बड़े तैराक बने
कहानी,गीत,गज़ल, दोहों से
दिनचर्या उनकी चलती रही
ज्ञान-प्रकाश फैलाया जगत में
पुस्तकों की गिनती बढ़ती रही
मान-सम्मान मिला बहुतायत
‘गुरु जी ‘रूप में ख्याति मिली
योगेन्द्रनाथ शर्मा’अरुण’ को
अशरीरी रूप श्रद्धांजलि मिली।

योगेंद्रनाथ ‘अरुण’ चले गए

योगेंद्रनाथ ‘अरुण’ चले गए
काज़मी वेंटिलेटर पर है
सुध लेने वाला कोई नही
क्या सरकार हड़ताल पर है
पत्रकारो से यह व्यवहार
आम आदमी का क्या होगा
चिकित्सा एक मूल अधिकार
इलाज न मिले तो क्या होगा
इलाज के अनुदान की
प्रक्रिया सरल करनी होगी
बीमार के उपचार की
तत्काल व्यवस्था करनी होगी
कोताई इसमें जो करे
हर्जाना उससे वसूलना होगा
जान अगर चली जाए
खामियाजा उसे भुगतना होगा।

इस दुनिया मे हर

इस दुनिया मे हर
कोई फरेबी लगता है
जब अपना दिल ही
खुद को फरेबी लगता है
मन मे भरी है नफरत
उन अपनो के लिए
जिनके सामने आते ही
सिर झुकता है
उम्मीदे बहुत थी
उन अपनो से
जिनकी बगल में
खंजर छिपता है
दुनिया से छिपकर
जो गुनाह करते है
परमात्मा की अदालत में
उनको दंड मिलता है।

मां कोई भी हो

मां कोई भी हो
मां ही होती है
संतान को खुशी
खुद ग़म लेती है
कर्ज़ भला क्या देगी
मां ओलाद को
ओलाद के लिए
मां हर सांस देती है
कलियुग में
परिभाषाएं बदल गई
वर्ना मां ही तो
सारा जहान होती है
संकट में,हर मां
न्योछावर हो जाती है
ओलाद के लिए
सुहाग से भी लड़ जाती है
मां कितनी भी विपन्न हो
कर्जदार ओलाद ही होती है।

कर लो कुछ उपकार

जीवन सफल बनाने को
कर लो कुछ उपकार
राह भटके लोगो को
आओ दिखाए सन्मार्ग
झूठ,फरेब और मक्कारी
है कलियुग की पहचान
इन सबसे मुक्ति का
राजयोग है एक निदान
सवेरे उठकर परमात्मा का
जो करते है नियमित ध्यान
सारे विकार नष्ट होते उनके
मिलता सदाचरण का ज्ञान ।

क्रोधमुक्त जीवन जिया

क्रोधमुक्त जीवन जिया
धैर्य आत्मसात किया
विन्रमता के आभूषण बने
सरलचित्त होकर रहे
अखिलेश प्रभाकर खूब जिये
98 बसंत तक पार किए
शैलियों के शैलीकार पिता
कन्हैया लाल मिश्र थे पिता
जीवंत उनको किए रखा
यादों में उनको बसाए रखा
जब भी मिलते गले लगाते
राष्ट्रभक्ति का तराना गाते
न जाने अब कहां चले गए
पदचाप छोड़कर चले गए।

कैसा समय अब यह आया

कैसा समय अब यह आया
बुजुर्गों का उठ रहा साया
दादी रतनमोहिनी चली गई
यायावर शशि प्रयाण कर गए
अरुण हमे बिलखता छोड़ गए
गिरजा व्यास तक नही बच पाई
के विक्रम राव की हुई विदाई
कमल किशोर गोयनका का जाना
अखिलेश प्रभाकर का यूं रूठ जाना
लंबे समय तक याद दिलाएगा
बीता जमाना लौटकर न आएगा
महावीर अग्रवाल यादों में बसे है
पीएस चौहान स्वर्ग में जा बसे है
ये व्यक्ति नही संस्था कहलाते थे
सद्गुणों के मसीहा नज़र आते थे
शायद स्वर्ग में महफ़िल सजी होगी
विद्वता की प्रतियोगिता रची होगी।

जीवन भी एक बहती धारा है

जीवन भी एक बहती धारा है
कही पानी मीठा कही खारा है
कोई पवित्रता का जीवन जीता
कोई पांचों विकारों का मारा है
जो अभिमान में डूबे हुए है
उनके लिए जीवन कंटीला है
जो परमात्मा की याद में रहते है
उनका जीवन खुशियों से महंका है
सुख-दुख का यही तो मेला है
कोई भीड़ में खोया कोई अकेला है
कुछ कलियुग के पोषक कहलाते
कुछ सतयुग धरा पर लेकर आते
युग परिवर्तन की यही आभा है
परमात्म आगमन की नई बेला है।

मेरी माँ

याद आती है माँ
मन की किताब में
स्वर्ण पन्ना जोड़ दिया
यादो के इतिहास में
मन से बहुत कोमल थी
पर उसूलो से कठोर थी
राष्ट्रभक्त माँ अनमोल थी
शहीद जगदीश वत्स की
छोटी बहन थी मां
कर्मयोगी मदन लाल की
अर्धांगनि थी मां
मेरी जीवनदायनी
सबसे प्यारी थी मेरी माँ
सद्चरित्रता का
पाठ मां ने पढ़ाया
सात्विकता में
रहना मां ने सिखाया
माँ नही, ईश्वर रूप थी
नारी शक्ति प्रकाशवती थी
न जाने कहा चली गई मां
हमेशा के लिए खो गई मां
लेकिन यादो में जिन्दा है माँ
सिर्फ माँ नही ,परमात्मा है माँ
एक पूरा संसार है मां।

बच्चा मन से बनकर देखो

बच्चा मन से बनकर देखो
थोड़ी शरारत करके देखो
ह्रदय प्रफुल्लित हो जाएगा
बचपन फिर से लौट आएगा
परमात्मा के हम सब है बच्चे
उनके लिए मन से है सच्चे
बड़प्पन की झिझक सब छोड़ो
नन्हे मुन्नों के संग खेलो
कैसे खेलते थे छुपम छुपाई
आंखे भीच पूछते, कौन है भाई?
हास्य ठिठोली सब कुछ खेलो
दुनियां में जीभर कर जी लो।

राष्ट्रभक्ति में रची बसी थी

राष्ट्रभक्ति में रची बसी थी
शहीद वत्स की बहन सगी थी
किशोरावस्था में अनाथ हुई
भाई बहनों का सहारा बनी
सरकारी मदद ठुकराई सभी
स्वाभिमान के लिए रही अड़ी
गरीबी में धैर्य नही खोया
पति की मदद में हाथ बढ़ाया
ईमानदारी के संस्कार दिये
हर कष्ट हंसकर सहें
हिमालय जैसी हिम्मत थी
शरीर से कमजोर पर बलवान थी
ऐसी मां का वजूद हूं मैं
प्रकाशवती मां का सपूत हूं मैं
मुझे नाज़ है अपनी जननी पर
मुझे अभिमान है मातृ शक्ति पर
पर मां का जाना अखरता है
दुनिया उजड़ना सा लगता है
बिन साये का पथिक रह गया
एक अनाथ सा मैं शख्स रह गया
मां जहां भी हो बस खुश रहना
यादों में हमारी तुम बसी रहना।

एक साया फिर से खो गया

एक साया फिर से खो गया
शायद क्षितिज में कही सो गया
कहते थे साहित्यकार मरता नही
स्वर्गीय कभी वह होता नही है
तब तो अरुण चिरंजीवी हो गए
अपनी किताबों से जीवंत हो गए
देह गई है, आत्मा चमक रही है
ख्याति रूप में प्रकाशमान हो रही है
उनके दिए ज्ञान से अनेक अरुण बने
जिनसे अरुणोदय का होना जारी है
चलता रहेगा अरुण बनने का क्रम
सृष्टि में आवागमन का दौर जारी है
परमात्मा भी खुश है उनसे मिलकर
कलम के सिपाही का सफ़र जो जारी है।

दक्ष नगरी में जन्म लिया

दक्ष नगरी में जन्म लिया
रुड़की में सद्कर्म किया
अपभ्रंश हिंदी के विद्वान
जैन रामायण पर शोध किया
शिक्षक, गुरु,कविवर थे
साहित्यिक शब्दो के जादूगर थे
मुझे मानस-पुत्र मान दिया
हिंदी साहित्य का ज्ञान दिया
जीवन पर्यंत दोहे रचते रहे
जन जन को सीख देते रहे
84 वर्ष के सफल जीवन मे
चेहरों पर मुस्कान लाते रहे
योगेंद्रनाथ शर्मा ‘अरुण’ का जाना
लगता है एक सदी का खो जाना।

आतंकवाद खात्मा होकर रहेगा

आतंकवाद खात्मा होकर रहेगा
पाकिस्तान अब पिटकर रहेगा
रह रहकर वह आतंक फैलाता
समझाना भी समझ न आता
हिंसा उसके खून में ही बसी है
शांति की वहां कोई जगह नही है
पर्यटकों की हत्या हम भूले नही
पाकिस्तान पर यकीन करेंगे नही
उसकी मिशाइले धराशाही हो गई
सुदर्शन चक्र के आगे बोनी हो गई
अभी भी समय है समर्पण कर लो
भारत के सामने नतमस्तक हो लो।

आप्रेशन सिंदूर का जलवा

आप्रेशन सिंदूर का जलवा
आज सारी दुनिया देख रही
25 मिनट में 9 आतंकी ठिकाने
नेस्तनाबूद होते देख रही
90 आतंकियों को मार गिराया
पाकिस्तान को पिटते देख रही
26 पर्यटकों की मौत का बदला
भारतीय सेना ने ले लिया है
जो भारत पर कुदृष्टि डालेगा
उसका अंजाम देख लिया है
देश के मुद्दे पर दल भेद नही है
यह दुनिया ने मान लिया है।

मिटे दीवारें नफ़रत की

मिटे दीवारें नफ़रत की
ऐसे करो कुछ उपाए
पीड़ित न हो कोई जन
जन जन सब मुस्कराए
जाति हो सिर्फ इंसानियत
सदकर्म हो हम सबका धर्म
राष्ट्र सेवा सर्वपरि हो
मिलकर चले सब हम
सबका एक ही परमात्मा
सदा रखिए यह याद
जो परमात्मा को याद करें
रहता सदा वही आबाद।

ब्रह्माकुमारीज जो जाता है

ब्रह्माकुमारीज जो जाता है
रूहानी ऊर्जा लेकर आता है
तीन दिनों के प्रवास मात्र से
अध्यात्म में वह खो जाता है
अमृत बेला में परमात्म योग
नियमित सवेरे मुरली श्रवण
दिनभर चलती योग भट्टियां
कही सार्थक परिचर्चा होती
तनावरहित रहते सब यहां
सबके चेहरों तेज है यहां
जो आता यही में खो जाता
माया मोह से दूर हो जाता
परमात्म यज्ञ का केंद्र बना है
ब्रह्मचर्य रग रग में बसा है
लगता जैसे घर हो अपना
पूरा हो जाता हर सपना
लौटते है नई ताजगी के साथ
फिर जाना है होता आगाज़।

वह हमारी प्यास बुझाती है

वह हमारी प्यास बुझाती है
हरियाली धरती पर लाती है
भागीरथ द्वारा लाई गंगा है
मुक्तिवाहिनी कहलाती है
स्वच्छ नही रख पाए उसे
गन्दगी से भर आये उसे
फिर भी वह मां कहलाती है
सबके संकट हर लेती है
काश,हम ज्ञान की गंगा बहाते
स्वच्छता का महत्व बतलाते
गंगा का उदभव याद रहता
गंगा जनक शिव याद आ जाता।

नित्य उठकर कीजिए

नित्य उठकर कीजिए
परमात्मा का ध्यान
अच्छी सुबह हो जायेगी
बिगड़े बन जाएंगे सब काम
परमात्मा ही पिता हमारे
दुख हर लेते सारे के सारे
मिले खुशी जब लगे ध्यान
जीवन हो जाता है निष्काम
स्वार्थ,लोभ विदा हो जाते
क्रोध से भी मुक्त हो जाते
मोह ,माया से न कोई काम
अहंकार को लगे विराम
सुखद जीवन चले अविराम
चाहे रहीम कहो या फिर राम।

किया वायदा करके दिखलाओ

किया वायदा करके दिखलाओ
भाषणों में देश को न उलझाओ
चेतावनी गीदड़भभकी न बन जाए
सब्र टूटने से पहले अम्ल में लाओ
जिनके निर्दोष मरे आक्रोश से भरे है
अन्याय का बदला कुछ तो चुकाओ
कथनी-करनी अपनी एक बनाओ
चुप रहे तो नज़रो से गिर जाओगे
फिर कभी न नज़रो में चढ़ पाओगें
राजनीति छोड़ो देश को बचाओ
दुश्मन से अपना बदला चुकाओ
यह हिंसा नही प्रतिरक्षा होगी
गीता सन्देश की अभिरक्षा होगी।

आओ चले अध्यात्म राह पर

आओ चले अध्यात्म राह पर
शांति और अमन जहां पर
खुशियां पलक पवाड़े बिछाए है
हर एक चेहरे पर तेज छाए है
बुराई यहां दिखाई तक न देती
विकारों की बुझ गई है बाती
स्वर्ग जैसा अनुभव यहां मिलता
पवित्र मन आचरण में झलकता
सामुहिक योग की पावन धरा है
ईश्वरीय यज्ञ यही चल रहा है
माउंट आबू की पहचान इसी से
ब्रह्माकुमारीज का नाम इसी से।

ब्रह्माकुमारीज ने फिर किया है

ब्रह्माकुमारीज ने फिर किया है
अध्यात्म पत्रकारिता का आव्हान
पीत पत्रकारिता का पतन हो
मिशनरी पत्रकारिता बने महान
व्यवसायिक युग मे बचकर रहे
नैतिकता न छोड़े कोई श्रीमान
गणेशशंकर विद्यार्थी पथ पर चले
मूल्यों से बने पत्रकारिता की शान
तनावमुक्त रह सकेंगे पत्रकार सारे
राजयोग से बदल सकते है नज़ारे
परमात्मा याद में रहते थे नारद
पत्रकारिता के थे वे आविष्कारक।

परशुराम चिरंजीव है महान

त्रेता युग हो या फिर द्वापर
परशुराम चिरंजीव है महान
कलियुग में भी अस्तित्व उनका
महेंद्र गिरी पर्वत है पहचान
शस्त्र और शास्त्र के धनी है देव
आराध्य उनके भी है महादेव
सुदर्शन चक्र दिया श्रीकृष्ण को
कर्ण की विद्या विस्मृत कर दी
अक्षय तृतीया में जन्म लेकर
माता रेणुका की खुशियां भरदी
पिता की आज्ञा सर्वपरि मानी
पराक्रम से बनी अमर कहानी।

व्यसन सारे छोड़ दो

व्यसन सारे छोड़ दो
व्यसन है महाविकार
जो व्यसनों मे लिप्त है
उनका जीवन है बेकार
शरीर के दुश्मन व्यसन है
मन को कलुषित करते है
विवेक तक हर लेते व्यसन
गुलाम व्यसन के हो जाते है
व्यसन पाप तक कराते है
अपराधी तक बन जाते है
जो व्यसनों से मुक्त हुआ
निर्मल-पवित्र वही हुआ।

जैसी करनी वैसी भरनी

जैसी करनी वैसी भरनी
यही अध्यात्म की सीख है
जो भी इंसान पाप करे
उससे न होती कभी प्रीत है
पाप का घड़ा भरता है
पाप की सजा भी मिलती है
राजा हो या फिर रंक
करनी का दण्ड मिलता है
पाप कर्म जिसने किये
आत्मा बोझिल उसकी हुई
जिसने किये अपराध जगत मे
जिंदगी नरक उसकी हुई
दुष्कर्म छोड़ो सद्कर्म करो
मानव होकर मानवता पर चलो
चरित्र हमारा रहे उज्ज्वल
परमात्म ध्यान हमेशा करो।

हर पल आती याद है मां

हर पल आती याद है मां
कभी न भूल पाता हूं मां
मां ईश्वर का ही रूप थी
मां मेरे जीवन का मूल थी
कांटा अगर चुभता मुझे
दर्द से मां करहाती थी
पाला पोसा था मुझको
कष्टो से दूर रखा मुझको
मेरे चेहरे की मुस्कान को
खिलौना खुद बन जाती थी
मां की पूजा करना ही
ईश्वरीय पूजा कहलाती है
हर युग मे ऐसी विभूति
‘मां’शब्द से जानी जाती है।

व्यक्ति नही देश पर हमला

व्यक्ति नही देश पर हमला
हुआ स्वाभिमान पर हमला
हम राम को मानने वाले है
रहीम को गले लगाने वाले है
सर्वधर्म का सम्मान यहां है
पंथनिरपेक्ष संविधान यहां है
कट्टरता के हमसब दुश्मन
मानवता का इतिहास बड़ा है
अहिंसक है हिंसा नही जानते
निर्दोषों पर शस्त्र नही तानते
जब बात आती है मां धरा की
रक्षा में हिचक नही मानते
भारत देवभूमि है कहलाती
बहादुरी में देवता भी लोहा मानते।

हम सब है एक समान

हम सब है एक समान
सभी का रखे हम मान
पहले छोड़ो अभिमान
ईश्वरीय याद में करो ध्यान
दुनिया मे क्या कोई लाया है?
दुनिया से क्या ले जायेगा?
जिंदगी का आखिरी सफर
बिन दौलत ही हो जायेगा
जो सदकर्म किये है जीवन में
वे ही सबका साथ निभायेगे
जो पूण्य कमाये है जीवन मे
वे ही जीवन मे काम में आयेगे ।

हमारा धैर्य अब टूट रहा है

हमारा धैर्य अब टूट रहा है
अहिंसा मोह छूट रहा है
वे निहत्थों पर प्रहार कर रहे
हम उनसे बेमौत मर रहे
कब तक ऐसा होता रहेगा
कभी पुलवामा कभी पहलगाम
हम सबको नासूर देता रहेगा
कुछ तो करो मेरी सरकार
भविष्य में न हो ऐसा अत्याचार
ऐसा कुछ करके दिखलाओ
रूह कांपने लगे दुश्मनों की
शान चौगुनी हो जाए तिरंगे की
जो बेमौत मरे है उन्हें श्रद्धांजलि।

पहलगाम में आतंकियों ने

पहलगाम में आतंकियों ने
फिर मचाया कोहराम
मानवता शर्मसार हो गई
हिंसा हो गई है बेलगाम
देश के दुश्मन आतंकियों को
कड़ा सबक सिखाना होगा
निर्दोषों पर जो गोलियां बरसाई
उसका हिसाब चुकाना होगा
चेतावनी नही अब एक्शन होगा
देश के दुश्मनों का खात्मा होगा
कुदृष्टि डाली जिन्होंने तिरंगे पर
उन आतंकियों को कुचलना होगा।

ये कैसे दिन आ गए है

ये कैसे दिन आ गए है
रिश्ते मोबाईल में समा गए है
मोबाईल लेकर घूमते सब
सोशल मीडिया से जुड़े है सब
रोज़ लाईक्स बढ़ रहे है
कॉमेंट पढ़कर जी रहे है
असल में मिलन की जगह नही
सोशल एकाउंट्स खाली नही
मर्यादा को पलीता लगा रहे है
जिसे चाहा उसे धमका रहे है
भूलते जा रहे मेहमान नवाज़ी
मोबाईल से हो रही ज़र्रानवाज़ी
काश,रिश्तों में ईमानदारी बरतते
स्वार्थ की हंडी में रिश्ते न चढाते
आर्थिक हित साधना आदत बन गई
परहित सोचना आदत छूट गई।

एक पेड़ लगाए

मानवता का एक पेड़ लगाए
जाति-धर्म को दूर भगाए
राष्ट्रीयता की खाद डलवाये
प्रेम-सदभाव से सिंचाई कराये
जब पेड़ पल्लवित हो जाएगा
राष्ट्रधर्म की छांव फैलाएगा
सुख-सम्रद्धि फिर भरपूर होगी
अलगाव-हिंसा कभी न होगी
अखंड भारत का मूल यही है
अहिंसा, दया,करुणा यहीं है
वोट के लिए नही देश के लिए जियो
स्वहित को नही देश हित को जियो।

अधिक इच्छाये करना नही

अधिक इच्छाये करना नही
तनाव का कारण बनना नही
जो इच्छाओ पर लगाम लगाये
वही महान व्यक्ति बन पाए
इच्छाओ को कभी बढ़ने न दो
महत्वकांक्षी स्वयं को होने न दो
इच्छा ही तो पथभृष्ट बनाती है
अपनो को भी गैर बनाती है
लक्ष्य अगर हो सद उन्नति का
स्वयं की स्वयं से ही प्रगति का
कर्मयोग से विकासोन्मुखता का
आत्मयोग से परमात्मयोग का
यही लक्ष्य सार्थक कहलाता है
साकार रूप में साधक हो जाता है।

ब्रह्माकुमारीज के आध्यात्म से

ब्रह्माकुमारीज के आध्यात्म से
इंसान से देवता बन रहे लोग
देखकर वातावरण मधुबन का
हर्षित हो रहे दुनिया के लोग
गृहमंत्री तक मंत्रमुग्ध हो गए
विश्व शांति अभियान देखकर
मोहिनी दीदी से आशीर्वाद लिया
परमात्मा का सफल यज्ञ देखकर
सन 36 से दादियों ने मधुबन
अपने हाथों से संवारा था
ब्रह्माबाबा ने निमित्त बनकर
ईश्वरीय विश्व विद्यालय संभाला था
यही विश्व विद्यालय प्रेरक बना है
नारी शक्ति का यह केंद्र बड़ा है
आओ मिलकर इसे आगे बढाये
चरित्र निर्माण अभियान चलाये।

जब जब स्वयं में

जब जब स्वयं में ,
‘मैं’ आ जाता
विवेक स्वतः
हर लिया जाता
देह अभिमान
सिर चढ़ जाता
अच्छा -बुरा
समझ नही आता
मिथ्या सोच ‘मैं ‘हो जाती
करता तो ईश्वर है
यह समझ नही आती
‘मैं’ ही प्रगति का
अवरोधक बनती
स्वयं के विनाश का
कारण बन जाती
अगर ‘मैं’ से मुक्ति मिल जाये
परमात्म शक्ति स्वतः आ जाये।

मन,वचन,कर्म से एक रहिए

मन,वचन,कर्म से एक रहिए
परमात्म याद में लीन रहिए
बीमा करिए 21 जन्मों का
प्रीमियम योग से भरते रहिए
लौकिक बीमा मरने के बाद का
अलौकिक बीमा अमरता का है
सद्कर्मों से यह सुरक्षित रहता
दुर्घटना से इसका नही नाता है
अलौकिक बीमे की प्रभु गारंटी
लौकिक बीमे की नही वारंटी
सजग रहकर चुनाव करिए
अलौकिक बीमे पर भरोसा करिए।

ब्रह्माकुमारीज की नई कमान

ब्रह्माकुमारीज में दादी युग का
हो गया है अब अवसान
दीदीयों ने संभाल ली है
ब्रह्माकुमारीज की नई कमान
मोहिनी दीदी के शीर्ष नेतृत्व में
अब ईश्वरीय यज्ञ सेवा होगी
जयंती-मुन्नी के सहयोग से
नारी शक्ति की जय जय होगी
भाइयों में बृजमोहन भाई का
मार्गदर्शन हम सबको मिलेगा
मृतुन्जय, करुणा भाई के संग
नई उम्मीदो का उदय होगा
शिवबाबा के मधुबन में अब भी
बयार आध्यात्म की बहती रहेगी
विश्व शांति, चरित्र निर्माण की
अलख ब्रह्माकुमारीज जगाती रहेगी।

दया,संवेदना सद्गुण अपने

दया,संवेदना सद्गुण अपने
इस जगत में सभी है अपने
जो भी जीव पास है अपने
सबका ही रखिए ध्यान सदा
ग्रीष्म ऋतु आरंभ हो गई भाई
पशु पक्षी प्यासा न रहे कोई
ड्योढ़ी – छत पर पानी रख दो
खाने की कुछ सामग्री रख दो
गर्मी से जीव बच जायेगा
मानवता रंग निखर जायेगा
परमपिता का यही फरमान
करुणा भाव सबसे महान।

राजयोगिनी जानकी ने

राजयोगिनी जानकी ने
ओम शांति आव्हान किया
विश्व शांति के लिए कार्य कर
जगत का कल्याण किया
राजयोग की महत्ता बताकर
दुनिया पर उपकार किया
लंबी उम्र की प्रेरक बनी वे
स्थिर मन मे अव्वल रही
ब्रह्माकुमारीज सेवा कर
एक महान कर्मयोगिनी बनी
आओ उनके अनुगामी बने हम
उन जैसा बनकर दिखाए
दादी जानकी की धैर्य परीक्षा
हम भी जीवन मे अपनाए
शिव बाबा की प्यारी बेटी के
सद्गुण हम सबमे आ जाए।

सच परमात्मा का रूप है

सच परमात्मा का रूप है
झूठ है रावण के समान
जो सच की राह चलता
मिलता सदा उसे सम्मान
सच है ईश्वर की साधना
मिल जाता परमात्म ज्ञान
सच से आत्मा निर्मल होती
मिट जाता सदा अभिमान
सच मानवीय आभूषण है
करता यह चरित्र का श्रंगार
सच से चेहरे का तेज बढ़ता
मन होता शांत – अविराम।

अमृतबेला में नियमित उठना

अमृतबेला में नियमित उठना
परमात्मा को अपने याद करना
सद्कर्मों का संकल्प करना
सुप्रभात सफल हो जाता है
विकारों का परित्याग करना
शांति-सदभाव धारण करना
हर समय अच्छा ही सोचना
वातावरण सकारात्मक बनाता है
छोटे -बड़े का भेद मिटा दो
ऊंच-नीच की खाई हटा दो
समानता की फिर गंगा बहा दो
सतयुग को फिर से धरा पर ला दो।

राम को मन्दिरों से बाहर

राम को मन्दिरों से बाहर
चौराहो पर लेकर आओ
उनकी आराधना से पहले
उनके चरित्र को अपनाओ
राम की मर्यादा को हमने
जीवन में अगर अपना लिया
दुःख दूर हो जायेगे सारे
समझो राम राज्य ला दिया
जो लेता है राम का नाम
भाग्य उसका तर जाता है
राम जैसा बनने का सुख
फिर स्वतः मिल जाता है
ऐसा करे हम राम की भांति
हमारा जीवन भी हो जाए
अपने दैनिक जीवन मे
राम में ध्यान लग जाए।

चिर निद्रा में क्यो सोई हो

चिर निद्रा में क्यो सोई हो
फिर से उठो प्यारी दादी
अमृत बेला तक किया नही
बात क्या ऐसी हो गई दादी
परमात्म याद में तुम रहती
हमको भी सदसन्देश देती
मुरली सुनाने में मस्त रहती
अनुशासन में सख्त रहती
देहअभिमान कभी किया नही
शिवबाबा को कभी भुलाया नही
राजयोग का अभ्यास करती
नई नई ब्रह्माकुमारिया गढ़ती
अदभुत रहा तेज तुम्हारा
व्यवहार तुम्हारा प्यारा प्यारा
ब्रह्माकुमारीज चीफ तक पहुंची
परमात्मा शिव की तुम हो बेटी
लक्ष्मी से रतनमोहिनी बन गई
शिव बाबा की शिवशक्ति बन गई।

एकता, शांति, अध्यात्म का

एकता,शांति,अध्यात्म का
पाठ पढ़ाती ब्रह्माकुमारीज
ज्ञान, योग,सेवा,धारणा का
अभ्यास कराती ब्रह्माकुमारीज
नई शिक्षा से नये भारत का
निर्माण करती ब्रह्माकुमारीज
मूल्यपरक शिक्षा पाठ्यक्रम
सबको पढाती ब्रह्माकुमारीज
दादी रतनमोहिनी की अगुवाई में
संकल्प सदभाव का लिया हमने
दादीरतनमोहिनी की सादगी का
अनुसरण किया हम सबने
शताब्दी से अधिक जीवन जिया
हमें रूहानियत से कृतार्थ किया
चली गई परमधाम तुम दादी
याद आओगी सदा प्यारी दादी।

कुछ अच्छा करके तो देख

कुछ अच्छा करके तो देख
चेहरे पर मुस्कान लाकर देख
तनाव से दूर होकर तो देख
शांति को अपनाकर देख
परमात्म याद में बैठकर देख
परमात्मा से नाता जोड़कर देख
खुशी को फिर आता हुआ देख
सुख सागर में स्वयं को देख
युग परिवर्तन होता हुआ देख
कलियुग को जाता हुआ देख
सतयुग को फिर आता देख
इंसान को देवता बनता देख।

राजनीति का धर्म न रहा

राजनीति का धर्म न रहा
राजनीति का ईमान न रहा
सत्ता के लिए रंग बदलते
राजनेता देश के बेईमान
वोट के लिए राम बेच दे
कुर्सी हेतु आत्म सम्मान
भोली भाली देश की जनता
उनके लिए वोट का सामान
झूठ बोलकर जन भड़काते
वोट के लिए तिकड़म भिड़ाते
मन्दिर,मस्जिद,चर्च,गुरुद्वारे
बांट देते सारे के सारे
फरेब देखकर इन नेताओ के
हैरत मे पड गए है भगवान
कितना बदल गया इंसान
जिसे याद नही रहा भगवान।

बोलो जीभ सम्भाल कर

बोलो जीभ सम्भाल कर
बहुत मुलायम होती भाई
फिसल जाये तो आफत बनती
सम्भल जाये तो करवाती बडाई
जो भी बोलो अच्छा बोलो
शब्दों में केवल मिठास घोलो
मधुर वचन ओषधि कहलाते
कटु वचन घाव कर जाते
जो रहता है सदा ही मौन में
वह बन जाता शहजादा पीर
मौन व्रत है श्रेष्ठतम उपाय
अपनाते इसको राजयोगी वीर
जिन्हें परमात्मा याद रहते सदा
कहलाते वे ही फरिश्ते सदा।

इंजीनियर नगरी रुड़की में

इंजीनियर नगरी रुड़की में
मां गंगा विराजने लगी है
गंगा आरती होने लगी है
यह आरती अनवरत रहे
यह सब लोग चाहते है
न आए गंगा में गंदा पानी
इसकी भी रुकावट चाहते है
न हो गलियों में कार पार्किंग
न हो आवारा कुत्तों का खोफ़
कुत्तो की शौच सड़क पर न हो
यह भी सब भरोसा चाहते है
इतने में ही रुड़की संवर जाएगी
स्वच्छ-सुंदर रुड़की बन जाएगी।

सुबह उठते ही राम राम बोलना

सुबह उठते ही राम राम बोलना
घर के बच्चों का हाथ जोड़ना
बिना दातुन मंजजन किए
मुंह मे कभी निवाला न डालना
मां के हाथ की घी चुपड़ी रोटी
गिलास भरकर मठ्ठे का नाश्ता
खुद ही होमवर्क पूरा करके
नापते थे पैदल स्कूल का रास्ता
पहले प्रार्थना फिर होती थी पढाई
अधूरे होमवर्क पर होती पिटाई
मास्टर जी कभी खड़ा कर देते थे
कभी क्लास में मुर्गा बना देते थे
फिर भी घर हंसते हंसते आते थे
पिटाई का दर्द वही छोड़ आते थे
इसी दिनचर्या ने हमे लायक बनाया
आदमी कहलाने लायक बनाया।

कहां गई कलम दवात

कहां गई कलम दवात
कहां गई टाट की बोरी
मास्टरजी कम्मच बजाते
पाठ याद की थी मजबूरी
बिना सुविधा स्कूल जाते
मास्टर जी का खाना
बच्चे घर से ही लाते
न जात-पात का बंधन था
न धर्म का आडंबर था
राष्ट्रभक्ति का पाठ पढ़ाते
नैतिक शिक्षा का ज्ञान कराते
फीस का तनाव न था
तनख्वाह से लगाव न था
जो होशियार वही प्रिय होता
सफलता पर बच्चों की
शिक्षक गौरवान्वित होता
ऐसे शिक्षक सदा याद रहते है
माता-पिता समान होते है।

मानव धर्म

सबसे श्रेष्ठ है मानव धर्म
बात यह मेरी लो मान
जो इस धर्म को अपनाता
वह बनता अच्छा इंसान
धर्म नाम पर लड़ते है जो
जाति नाम पर भिड़ते है जो
उनको ही कहते शैतान
बचकर रहो ऐसे लोगो से
छोड़ दो खुद भी अभिमान
मानव मानव मे भेद न हो
सब है ईश्वर की सन्तान
ईश्वर को ही अपना मानिए
बाकी सब मिथ्या जानिए।

मिले सफलता सभी को

मिले सफलता सभी को
हर कोई यह दुआ कीजिए
सबको मिले सुख शान्ति
ऐसी चाहत कीजिए
तरक्की पर गैरो की न हो जलन
दिल से सबको शुभकामनाये दीजिए
कोई भूखा न रहे पडौस में
ऐसी जकात कीजिए
हर लम्हे पर रहे खुदा का नाम
ऐसा सजदा कीजिए
नवरात्र -ईद आए साथ साथ
दोनों पर्वो का स्वागत कीजिए
सभी को मुबारक हो
नवरात्र और ईद
इन पावन पर्वो की बधाई लीजिए।

जैसा सोचोगे वैसा ही होगा

जैसा सोचोगे वैसा ही होगा
अच्छा सोचोगे अच्छा ही होगा
बुरा सोचोगे तो बुरा ही होगा
जैसा चाहते हो वैसा ही होगा
बस, सोच अपनी सही बना लो
जैसा चाहे अपना भाग्य बना लो
जैसा खुद बनोगे वैसे सब बनेंगे
तुमसे ही तो सबके भाग्य खुलेंगे
खुद को खुद का आईना बना लो
आत्मा मे अपनी ज्योति जगा लो
दिव्य प्रकाश चहु ओर होगा
परमात्म सानिदय का नूर होगा।

एक जैसी है सब मे जान

एक जैसी है सब मे जान
रहते मजहब अलग अलग
एक ही रंग सबके खून का
क्यों रहते फिर अलग अलग
ओम कहो या अल्लहा कहो
गॉड कहो या फिर वाहे गुरू
मनुज धर्म सबका एक है
न मानो किसी को अलग अलग
खुश रहो और खुशियां बाटो
जाति धर्म में खुद को न बांटो
रहो सदा परमात्म याद में
ऐसे सदकर्म सभी मे बांटो
छोटे-बड़े का भी भेद न हो
इंसानियत को सर्वपरि मानो।

रचता ने जब रचना का जिम्मा

रचता ने जब रचना का जिम्मा
स्वयं के कंधों पर उठा लिया
लेखराज को ब्रह्माबाबा बना
युग परिवर्तन रथ चला दिया
इसी यज्ञ में आहुति देने को
जानकी कन्या ने जन्म लिया
सन उन्नीस सौ सोलह साल में
एक जनवरी को अवतरण लिया
ओम मंडली से जुड़कर जानकी
परमात्मा की याद में खो गई
जीवन समर्पित शिव को किया
विश्व शांति संवाहक हो गई
104 वर्ष तक धरा पर रहकर
ईश्वरीय ज्ञान का प्रकाश फैलाया
पतित से पावन बनाने के लिए
युग परिवर्तन अभियान चलाया
साक्षात देवी स्वरूपा थी जानकी
स्थिर मन की स्वामिनी जानकी।

स्मृति दिवस पर

स्मृति दिवस पर
दादी जानकी
प्रभु याद में जीवन बिताया
सदा शांति का पाठ पढ़ाया
स्वेत वस्त्र में देवी स्वरूपा
चेहरे पर तेज सब ही ने देखा
जेब और पर्स से दूर रही
फिर भी सदा धनवान रही
ओम शांति का पाठ पढाती
हर किसी को अपना बनाती
हलचल उन्हें नही भाती थी
परमात्म स्थिरता आती थी
बिना बताये चली गई जानकी
दुनिया उन्हें फरिश्ता मानती।

स्वहित को भूलकर

स्वहित को भूलकर
परहित रखिए ध्यान
जीवन के हर मोड़ पर
स्वयं को निमित्त जान
करने वाला कोई ओर है
फिर कैसा अभिमान
हम तो केवल कठपुतली
नचाते हमे भगवान
झूठ फरेब किस काम के
सिर पर चढ़ता पाप
जब करनी का दंड मिलता
अकेला करता सन्ताप।

मैं कौन हूं , मेरा कौन है

मैं कौन हूं , मेरा कौन है
सीखाती है ब्रह्माकुमारीज
मैं आत्मा हूं,मेरा परमात्मा है
बताती है ब्रह्माकुमारीज
रतनमोहिनी दादी अदभुत
शताब्दी जीवन कहानी अदभुत
परमात्मा-याद में रहती है
प्रेरक ब्रह्माकुमारीज है
विश्वव्यापी सम्मान है उनका
विश्व-शांति में सहयोग उनका
राजयोग से बदला जीवन
रतनमोहिनी दादी अनुपम।

अपेक्षा किसी से करो नही

अपेक्षा किसी से करो नही
सहायता किसे से मांगो नही
स्वयं की शक्ति को पहचानो
अपनी अन्तरात्मा को जानो
जो अपनी सहायता खुद करते है
परमात्मा उनकी शक्ति बनते है
यह शक्ति परमार्थ के लिए हो
स्वयं के कल्याण के लिए हो
इससे सदुपलब्धि मिल जाएगी
सर्व समस्याएं हल हो जाएंगी
किसी से अपेक्षा न रह जाएगी
किसी की उपेक्षा न की जाएगी
यही परमार्थ का सरल मार्ग है
जीवन मुक्ति का उत्तम मार्ग है।

करें नित्य हम कर्म

करें नित्य हम कर्म
जो हो सबके हितकारी
निभाये मनुजता का धर्म
है हमारी नैतिक जिम्मेदारी
कोई दुखी न रहे जगत में
हो हर चेहरे पर मुस्कान
ऐसे करो तुम सदकाम
ईश्वर भी खुश हों जाए
जन जन के प्रिय हों हम
हर कर्म सफल हों जाए
यही सफलता हमें
ईश्वरीय बोध कराएंगी
कलियुग से हमको
सतयुग में ले जाएगी।

ज्योतिबिंदू स्वरूप है

ज्योतिबिंदू स्वरूप है
परमात्मा का सार
आत्मा भी नजर आती
ज्योतिबिंदू वार
बहुत सरल है इस विधि से
परमात्मा को पा लेना
राजयोग सीख़ लो अब
न रहे देह का भान
आत्मस्वरूप में मिलता है
परमात्मा का ज्ञान
व्यर्थ समय न गंवाओ
छोड़ दो सारे विकार
प्रभु मिलन मनाने का
यही उचित समय है
इंसान से देवता बनने का
यही श्रेष्ठतम समय है।

तन मन दोनों स्वच्छ रहे

तन मन दोनों स्वच्छ रहे
दोनों ही विकार मुक्त रहे
गंदगी कही होने न पाए
ऐसे पावन -पवित्र रहे
जब भी स्वच्छता कम हुई
रुग्णता की शुरुआत हुई
तन को कष्ट होने लगता
मन विचलित रहने लगता
पापाचार बढ़ जाते है
कलियुगमय हो जाते है
स्वच्छ तन मन बना लो
प्रभु से योग लगा लो
रोगमुक्त सब हो जाएंगे
खुशियां स्वयं ही पा जाएंगे।

गूंजे मधुमय गीत

गूंजे मधुमय गीत
हो दिन मंगलकारी
बना रहे स्वस्थ्य
हो सम्रद्धिशाली
खुशियो भरे हो दिन
सुखमय हो संसार
सदिच्छा पूरी हो
हो भाग्य अपरम्पार
रहे ध्यान ईश्वर में
ऐसे कर्म कीजिये
यह जन्म संवर जाय
अगला भी संवार लीजिये।

आरोप प्रत्यारोप के दौर में

आरोप प्रत्यारोप के दौर में
दफन हो रही है सच्चाई
केवल कुर्सी पाने को
हो रही जमकर लड़ाई
पांच साल जो भूले रहते
बेबस जनता का दर्द
वे स्वयं को दिखाते है
सबसे बड़ा हमदर्द
कुर्सी के लिए ये स्वार्थी
जाति धर्म फैलाते है
शांति प्रिय जनता को
आपस मे लड़वाते है
इन गिरगिटों से हमको
सावधान हो जाना है
जिन्होंने किये झूठे वायदे
उन्हें कुर्सी से उतरवाना है।

धाराप्रवाह संस्कृत बोलते

धाराप्रवाह संस्कृत बोलते
संस्कृत हेतु दिनरात सोचते
वैदिक ज्ञान के विद्वान थे
प्राध्यापक बहुत महान थे
कुलपति पद सुशोभित किया
निरहंकार जीवन जिया
मधुरभाषी व्यवहार किया
आर्यत्व का प्रचार किया
वेद ज्ञान का भंडार रहे
श्रीमद्भागवत आत्मसात किए
महावीर अग्रवाल नाम तुम्हारा
जगत याद कर रहा है सारा
श्रद्धा सुमन तुम्हे समर्पित
परमधाम में रहो आनन्दित।

मिले सदा सम्मान

मिले सदा सम्मान
ऐसी वाणी बोलो
मधुर हो हमारी भाषा
ऐसी मिठास घोलो
फिर देखो अपनत्व
सहज मिल जायेगा
गैर भी अगर होगा
तो अपना बन जाएगा
ईश्वर भी खुश होंगे
सदव्यवहार करने से
सम्मान भी स्वतः बढ़ जाएगा
मिट जायेगा अँधेरा
तब आपके जीवन से
भाग्य का सूरज
आपका चमक जायेगा।

माया मोह जब भी बढ़ा

माया मोह जब भी बढ़ा
हुआ मानव परेशान
जो भी भागा इसके पीछे
घट गई उसकी शान
माया मोह विकार बड़े है
इसके पीछे लफ़ड़े बड़े है
जो इनको धारण कर लेता
शांति अपनी भंग कर लेता
अपनो को ये गैर बनाते
परमात्मा से दूर कर देते
जीवन अगर बनाना सरल
माया मोह से हो जाओ विरल
परमात्मा मे ध्यान लगाओ
संकटो से छुटकारा पाओ।

संवेदनशील रहना सीखो

संवेदनशील रहना सीखो
करुणाभाव जगाना सीखो
मानवीयता मे जीना सीखो
स्वयं को अच्छा बनाना सीखो
इंसानियत बढ़ती जायेगी
समस्याये घटती जायेगी
चेहरे पर खुशी आ जायेगी
परमात्म कृपा हो जायेगी
आत्म स्वरूप मे रहना जरूरी है
देह अभिमान छोड़ना जरूरी है
ईर्ष्या द्वेष मिटाना जरूरी है
ईश्वरीय ज्ञान पाना जरूरी है
ईश्वरीय ज्ञान ही पार लगाएगा
सफल-मंजिल तक पहुंचाएगा
गैर भी अपना बन जायेगा
जीवन सुखमय हो जायेगा।

चमके प्रेम का रंग

चमके प्रेम का रंग
ऐसी चले पिचकारी
गैर भी अपने हो जाये
एकजुटता हो हमारी
फिर करे निर्माण
चरित्र का हम अपने
ईश्वर देगा साथ
सच होंगे सपने
रंग गुलाल लगाओ
बहाओ प्रेम की गंगा
न हो कही भी दंगा
तभी सच होगी होली
आओ खेले होली।

अवगुण तुम्हारे कोई बताए

अवगुण तुम्हारे कोई बताए
शांत रह सुन लीजिए
वे अवगुण दूर हो जाये
ऐसा परिवर्तन कर लीजिए
सच्चा साथी वही है जग में
जो हमारी कमिया गिनाए
उन कमियों को दूर करने का
कोई अच्छा उपाय सुझाए
स्वयं के अंदर भी झांक लीजिए
निष्पक्ष स्वयं का आंकलन कीजिए
कोई बुराई अगर पड़े दिखाई
तत्काल उसको दूर कीजिए
आम से खास बनने का
यही एक मार्ग खोज लीजिए
स्वयं को आत्मा समझ कर
परमात्मा से लौ लगा लीजिए।

जन्म सफल हो जाय

जन्म सफल हो जाय
करे ऐसे हम काम
दुसरो को ख़ुशी दे
और दे सम्मान
होली के रंग हो ऐसे
ईद -दीवाली मिलकर
मना रहे हो जैसे
मन में कोई बैर न रहे
समाज मे कोई गैर न रहे
दुश्मन से भी गले मिलो
प्रेम की नई शुरुआत करो
प्यार का लगाओ गुलाल
मन मे न रहे कोई मलाल।

रंग, अबीर, गुलाल से खेलों

रंग, अबीर, गुलाल से खेलों
मनमुटाव रंगों से धोलो लो
छल, कपट,प्रपंच सब छोड़ो
प्रेमभाव की जय अब बोलो
भक्त प्रहलाद बनकर जी लो
परमात्म याद का अमृत पी लो
बुराई कही कोई रह न जाएं
ऐसे सदसंकल्प अपना लो
व्यसन ,फूहड़ता,हुड़दंग न हो
रंजिश, हिंसा,उत्पात न हो
शांति, भाईचारे की मिशाल बने
ऐसा फ़ाग का त्यौहार अब हो।

सात्विक दृष्टि बनाकर रखिए

सात्विक दृष्टि बनाकर रखिए
प्रेम का भाव जगाकर रखिए
आत्मिक रूप से निहारे सभी को
रूहानियत के कदम बढाकर रखिए
मानव मानव में कोई भेद न हो
जात धर्म का कोई मतभेद न हो
बेटियों के जन्म पर मनाये ख़ुशी
उनके जन्म पर न हो दुःखी
नारियों को सम्मान देकर रखिए
ऐसा संकल्प अपनाकर रखिए
अबला नही, अब सबला है नारी
कंधो पर उसके बड़ी जिम्मेदारी
नारी पर भरोसा करके रखिए
घर की लक्ष्मी बनाकर रखिए।

बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ

बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ
यह अभियान आगे बढ़ाओ
बहन बेटियो को सम्मान दो
नारी सुरक्षा को आयाम दो
माँ का बुढ़ापा संवर जाये
जीवन संगिनी सम्मान पाये
समाज मे बराबरी का हक मिले
अबला शब्द से मुक्ति मिले
देवी स्वरूपा मानिए नारी को
जगत जननी मानिए नारी को
ग्रह नक्षत्र सब सुधर जाएंगे
परमात्म भी खुश हो जाएंगे।

मैं मैं करती बकरी

मैं मैं करती बकरी
खो देती है जान
मैं से ही बढ़ता है
घनघोर अहंकार
मैं पन से जो दूर हुआ
नही रहता अहंकार
मैं पन एक विकार है
रहो इससे हमेशा दूर
मैं अगर मन मे रहे
अहंकार हो भरपूर
मैं से मुक्ति का ले
हम सब ही संकल्प
निरहंकार हो जाएंगे
पूरे के पूरे कल्प ।

हर सदइच्छा पूरी करते

हर सदइच्छा पूरी करते
परमात्मा हर संकट हरते
बिन मांगे सब मिल जाता
प्रभु को पता हो जाता
वे है पालनहार हमारे
लगते सबको प्यारे प्यारे
स्वयं समान बनाते है प्रभु
पतित से पावन बनाते प्रभु
आत्म स्वरूप मे रहना सीखाते
शांति सदभाव का पाठ पढ़ाते
हर पल प्रभु की याद मे रहो
जीवन अपना सफल बनाओ
कट जाएंगे संकट सब सारे
कहलाओ के प्रभु के प्यारे ।

काम धंधे में रहते अगर

काम धंधे में रहते अगर
परमात्मा याद आएंगे
जीवन मे विकारो से
सहज मुक्ति पाएंगे
परमात्मा की मत पर
तुम सदा चलते रहना
अहंकारवश अपनी मत
कभी ना तुम अपनाना
संगमयुग की एक घड़ी भी
तुम व्यर्थ नहीं गंवाओ
समर्थ बनाकर स्वयं को
तुम पुण्य भाग कमाओ
व्यर्थ चिंतन छोड़कर
तुम औरों को भी ज्ञान दो
समय का महत्व समझकर
एक- एक पल को मान दो।

जोश में होश खोना

जोश में होश खोना
कोई अच्छी बात नही
देश पर सियासत करना
कोई अच्छी बात नही
लोगो मे केवल वोट देखना
कोई अच्छी बात नही
वोट के लिए झूठ बोलना
कोई अच्छी बात नही
सरहद पर कमजोर बोलना
कोई अच्छी बात नही
शातिर को जिंदा छोड़ना
कोई अच्छी बात नही
देश से पहले चुनाव देखना
कोई अच्छी बात नही।

विक्रमशिला की भूमि में

विक्रमशिला की भूमि में
हिंदी की गरमाहट है
भागलपुर साहित्यिक धरा पर
हिंदी पैरोकार आहत है
राष्ट्रभाषा का सम्मान मिले
यह विचार मंथन करते है
हिंदी साहित्य उन्नत हो
ऐसा प्रयास सब करते है
हिंदी राजभाषा बने देश की
कानून परिवर्तन करना होगा
सरकारी कामकाज में अब
हिंदी का प्रयोग करना होगा
क्षेत्रीय भाषाएं भी मिलकर
हिंदी के साथ-साथ चले
मिलजुल कर सब समर्द्ध हो
आओ मिलकर संकल्प करें।

खुद अपनी पीठ थपथपाते रहे

खुद अपनी पीठ थपथपाते रहे
महाकुंभ के गीत गाते रहे
गिनीज बुक में नाम आ गया
युग परिवर्तन खिताब छा गया
गिनतियां कैसे की,पूछना नही
दुर्घटनाओं पर भी बोलना नही
डूबकी से रह गए वे हिन्दू नही
सवाल उठाने वाले समझे नही
जिनकी मौत हुई वे स्वर्ग को गए
जो कुचले गए वे मुक्ति पा गए
जिन्हें डंडे पड़े उन्हें पूण्य मिलेगा
बेटिकट चले जो, भाग्य खिलेगा
महाकुंभ महिमा का प्रताप देखिए
खिड़की तोड़ एसी का मजा लीजिए
मीलो पैदल चले जो प्रालब्ध उनका
जो जाम में अटके, दुर्भाग्य उनका
बुराई नही, सिर्फ अच्छाई देखिए
महाकुंभ की सिर्फ सफलता देखिए
60 करोड़ आए यह बता दिया है
कैसे आए, अब यह मत पूछिए
जो हमने कहा ,वही मान लीजिए
वर्ना ,क्या बिगाड़ लोगें जान लीजिए।
व्यर्थ का पंगा भी अच्छा नही है
सब हरा ही हरा है ,बता दीजिए।

सद्चिन्तन से दूर होती

सद्चिन्तन से दूर होती
जीवन की हर चिंता
तनाव भी हर लेती है
बनती दुखो की हंता
परचिंतन से दूर रहे
स्वचिंतन करते रहे
स्वस्थ तन मन होगा
जीवन खुशियो भरा होगा
बाहरे भी खिल जायेगी
जीवन मे रंग भर जायेगी
आत्म सन्तोष भरपूर होगा
आत्मा मे नूर होगा ।

झूठ, बेईमानी, मक्कारी में

झूठ, बेईमानी, मक्कारी में
लोग हो रहे मालामाल
सत्य,ईमानदारी,सादगी में
भले लोग हो रहे बेहाल
चोंकिए नही इसका दोषी
है कलियुग का महाकाल
गधे पजरी खा रहे है अब
बौद्धिक बजा रहे है गाल
इस कलियुग के प्रभाव से
अब तो मुक्ति पानी ही होगी
जो विकार घेरे है हम सबको
उनको अलविदा कहनी होगी
पतित से पावन बनने का
यही तो स्वर्णिम अवसर है
परमात्मा से योग लगाने का
संगमयुग पावन उत्सव है।

हे मेरे शिव परमात्मा

हे मेरे शिव परमात्मा
कर दे कटुता का खात्मा
नेताओं को सद्बुद्धि दे दो
बोलने का सलीका दे दो
सदन कोई भी क्यो न हो
भाषण सिवा होता क्या है
सच बोलने से रोकना क्या है
सत्ता पक्ष सब हरा हरा
विपक्ष सारा बुरा बुरा
नज़र उन्हें क्यो आता है
कुर्सी की गरिमा रखनी थी
न्याय-तूलिका अपनानी थी
यदि ऐसा हुआ होता
संसदीय मंत्री ऐसा न होता
बचाव में कोई उतरा न होता
इस्तीफा अगर ले लिया होता।

सदा गुलाब से खिलते रहो

सदा गुलाब से खिलते रहो
कांटो के संग भले ही रहो
सद्कर्मो की महक फैले
ऐसा सदाचरण करते रहो
कलियुग की इस कोठरी में
बेदाग हमेशा बने रहो
सतयुग आहट हो चुकी है
कलियुग की उम्र बीत चुकी है
तमस बाद उजाला निकलेगा
आशाओ का दीपक जलेगा
युग परिवर्तन के नायक बनो
कर्मशीलता के अधिनायक बनो।

इतना सीधापन किस काम का

इतना सीधापन किस काम का
न दूर का दिखाई दे, न पास का
हमने भगवान समझ पूजा तुम्हे
पर तुम्हें लगा यह किस काम का
तुम्हे अंधेरे में रख किया उसने वार
ओर तुम घायल हो गए खामखा
फलो पर पत्थर मारे वे किसके थे
अपना बाग उजाड़ते हो खामखा
बड़े हो तो बड़प्पन भी रखा होता
यूं कोई नाराज़ नही होता खामखा
फ़र्ज अपना नही निभाया न सही
गलत का साथ तो न देते खामखा
जिसे आप समझ रहे अपना ख़ास
उसने अपने दूर कर दिए खामखा
मुझ पर न सही ईश्वर पर भरोसा करो
आंखें खोलो मत भटको खामखा।

वकील आंदोलित है

वकील आंदोलित है
न्याय व्यवस्था ठप्प
अधिवक्ता एक्ट में
कई संशोधन करप्ट
बार कौंसिल में गैर वकील
कैसा यह मज़ाक
हार गया अगर मुकदमा
झेलना पड़े संताप
अन्याय का विरोध भी
हो जाएगा प्रतिबंधित
काम अगर रोका तो
किए जाएंगे दंडित
तभी तो प्रतिवाद जारी है
वकीलों की हड़ताल भारी है।

कलियुग-विदाई के लिए

कलियुग-विदाई के लिए
आओ पतित से पावन बने
अंधकार से प्रकाश का
आगाज़ आओ हम करे
ज्ञान के सूर्योदय की
मधुर बेला को नमन करे
शिव के अवतरण का
मधुर याद से आव्हान करे
शिव परमात्मा नमः का
बीज मंत्र आत्मसात करे
इंसान से देवता बनने की
राह आसान हम करें।

जो भी कर्म कर रहे हो

जो भी कर्म कर रहे हो
खूब समझ लो सार
परमात्म आँख देख रही
खड़ी तुम्हे उस पार
परमात्म आँख को अच्छा लगे
ऐसा कर्म करो बार- बार
तभी तुम्हे मिल सकेगा
प्यारे परमात्म का प्यार
कोई जगह ऐसी नही
जिस पर न पड़ सके
परमात्मा की नजर
फिर किससे छिपाना
करते रहो सदा सद्कर्म
ये सद्कर्म तुम्हारी नैया
वैतरणी पार लगा देंगे
तुम्हे पतित से पावन कर
एक अच्छा इंसान बना देंगे।

कोई श्याम कहता था

कोई श्याम कहता था
कोई शशि पुकारता था
शब्दो के जादूगर को
हर कोई निहारता था
हरिद्वार की मिटटी में जन्मे
महानिदेशक प्रकाशन बने
कई पुस्तकें लिख डाली
लेखनी के यायावर बने
पद्मश्री तक सम्मान पाया
हर किसी को अपना बनाया
निरहंकारी रहे सदा
सरस्वती-पुत्र कहलाया
चले गए अचानक शशि
धूमिल न होगी उनकी छवि।

वर्तमान अपना अच्छा बना लो

वर्तमान अपना अच्छा बना लो
परमात्मा को मन मे बसा लो
खराब समय सब टल जायेगा
आपका कल भी संवर जायेगा
कोई अवगुण पास न आने पाए
सद्गुण हमारे अंदर बस जाए
विचारों मे बहे प्रेम की गंगा
होने न पाए साम्प्रदायिक दंगा
शांति,प्रेम ,सदभाव अपना लो
मानवता की मशाल जला लो
तब कलियुग-अंत हो जायेगा
सतयुग स्वतः आ जायेगा।

सबके खून का रंग एक है

सबके खून का रंग एक है
फिर क्यो पक्षपात करे
मानव मानव मे भेद न हो
ऐसा कुछ इंतजाम करे
जात पूछना जरूरी नही
धर्म जानना जरूरी नही
इंसान में बस इंसानियत हो
क्षेत्र जानना भी जरूरी नही
है सब परमात्मा की संतान
इस सत्य को जानना जरूरी है
जो गुण पिता परमात्मा में है
वे गुण अपनाना जरूरी है।

सदा सत्य के पथ पर चले

सदा सत्य के पथ पर चले
सफलता की सीढियां चढ़े
स्वास्थ्य भी उनका अच्छा रहे
मन मे शांति का वास रहे
जो असत्य का मार्ग चुनते है
वे कष्टो से घिर जाते है
एक झूठ सौ पाप के बराबर
एक सच सौ पुण्य के बराबर
इनमे से जो पुण्य कमाता है
वही शांति व खुश को पाता है
आत्मा उनकी पावन रहती है
परम आनन्द से भरी रहती है।

बिरसा मुंडा की पावन धरा पर

बिरसा मुंडा की पावन धरा पर
सेनानी परिवार पधारे है
दो करोड़ परिवारों की आवाज़
बन गए उत्तराधिकारी प्यारे है
पूर्वजो ने आजादी दिलाई थी
हम स्वाभिमान बचाएंगे
शहीद सेनानियों की जीवनी
पाठ्यक्रम में शामिल कराएंगे
देश के लिए क्या कर सकते है
यह विचार मंथन हम करेंगे
यह आज़ादी अक्षुण बनी रहे
इसी के लिए हम काम करेंगे
रांची का यह सेनानी सम्मेलन
निश्चित ही अब सफल होगा
आवाज़ पहुंचेगी दूर तक
सबका सम्मान भरपूर होगा।

तरस गए है चिठ्ठियों को

तरस गए है चिठ्ठियों को
डाकिए थैला है खाली
पोस्टकार्ड, इनलैंड भूले
डाक लिफाफे बने सवाली
फेसबुक,व्हाट्सएप चैटिंग ने
बेकदरी चिठ्ठियों की कर दी
मैसेंजर, ट्विटर ने तो अब
डाक उपयोगिता ही घटा दी
पत्र बांटने को तरस गए है
हमारे अपने पोस्टमैन भैया
टेलीग्राम इतिहास बन गए
प्रेमपत्र तक नही आते भैया।

प्यार के लिए हो गए

प्यार के लिए हो गए
सन्त वैलेंटाइन बलिदान
क्लॉडियस ने दे दिया था
उनकी फांसी का फरमान
खुशी नही ,शोक की है ये बात
देह प्रेम की नही है ये कोई बात
सच्चा प्रेम करना है अगर
परमात्मा से ही कीजिए
वैलेंटाइन डे पर उनसे
कुछ रूह रिहान कीजिए
वही तो एक है अपना
जो प्रेम का सागर कहलाता है
उसी के प्रेम से भर लो गागर
वही हमारा सुखदाता है।

13 फरवरी पुण्यतिथि पर विशेष

ढूंढ रहा हूँ तुमको मैं यहां वहां
न जाने ढूंढा तुमको कहां कहां
कहां चले गए आकर बता तो दो
जहां रह रहे हो वहां का पता दो
तुम ही लाये थे मुझको दुनिया मे
मेरे लिए ख्वाब सजाये दुनिया मे
मेरे ख्वाब पूरे कर कहां चले गए
मातपिता मेरे तुम कहां चले गए
तुम्हे देखकर लगता था, मैं बच्चा हूं
साया हटते ही बचपन चला गया
खुशियो भरा कुंभ जैसे रीत गया
तुम्हारे दिए सुसंस्कार मेरे काम आए
सत्य पथ पर कदम नही डगमगाए
हौंसला दिया अन्याय से लड़ने का
उसी से मेरे कदम यहां टिक पाये
जानता हूं स्वर्ग है तुम्हारा ठिकाना
सत्कर्म किये वही आपके काम आए।
मदन -प्रकाशवती की अनूठी जौडी
हर बार साथ आये जैसे चांद चकोरी।

सार्थक जीवन के लिए

सार्थक जीवन के लिए
व्यसनों का करो प्रतिकार
तन मन दोनों स्वस्थ रहे
जीवन बने सुख आधार
व्यसन एक बुराई है
जीवन मे इससे अशांति छाई
स्वयं दुखी , परिवार दुखी
हो जाती है जग हंसाई
सात्विक बनो आध्यात्मिक बनो
देश के अच्छे नागरिक बनो
लोगो के दुलारे हो जाओगे
गुणवान खुद में बन जाओगे।

‘मैं’ ही करता हूं सबकुछ

‘मैं’ ही करता हूं सबकुछ
मत पालिए यह अभिमान
करने वाला कोई ओर है
उसी के बारे में अब जान
इस सृष्टि का रचियता वह
नही उसको कोई अभिमान
करता सबकुछ वही तो है
मुफ्त में पाते हम सम्मान
निमित्त बनकर सेवा करो
सभी कार्य उसका जान
‘मैं’पन स्वयं दूर हो जाएगा
सफलता अपनी निश्चित जान।

प्रकृति बसंत से लबरेज हो गई

प्रकृति बसंत से लबरेज हो गई
ठंडक मौसम में अब कम हो गई
सुहाना मौसम हमें भाने लगा है
बसंती उपवन लुभाने लगा है
खेतो में दूर तक छाई हरियाली है
प्रकृति आवरण बदलने वाली है
आओ खुद को भी बदल डाले
व्यर्थ के विचारों को धो डालें
अपने लिए कुछ समय निकालें
आखिर कौन है हम, यह तो जाने
जब आत्म साक्षात्कार हो जाएगा
परमात्म से कनेक्शन जुड़ जाएगा।

दिल्ली ने छिन लिया

दिल्ली ने छिन लिया
केजरीवाल का ताज
भाजपा में जीत का
छा गया है उल्लास
कांग्रेस गहरे सदमे में
नही मिली कोई सीट
आंकड़ा शून्य में है
अब तो मंथन कर लो
एकता क्यो टूटी,
इंडिया गठबंधन बिखर गया
जनता भी उनसे रूठी
भाजपा जरूरत नही
मजबूरी बन गई है
सामने बनो विकल्प
जनता चाह रही है
पर इसके लिए करो
स्वयं में ठोस बदलाव
हवाई नेताओं को छोड़ो
जमीनी को आगे लाओ।

प्रभु के सामने समर्पण कर दो

प्रभु के सामने समर्पण कर दो
सारी परेशानी प्रभु को दे दो
सबसे बड़ा चिकित्सक है प्रभु
अपनी बीमारी प्रभु को कह
जज भी बड़ा वही कहलाता
पल भर में न्याय मिल जाता
सबसे अच्छा शिक्षक है प्रभु
ज्ञान का अथाह भंडार है प्रभु
जीवन जीने की कला सिखाता
विकारो से हमे मुक्त कराता
पवित्रता का भी सागर है प्रभु
सच मे हमारा पिता है प्रभु
आओ प्रभु पिता को याद करे
उनसे सुख शान्ति प्राप्त करे।

हे परमधाम वासी

हे परमधाम वासी
न हरिद्वार मिलते हो
न काशी
मन्दिर में ढूंढा
मस्जिद में ढूंढा
ढूंढा चर्च गुरुद्वारे में
कही नही मिले तुम
इस कलियुग के
अंधियारे में
तुम ही तो हो कांटो से
फूल बनाने वाले
संकट सारे
हर लेने वाले
जो याद तुम्हे
कर लेते है
उन्ही के पास
तुम चले आते हो।

हमारा मूल धर्म है शांति

हमारा मूल धर्म है शांति
आत्मा का यही मिजाज
क्रोध होता है क्षणिक
चलता शांति का ही राज
क्रोध बिगाड़ता शरीर को
आत्मा विचलित हो जाती है
आत्मस्वरूप मे रहने से
मन को शांति मिलती है
शांत मन अगर रहा तो
संकट मिट जाएंगे सारे
मन व शरीर स्वस्थ रहेगा
परमात्मा मिल जाएंगे प्यारे।

खो गया है बचपन

खो गया है बचपन
ढूढो मेरे भाई
खो गई है मासूमियत
नही रहा है प्यार
कुश्ती,खो खो,गिल्ली डंडा
कबड्डी भूल गए है सब
मोबाईल पर
चल रही उंगलिया
मोबाईल गेम में
खो गए है अब
प्रभात फेरी,ईश्वर प्रार्थना
बीते जमाने की बात हो गई
कान्वेंट के नाम पर
संस्कृति भी खो गई
नये जमाने के नाम पर
परिवर्तन का दौर आया
राम राम अभिवादन गया
हाय हैलो का समय आया।

चेहरा चलन एक सा

चेहरा चलन एक सा
वही बन्दा नेक सा
समस्याओं को भूल जाएं
बस, समाधान याद आये
स्नेहशीलता की सौगात हो
स्वयं में मुक्ति आभास हो
मुक्तिदाता का यही फरमान
नही करो कभी अभिमान
विकारों का त्याग करो
सद्गुणों को धारण करो
देव समान बन जाओगे
परमात्म प्रिय हो जाओगे।

अंतरात्मा की आवाज है

अंतरात्मा की आवाज है
परमात्मा की आवाज
सदा सही राह दिखाती है
हमसे न्याय कराती है
भरोसा इस पर करते रहिए
जीवन मे आगे बढ़ते रहिए
इससे भी अगर अच्छा चाहिए
परमात्मा में ध्यान लगाइये
आत्मा को शक्ति मिल जाएगी
सत्यता वाणी में आ जायेगी
इसी से सदपरिवर्तन हो जाएगा
नये युग का सूर्योदय भी हो जाएगा

भाग्य के भरोसे

भाग्य के भरोसे रहो नही
सद्कर्म से पीछे हटो नही
जितना हो सके परिश्रम करो
लक्ष्य पाने को संकल्प धरो
मंजिल जरूर मिल जाएगी
खुशियां साथ ले आएगी
परमात्मा भी साथ होंगे
सफलता की सौगात देंगे
बस, सुख को गले लगाना है
बुराइयों से मुक्त हो जाना है
सफल जीवन का यही मार्ग है
शांत चित्त सुखानन्द यहां है।

जो तुमको बुरा कहे

जो तुमको बुरा कहे
उसका भी स्वागत करिए
केवल बुरा वह हुआ
जिसने बुरा तुमको कहा
उसके मन मे आई बुराई
फिर जबान गन्दी करवाई
जिसने किया बुराई का वार
अस्वीकार करो उसका प्रहार
उसकी स्तिथि बिगड़ती जाएगी
आपकी हालत बदल न पाएगी
वह क्रोध से लाल होगा
तुम्हे तनिक न मलाल होगा
आप शांत स्वरूप मे टिके रहे
वह अपना विवेक मिटाते रहे
अच्छे बुरे मे भेद यही है
प्रभु का गजब खेल यही है।

सदा शांतचित रहा करो

सदा शांतचित रहा करो
मन को न भटकाया करो
मस्तिष्क कभी खाली न रहे
सद्चिन्तन करते रहा करो
व्यर्थ बातो से परहेज करे
नही किसी से कोई द्वेष करे
मानवीय गुणों का समावेश करो
चरित्र का अपने निर्माण करो
व्यसन विकार मिटा दो सभी
गैर को अपना बना लो अभी
समाज मे बहे प्यार की गंगा
न हो किसी से कभी कोई पंगा
सबको साथ लेकर तो चलो
सबको अपना बनाकर चलो
घर घर मे बरकत हो जायेगी
परमात्मा की कृपा हो आएगी।

भाईचारा जगत बना रहे

भाईचारा जगत बना रहे
हर कोई अपना सगा रहे
नही किसी से हो नफरत
ऐसा एकता भाव बना रहे
दुःख सुख मे सब भागीदार हो
एक दूसरे के रिश्तेदार से हो
विश्व बन्धुत्व की मिशाल रहे
ऐसा अपना हिन्दुस्तान रहे
सभी धर्मानुयायी बनकर रहे
सहिष्णुता जग मे फैलाते रहे
लड़के –लड़की मे भेद न हो
बुजुर्गो को मान मिलता रहे
अहिंसा जीवन का आधार रहे
शाकाहार सबका आहार रहे
घर आँगन का बंटवारा न हो
मन्दिर समान हमारे घर हो
परमात्मा का होता गुणगान रहे
अपने भारत का ऊंचा नाम रहे।

सदा सत्य के साथ चलो

सदा सत्य के साथ चलो
मन को अपने साफ करो
जीवन मे पुरुषार्थ करो
परमात्मा को याद करो
सफलता तुम्हे मिल जायेगी
खुशहाली तुम्हारे घर आएगी
गैर भी अपने बन जायेगे
तुमको प्यार से गले लगाएंगे
मगर इतना तुम ध्यान करो
कतई भी अभिमान न करो
जमीन से जुड़कर जीना सीखो
स्वमान मे बस रहना सीखो।

द्रष्टा बनकर

द्रष्टा बनकर
रहना सीखो
विचलित कभी
न होना सीखो
जो हो रहा है ,
अच्छा हो रहा है
इस सत्यता को
स्वीकारना सीखो
दुःख सुख तो है
प्रालब्ध की देन
आते जरूर
येन केन प्रकारेण
फिर उनसे
घबराना कैसा
मन को अस्थिर
करना कैसा
जो होना है
होकर रहेगा
काल का पहिया
घूमकर रहेगा
परमात्मा पर
भरोसा करना सीखो
उनके जैसा बनना सीखो।

निकाय चुनाव सम्पन्न हो गए

निकाय चुनाव सम्पन्न हो गए
चुनाव परिणाम सामने आ गए
जो जीत गए खुशियां मना रहे
जो हार गए वे कमियां खोज रहे
किसी ने करोड़ो खर्च किये है
कोई लाखो में सिमट गया है
वोटरों ने भरपूर मजा लिया है
बैनर,पोस्टर वालो की रोजी चली
प्रचार में ई-रिक्शा घूमी गली गली
किसी ने अपने घर खाया ही नही
दावत उड़ाये बिना आया ही नही
जो हाथ जोड़कर कल बुला रहे थे
वे ही मुहं फेरकर आज जा रहे थे
चुनाव की यही तो अजब माया है
कही धूप है तो कही अब छाया है।

विकारो की गठरी छोड़कर

विकारो की गठरी छोड़कर
आओ हम हल्के हो जाये
देह अभिमान त्याग कर
आओ हम विदेही हो जाये
कोई भी भारीपन न रहे
इतने हम हल्के हो जाये
मन के आवेगों से उड़कर
मूल वतन हम होकर आये
जहां नही है कोई भी रावण
ऐसे वतन को हम अपनाये
नारी का जहां हो सम्मान
ऐसा वतन अपना बनाये।

जीवन प्रभु की देन है

जीवन प्रभु की देन है
जीवन है अनमोल
जीवन को सुंदर बना लो
मुख से सुंदर बोलकर
बोझ नही होता है जीवन
दुख नही देता है जीवन
बस, अच्छा अच्छा बोल
ईर्ष्या,द्वेष,जलन छोड़ो
सबके सुख की जय बोलो
हो सभी का भला सदा
ऐसी मुख मे मिश्री घोल
परमात्म याद में रहे सदा
ऐसा ही कुछ मुख से बोल
जीवन पूरा सफल हो जाए
जीवन बन जाए अनमोल।

ऊंचे से ऊंचा सोचकर

ऊंचे से ऊंचा सोचकर
चढ़ते जाओ सोपान
देह बन्धनों से मुक्त हो
हलके हो जाओ इंसान
इंसान से देवता बनना
अब है बहुत आसान
विकार छोड़ पवित्र बनो
छोड़ो व्यर्थ का पोथी ज्ञान
कृष्ण सरीका बनने को
मेहनत तो करनी ही होगी
यह कलियुग बीत जाएगा
अगली दुनिया तुम्हारी होगी।

आओ आज हम मतदान करें

आओ आज हम मतदान करें
अपने कर्तव्य का पालन करें
हमारे मतदान से भविष्य बनेगा
उम्मीदो का एक सूरज उगेगा
लेकिन आज सजग रहना होगा
जो अच्छा है उसे चुनना होगा
गिरगिटो से बचकर रहना
झूठे वादों के बहकावें में न आना
जाति-धर्म मे उलझना नही है
प्रलोभनों में भी आना नही है
जो सबसे योग्य हो उसे चुनिए
विकास की राह आसान कीजिए।

प्रत्युत्तर

मर गई मानवता हृदय की
भर गई सोच मे दानवता
मानव मानव का बैरी बन रहा
बँटा धर्म जाति मे, रही कुटिलता

घात प्रतिघात हि उद्देश्य रहा
जीवन का अर्थ निरुद्देशय रहा
समझा हि नहीं सत्य नर ने प्रभु का
पतन मार्ग में कुछ न कभी शेष रहा

द्रोह मे देह नहीं ,मरती रही आत्मा
कह कर भाई, कर रहे भाई का हि खात्मा
निबहे कैसे रिश्ता भाई चारे का आपस में
आपस में ही बाँट रहे जब परमात्मा

निर्णय कठोर अब लेना होगा
बदले नहीं तो अब बदलना होगा
लगाव प्रेम की भाषा बनी दीन हीन
प्रत्युत्तर मे हि अब उत्तर भी देना होगा

बजे न करतल ध्वनि एक हाथ से
हाथों से हाथों को अब धरना होगा
समझ न आये जब बंधुत्व भाव किसी को
बैर भाव के खातिर भी तब लड़ना होगा

मां

पहली बार जब मां देखी
तब मेरा वजूद न था
सांसो और रुदन के अलावा
मेरा कोई शोर न था
मेरे लिए असहनीय पीड़ा
मेरी मां ने झेली थी
मुझे धरा पर लाने को
उसने परेशानियां सह ली थी
मेरी एक मुस्कान की खातिर
रतजगा वह करती थी
मैं बिस्तर गीला करता
वह उस पर सो जाती थी
छींक मुझे गर आ जाती
माँ डर से सहम जाती थी
घुटनो के बल मुझे चलाती
खुद पूरी झुक जाती थी
मुझे भरपेट खिलाने को
मां भूखी रह जाती थी
मेरी ख्वाहिश से अपने सपने
मां पूरे कर लेती थी
बड़ी से बड़ी बीमारी को
वह अपने अंदर समा लेती
दर्द चेहरे पर न लाकर
मैं ठीक हूँ ,वह बता देती
माँ नही देवी थी वह
जो सदा हित ही चाहती थी
सदा सुखी रहो मेरे बच्चों
दिल से वो यह कहती थी
इस जहान से चली गई माँ
एहसास उसका आज भी है
दुनिया की सारी दौलत फीकी
बस माँ का होना लाज़मी है
कमबख्त है वे दुनिया मे
जिन्हें माँ की कद्र नही
जिसने माँ को कष्ट दिया
उसके जीवन मे चैन नही
परमात्म कृपा गर चाहिए
माँ का दिल से सम्मान करो
जीवन सफल हो जाएगा
परमात्मा का भी ध्यान धरो।

उषा की लालिमा से जग मे

उषा की लालिमा से जग मे
जब होने लगे प्रकाश
उससे पहले ही उठ जाओ
बुलाओ प्रभु को अपने पास
प्रभु की याद मे जब
होती है दिन की शुरुआत
काम सभी अच्छे हो जाते
मन मे रहती एक मिठास
प्रभु है परमपिता हमारे
हम है प्रभु की सन्तान
प्रभु को स्मरण करने से
मिटता जीवन से अभिमान।

सोच समझकर वोट कीजिए

सोच समझकर वोट कीजिए
कौन है अच्छा परख लीजिए
कौन खरीदकर लाया टिकट
कौन सेवा करेंगा देख लीजिए
यही समय है संभलने जाने का
वोट अपनी कामयाब करने का
जो पैसे के बल पर खड़े हुए है
दिमाग उन्ही के सड़े हुए है
मुफ्त में शराब,रुपये बांट देंगे
वोटो पर तुम्हारी डाका डाल देंगे
जीतते ही फिर न नज़र आएंगे
शक़्ल न अपनी फिर दिखलायेंगे
जो खर्च कर रहे दोगुना कमाएंगे
विकास को तुम्हारे ठेंगा दिखाएंगे
हिन्दू-मुस्लिम भी वही कराते है
आपस मे हमको वही लड़ाते है
शांति-सदभाव न मिटने दीजिए
जो सबसे योग्य हो उसे वोट दीजिए
वोट डालने भूलना भी नही है
अपने अधिकार को फलित कीजिए
नगर में अपनी सरकार दीजिए।

साया जबसे उठा माँ का

साया जबसे उठा माँ का
बिन माँ के हो गए हम
जिस आँचल में जन्नत लगती
उससे महरूम हो गए हम
माँ नही, दुनिया लगती थी
उस दुनिया से खो गए हम
डांट डपट सब कर लेती थी
थप्पड़ गाल पर जड़ देती थी
फिर भी सबसे प्यारी लगती
पिटाई भी मनभावन लगती
उसकी डांट में मिठास भरी थी
पिटाई में भी दुलार बड़ी थी
थे हम उसके कलेजे के टुकड़े
बिन माँ अनाथ हो गए हम
माँ के लिए सुबह की किरण थे
अब ढलती शाम हो गए हम
ईश्वर थी ईश्वरमय हो गईं माँ
माँ बिना ,कटी पतंग हो गए हम
माँ रूप होता जब ईश्वर का
तब ईश्वर को ही याद करो
वही करेगा पोषण हमारा
बस ईश्वर का धन्यवाद करो।

शिव परमात्मा

शिव परमात्मा ने की थी रचना
सन 1876 में घटी एक घटना
दादा लेखराज धरा पर आया
हीरे जवाहरात कारोबार फैलाया
60 वें बरस मे रूहानियत आ गई
धन दौलत तक रास न आई
वानपरस्ती जीवन अपनाया
छोड़ दी सब मोह और माया
सारी दौलत न्यास में दे दी
न्यास की चाबी बच्चियो को सौंप दी
यही बच्चियां ब्रह्माकुमारी कहलाई
चरित्र निर्माण की अलख जगाई
सिंध कराची से माउंट आबू आए
शांतिदूत जगत भर मे फैलाये
दादा लेखराज ही ब्रह्माबाबा बने
युग परिवर्तन के संवाहक बने।

यश कीर्ति दिलाते सद्कर्म

यश कीर्ति दिलाते सद्कर्म
इसी से होता सत्पुरुष जन्म
अहंकार का न हो नामोनिशान
वही कहलाते अच्छे इंसान
सद्कर्मो से मिटते है विकर्म
इसी होता है पावन तन-मन
सद्कर्म ही है परमार्थ का पथ
इसपर चलने से नही होता अनर्थ
छोड़ दो जो भी हो व्यर्थ
स्वयं बन जाओगे तुम समर्थ
परमात्म चिंतन करते रहना
सद्कर्मो को आगे बढाते रहना
जीवन सुपथगामि हो जाएगा
सहज परमात्म बोध हो जायेगा।

मन की प्रवृति

मन की प्रवृति शान्ति
फिर क्यों रहते अशांत
एक जरा सी ठेस से
क्यों हो जाता संताप
जो बिछाये राह मे पत्थर
शुक्रिया उसका कीजिए
उन पत्थरो से कामयाबी
जीवन मे पैदा कीजिए
मुश्किलों की दीवारे भी
राह न रोक पाएगी
शांत स्वरूप मे अगर रहे
मंजिल शीघ्र मिल जायेगी।

जो कल तक अजनबी थे

जो कल तक अजनबी थे
आज मीत बन गए है
जिन्हें अनदेखा करते थे
उनसे गले मिल रहे है
आखिर माज़रा क्या है
ह्रदय परिवर्तन का
अचानक अपनत्व का
दरअसल चुनाव चल रहे है
तभी सब गले मिल रहे है
वोट के लिए हाथ जोड़ रहे है
गलतियों की क्षमा मांग रहे है
दावत पर दावत कर रहे है
स्वयं को सगा बता रहे है
यह सब चुनाव तक होगा
जो चुनाव जीत जाएंगे
फिर बुलाने पर भी नही आएंगे
जो चुनाव हार जाएंगे
तुमसे कुपित हो घर बैठ जाएंगे
टिकट पाने में जो करोड़ो दिए
पहले जीतकर उनको कमाएंगे
कम पड़ गए तो तुमसे वसूलेंगे
टैक्स पर टैक्स तुमपर थोपेंगे
वे कुर्सी से चिपक जायेंगे
तुम पर हर रोज़ रोब जमाएंगे
तुम्हारे ही वोटो से बनी कुर्सी को
अपने बाप-दादा की बताएंगे।

बच्चा मन से बनकर देखो

बच्चा मन से बनकर देखो
थोड़ी शरारत करके देखो
ह्रदय प्रफुल्लित हो जाएगा
बचपन फिर से लौट आएगा
परमात्मा के हम सब बच्चे है
उनके लिए मन से सच्चे है
अपने बड़प्पन की झिझक छोड़ो
नन्हे मुन्नों के संग खेलो
कैसे खेलते थे छुपम छुपाई
आंखे भीच पूछते, कौन है भाई?
हास्य ठिठोली सब कुछ खेलो
इस दुनियां में जीभर कर जी लो।

शांत चित जिसका रहे

शांत चित जिसका रहे
वह प्रभु के निकट रहे
मिलता उसे मान सदा
जो व्यर्थ से मुक्त रहे
जो विकारो से ग्रसित न हो
पावनता उसके निकट रहे
देह है हमे प्रभु वरदान
क्यो हम इसके मोह मे रहे
आत्मबोध मे रहते है जो
वही प्रभु ध्यान मे मग्न रहे
जीवन का हर पल है कीमती
पल पल जीवन संवारते रहे
नही रहेगी कोई भी बाधा
जब प्रभु गुणगान करते रहे।

कड़ाके की ठंड में

कड़ाके की ठंड में चल रही है
निकाय चुनाव की गर्म ब्यार
कोई सुनहरे सब्ज़बाग दिखा रहा
कोई दिखा रहा पैसो की झनकार
पोस्टर, बैनरो से शहर पट गए
सड़को पर भी बैनर लटक रहे
23 जनवरी तक कदमो में गिरे है
अहंकार भूल गए सब विन्रम बने है
जीत की नैया पार लग जाये बस
यही अरमान हर प्रत्याशी के जगे है
किसी ने टिकट करोड़ो में खरीदा
किसी ने विद्रोह कर ताल ठोका
स्वयं को बता रहे सेवक जनता का
जीतकर क्या फिर नज़र आएंगे वे
ईमानदारी से क्या विकास कर पाएंगे वे
ऐसा यकीन हो तभी वोट दीजियेगा
वर्ना वोट की मजबूत चोट दीजियेगा।

जीवन मे बबूल बनो नही

जीवन मे बबूल बनो नही
कांटो से दोस्ती करो नही
जो दुख दे वह किस काम का
उसका हमसफ़र बनो नही
बनना है तो पीपल बनो
सबको शीतल छाया दो
प्राण वायु आक्सीजन दो
प्रेम,सदभाव ,संस्कार दो
गुणवान की होती है पूजा
सद्कर्म से बढ़कर काम न दूजा
इसी सदमार्ग पर बढ़ते चलो
पुरुषार्थ जीवन मे करते चलो।

गृह लक्ष्मी का सम्मान

गृह लक्ष्मी का सम्मान
करना बहुत ही आसान
पुरुष प्रधानता का अहं छोड़
स्त्री- पुरुष हो जाये समान
दोनो है परमात्म -सन्तान
फिर करते क्यो अभिमान
गृह क्लेश एक अभिशाप है
देता हर किसी को सन्ताप
घरेलू हिंसा तो महापाप है
परिवार विघटन का कारण है
शांति,सदभाव,प्रेम बढ़ाओ
हर परिवार को शांतिमय बनाओ।

हवा दीया बुझा तो सकती है

हवा दीया बुझा तो सकती है
जलाना उसके वश में नही है
विकार हमे गिरा तो सकते है
उठाना उनके वश मे नही है
नकारात्मकता अवरोधक है
गति देना उसके वश मे नही
फिर बिगाड़ते ही क्यो हो,
जब सुधारना वश मे नही है
बुरा नही, अच्छा ही कर लो
समय रोकना वश मे नही है
प्रत्येक पल कामयाब कर लो
जीवन कब तक पता नही है।

बीत गया जो उसे भूल जाओ

बीत गया जो उसे भूल जाओ
वर्तमान को ही सफल बनाओ
वर्तमान जिसका उत्तम होगा
भविष्य स्वयं सर्वोत्तम होगा
व्यर्थ चिंतन से मुक्ति इसकी दवा है
सफल जीवन की यही कला है
परमात्म चिंतन से आत्मा निखरेगी
देह अभिमान से मुक्ति मिलेगी
विकार भी योग से जल जाएंगे
तन मन दोनो पवित्र हो जाएंगे
सतयुग मार्ग यही से जायेगा
हमे सुखधाम राजयोग पहुंचाएगा

स्नेह-विश्वास बनाकर रखिए

स्नेह-विश्वास बनाकर रखिए
जमीर को अपने बचाकर रखिए
ठेस न लगने पाये किसी को
मुंह मे मिश्री घोल कर रखिए
जबान ही बनाती अपना पराया
शब्दों को बस, तोल कर रखिए
कड़वापन किसी को भाता नही
मिठास से अपने बनाकर रखिए
प्रभु को भाती है मीठी जबान
मधुर आवाज मे प्रभु याद कीजिए
हो जाएगी सारी पूरी मुरादे
पहले परमात्मा पर विश्वास तो रखिए।

समय केवल जाता है

समय केवल जाता है
वापस कभी नही आता है
जो समय व्यर्थ गंवाता है
उसके हाथ कुछ नही आता है
जो समय की क़ीमत समझता है
केवल सफलता वही हो पाता है
समय जिसकी मुठ्ठी से न फिसले
वह समय विजेता बन जाता है
परमात्मा भी प्यार करते है उसे
समय -चेतन देवता बन जाता है।

जनवरी मास सर्वोत्तम है

जनवरी मास सर्वोत्तम है
करिए इसका उपयोग
जितना ज्यादा हो सके
लगाइए परमात्मा से योग
याद में उनकी रहने से
शांत चित्त और मन होगा
खुशियों की हवा बहेगी
प्रफुल्लित घर उपवन होगा
शीतकाल का समय है यह
अमृत बेला उठो जरूर
परमात्मा से संवाद करो
जीवन का आनन्द लो भरपूर।

आओ अपना एक मुखिया चुने

आओ अपना एक मुखिया चुने
जो अच्छा हो सिर्फ उसे ही चुने
मुखिया बनने के लिए बेताबी है
झूठे-सच्चे वायदों की रकाबी है
मुखिया बनने की कतार में खड़े
भावी मुखियाओं में कोई गरीब नही है
करोड़ो देकर आए करोड़ो खर्च कर रहे है
तब जाकर गरीबो की पैरवी कर रहे है
नये स्वप्न अपने भाषणों में दिखा रहे है
मेरी मानो पहली गलती मत दोहराना
इन झूठे आश्वासनों में कतई न आना
जो खड़े है उनकी गिनती पहले दस में है
जो चुनेंगे उनकी गिनती 100 में 99 है
99 में से कोई मुखिया क्यो नही बनता
अपनी कीमती वोट को यूं न लुटाओ
अपने मे से ही कोई मुखिया बनाओ।

जनवरी शुरू क्या हुई

जनवरी शुरू क्या हुई
ठण्ड ने पाँव पसार लिए
कोहरे की चादर ने देखो
सूरज के पाँव थका दिए
धूप निकालना भूल गया
धरती से वह दूर हुआ
ठण्ड मे थर थर कांपे जन
जीना सबका मुहाल हुआ
नये वर्ष का जश्न भी बीता
चैन सभी का ठण्ड ने छिना
लिहाफ में भी निवाच नही
धूप निकलने की आस नही
हे परमात्मा अब रहम करो
ठंड दूर हो कुछ उपाय करो।

तारीख,महीना,साल बदल गए

तारीख,महीना,साल बदल गए
नही बदलती हमारी दिनचर्या
कलेण्डर बदलने की बधाईया
खुशियों की बजी शहनाइयाँ
दिनचर्या मे लाओ नया बदलाव
किसी का दिल न कभी दुखाओ
गैर को भी अब अपना बनाओ
देश के प्रति समर्पण-भाव लाओ
नारी सम्मान का संकल्प दोहराओ
बुराइयो से मुक्ति अब तो पाओ
पवित्र संकल्प कर बदलाव लाओ
आत्मबोध मे रहने की राह बनाओ
प्रभु याद में जीने का हुनर पाओ
इसी संकल्प को नववर्ष में अपनाओ।

कुछ अच्छा सोचे !

31 दिसंबर की रात
घड़ी की सुई ने
जैसे ही 12 पार किये
कलैंडर बदल गया
सन 2024 से
सन 2025 हो गया
फिर धीरे धीरे रात से
सुप्रभात हो गया
नया साल आ गया
परन्तु नया क्या हुआ,
सिवाय कलैंडर बदलने के 
क्या बुराइयां खत्म हो गई
क्या हिंसा अब नही रही
क्या अबलाओ पर अब
अत्याचार बन्द हो गए
क्या इंसानियत जीत गई है
क्या हैवानियत हार गई है
क्या विकारो पर 
विजय मिल पाई
क्या रावण 
हमेशा के लिए जल गया है
क्या राम राज्य आ गया है
क्या भूख से अब
नही मरेगा कोई
क्या अब कोई किसान
आत्महत्या नही करेगा
क्या अब किसी से
दुराचार नही होगा
क्या अब युवाओं से
खिलवाड़ नही होगा
यदि यह सब 
नही बदलना है
तो नये साल का हमे
क्या करना है,
चलो अच्छा सोचते है
कुछ गलत न होने पाये
ऐसी राह खोजते है
अच्छी सोच के साथ ही
2024 की हो चुकी विदाई
  आपको 2025 की बधाई।

सन 2024 कैसा रहा

सन 2024 कैसा रहा
आंकलन जरूर कीजिए
सुरक्षित बीता यह साल
धन्यवाद प्रभु का कीजिए
दुखाया अगर दिल किसी का
माफी उनसे मांग लीजिए
आहत जिसने किया तुम्हें
क्षमा उसे कर दीजिए
लक्ष्य रखा था जो आपने
कितना पूरा कर पाए उसे
कितनो के आंसू पोछ पाये
यह चिंतन भी कीजिए
पराये कितने अपने बने
उसे उपलब्धि मानिए
अपने अगर पराये हो गए
यह हानि बड़ी जानिए
परमात्मा को याद किया
या समय यूँ ही गंवा दिया
परमात्मा अगर याद रहे
ईश्वरीय अनुकम्पा मानिए।

अब चन्द ही दिन शेष है

अब चन्द ही दिन शेष है
सन 2025 के आने में
अब चन्द ही दिन शेष है
नया कलैंडर लगाने में
मुठ्ठी में से रेत की तरह
फिसल गया यह साल
हमको नही है फिर भी
इसका कोई मलाल
कुछ ने आत्महत्या की
कुछ दंगो की भेंट चढ़ गए
कोई महंगाई से मरा
कोई आबरू के लूटने से
कम से कम नये साल में
यह सब साथ न जाये
धैर्य की नई अलख जगाये
अपने लिए न सही, देश के लिए
शांति स्थापना की कसम खाये।

पंचतत्व का शरीर हमारा

पंचतत्व का शरीर हमारा
रखिए इसका मन से ख्याल
तन के लिए व्यायाम करो
मन के लिए कीजिए ध्यान
आत्मा का रथ है तन
स्वस्थ शरीर मे रहता मन
आत्म-खुराक है ईश्वरीय याद
सात्विक भोग शरीर की जान
अमृत बेला में उठना सीखो
प्रभु से योग लगाना सीखो
तन मन पावन हो जायेगे
सुखमय जीवन पा जाओगे।

शरद ऋतु का चरम है

शरद ऋतु का चरम है
बचकर रहिए ठंड से
गर्म कपड़ों से तन ढको
प्रभु को याद करो मन से
व्यर्थ कुछ भी सोचो नही
बेवजह कही घूमो नही
सालभर जो खोया-पाया
आकंलन करो खुद से
प्रभु ने जो कुछ दिया
उसका आभार कीजिए
कुछ अच्छा करने का
अब संकल्प लीजिए।

परमात्मा ने जीवन दिया

परमात्मा ने जीवन दिया
जीवन रक्षा का रखिए ध्यान
पेड़,पशु और मनुष्य
सब है जीव एक समान
जरा भी काँटा चुभ जाए
पीड़ा होती तड़पन समान
जब जीव पर हिंसा होती
लगती वह भी वज्र समान
मूल मन्त्र है जीवन का
सात्विकता का रखे ध्यान
प्रकृति अनुरूप करे आचरण
शाकाहार जीवन बलवान
बेजुबान पशु से हिंसा न हो
पेड़ की रक्षा को सीना तान।

यीशु जन्म की खुशिया अपार

यीशु जन्म की खुशिया अपार
सांताक्लॉज ला रहे उपहार
परमात्म सन्तान कहलाते है
दया,करुणा का पाठ पढ़ाते है
सजे हुए है सारे गिरजाघर
यीशु प्रार्थना हो रही घर घर
जन जन को केक खिलाते है
सब आनन्द दिल से मनाते है
हम सब भी है ईश्वर सन्ताने
यीशु समान ज्ञान को जाने
अंधेरे से उजाला जो लाते है
वही तो फ़रिश्ता कहलाते है।

क्रिसमस

क्रिसमस पर्व की बेला पर
आज याद आ रहे मालवीय
बीएचयू की स्थापना की थी
गंगा सभा संस्थापक मालवीय
स्वतंत्रता संग्राम के थे सिपाही
देश का स्वाभिमान थे मालवीय
अटल बिहारी का जन्मदिन भी
सारा देश आज मना रहा है
स्वच्छ राजनीति के थे प्रणेता
काव्य रूप उनका याद आ रहा है
विदाई 2024 की आहट है यह
सन 2025 शीघ्र आ रहा है।

राष्ट्रीय उपभोक्ता दिवस पर,

खरीदारी करिए जरा संभलकर
वस्तु व सेवा को सोच समझकर
गुणवत्ता से न समझौता करिए
वारन्टी -गारंटी में फर्क समझिए
मूल्य चुकाया है ,रसीद लीजिए
वारंटी-गारंटी का प्रमाण लीजिए
सेवा में कमी पर न्याय लीजिए
खराब वस्तु को बदल दीजिए
उपभोक्ता ही है सबका राजा
शोषण से मुक्ति न्याय दरवाजा
शीघ्र,सरल,सस्ता उपाय यही है
उपभोक्ता अदालत न्याय सही है।

बड़ा वही है जो

बड़ा वही है जो
दुसरो की नजर मे
रखता हो
आत्मिक सम्मान
स्वयं ही स्वयं को
बड़ा माने जो
कहते उसको
प्रबल अभिमान
अकिंचन मान कर
चले जो स्वयं को
मिलता उसे सदा
सामाजिक मान
जो करे स्वयं को
परमात्म समर्पित
पा जाता वह
दिव्य अधिमान।

स्वस्थ चिंतन से ज्ञान बढ़ता

स्वस्थ चिंतन से ज्ञान बढ़ता
व्यर्थ चिंतन से बढ़े अलगाव
स्वस्थ मन से प्रबल हो बुद्धि
चिंचित मन से बढ़े तनाव
मन को शांत रखने की युक्ति
व्यर्थ चिंतन से पा लो मुक्ति
राजयोग का अभ्यास करो
स्थिर मन का आधार बनो
नही रहेगी फिर कोई चिंता
परमात्मा हर लेंगे हर चिंता
खुशी चेहरे पर छा जाएगी
सुखमय दुनिया हो जाएगी।

करने वाला कोई ओर है

करने वाला कोई ओर है
स्वयं को निमित्त जान
फिर अपनी उपलब्धियों पर
करते हो क्यो अभिमान
जो करता है उसका नाम नही
प्रत्यक्ष कोई पहचान नही
उसका वजूद फिर भी बड़ा है
हमारा वजूद उसी पर टिका है
हम सब कठपुतलियां है उसकी
वह एक रचियता है हमारा
हमारे भाग्य के साथ खड़ा है
तभी तो हम सबसे बड़ा है।

जीवनपर्यंत ज्ञान दिया

जीवनपर्यंत ज्ञान दिया
कभी न कोई गुमान किया
शिक्षा का मंदिर बनाया
नोनिहालो का भविष्य सजाया
समाज सेवा में भी अव्वल रहे
राजनीति के सिकन्दर रहे
कांग्रेस में वे रचे बसे थे
दूसरे दलों के भी चेहते थे
रचनाधर्मियों के प्रेरक कहलाये
स्वतंत्रता सेनानियों के अपने थे
श्याम सिंह नाग्यान नाम तुम्हारा
तुम्हारे जाने से तमस पधारा
जहां कही हो आ जाओ तुम
तमस से प्रकाश ले आओ तुम।

संघर्ष सतत करते जाओ

संघर्ष सतत करते जाओ
कभी न तुम थकने पाओ
जीवन लक्ष्य ऊंचा बनाओ
परिश्रम से सफलता पाओ
परमात्म कृपा हो जाएगी
जीवन राह सुगम बन जाएगी
सद्ऱाह पर बस चलते जाना
सफल दर सफल होते जाना
विजयी मुकाम दूर नही है
कठिनाई इसमें कोई नही है
विकारो को बस छोड़ते चलो
पवित्रता को धारण करते चलो
स्वर्णिम युग की आहट होगी
दुनिया परिवर्तित जरूर होगी।

करो ठोस उपाय

तमस से मुक्ति का
करो ठोस उपाय
विकार जो भी मन मे
सहज खत्म हो जाएं
नकारात्मकता का त्याग
है एक सरल उपाय
मन मे बसे शांति
मुख पर कांति छा जाएं
साथ मे रहे प्रभु स्मरण
रूहानियत मिल जायेगी
जीवन श्रेष्ठ बन जायेगा
समस्या कभी न आएगी।

निकाय चुनाव ने कर दिए

निकाय चुनाव ने कर दिए
गणित कइयों के फेल
पुरुष उम्मीदवारो की रोक दी
बीच अधर में ही रेल
पासा ऐसा पलट गया
खेल सारा बिगड़ गया
जो किचन में थी,वे मैदान में है
आधी दुनिया आसमान में है
अब महिला ही मेयर होगी
कठपुतली न पुरुषों की होगी
नारी सशक्तिकरण का यही पैगाम है
नारी शीर्ष पर,पुरुष पायदान है।

शिव साधना मे जीवन बीताया

शिव साधना मे जीवन बीताया
मौन से अपनी ऊर्जा को बचाया
108 वर्ष इस धरा पर गुजारे
महाकाल के भी थे वे प्यारे
मुख पर उनके गजब तेज था
मौन की शक्ति से ईश्वरीय वेग था
संगीत ,गीत ,कला के थे पुजारी
आत्मा मे बसे थे सिर्फ भोले भंडारी
मुखरित न होने से बने मौनी बाबा
धर्म आध्यात्म की विभूति थे बाबा
उनका महाप्रयाण अखर रहा है
याद मे उनकी मन भटक रहा है
जहां भी हो बाबा चले आओ
दिव्य प्रकाश बनकर नजर आओ।

सत्य कभी न छोड़िये

सत्य कभी न छोड़िये
कठिन समय हो कोए
सत्य मे है शक्ति बड़ी
जीत इसी की होए
सत्य है परमात्म नाम
कल्याण इसी से होए
जो परमात्म पथ पर चले
परमात्मा उसे मिल जाए
सत्य एक परमात्मा है
परमात्मा ही पालनहार
ज्योतिबिन्दु स्वरूप है वह
शिव परमात्मा कहलाए।

अमृत बेला मे

अमृत बेला मे अमृत बरसता
इस घड़ी को देव भी तरसता
यह घड़ी है परमात्म बच्चों की
परमात्मा से होती बात बच्चों की
जो भी उठता है इस घड़ी मे
परमसुख मिलता है इस घड़ी मे
दो से पोने पांच तक की अमृत बेला
इसके बाद ही होता है सवेरा
इसी घड़ी मे परमात्म ध्यान करो
अपने जीवन मे आध्यात्म भरो
जीवन के संकट टल जाएंगे सारे
परमात्म सुख पाओगे प्यारे।

अंहकार

अंहकार कोई भी करे
कष्टदायी ही होता है
राम नही बनने देता
बस, रावण ही होता है
राम जैसा भेष बना कर
जो जनता बीच आ जाते है
ऊंचे ऊंचे स्वप्न दिखाकर
जनता को ठग जाते थे
वही भहरुपये भूल गए
जनता से किये वायदों को
किसान,मजदूर बेहाल हुआ
व्यापारी तक परेशान हुआ
इस पीड़ा का खामियाजा
उनको अब भुगतना होगा
अहंकार मुक्त होकर ही
जनसेवक कहलाना होगा।

प्रेम में

असीम शक्ति है प्रेम में
द्वेष करता कमजोर
जो अहंकार से लबरेज है
मिलता नही उसको ठोर
जिसके पास प्रेम है
उसके हर काम आसान
दिल से लोग सम्मान करें
बिगड़े बन जाते हर काम
जो निःस्वार्थ प्रेम पथ चले
ईश्वर रहते उसके पास खड़े
सारी बाधाओं से पार लगाते
विजयश्री उसी को दिलाते।

अवगुण जहां मौजूद हो

अवगुण जहां मौजूद हो
उनसे रहिए हमेशा दूर
जहां भी गुण दिखाई दे
उनके निकट जाइए जरूर
संग जिसका मिले साथ में
असर उसका होता है जरुर
अवगुण हुए तो अवगुण बढ़ेंगे
सदगुण हुए तो सदगुण बढ़ेंगे
यह सोचना तो आपका है
आपको क्या चाहिए हुजूर
हित अपना यदि चाहते हो
सद्गुणों में गोता लगाइये हुजूर।

मुझसे से आगे कोई जा न सके

मुझसे से आगे कोई जा न सके
हर राजा की होती यही सोच
रिश्ते नाते और सगे सम्बन्धी
सबमे दिखता उसको खोट
माता- पिता और गुरु जगत में
खोटे को भी खरा बना देते है
अपने से आगे ले जाने को वे
अपना पूरा जीवन लगा देते है
संत सानीदय मिल जाए अगर
सद्गुणों से तर जाओगे तुम
कृपा अगर हो गई सद्गुरु की
परमात्म मिलन कर पाओगे तुम।

दाता सिर्फ एक है

दाता सिर्फ एक है
कर लो उसको याद
परमपिता वह सबका
करता सबका ख्याल
जितना उसको याद करोगे
उतना ही सुख पाओगे
भूल गए अगर दाता को
फिर बहुत पछताओगे
रंक को राजा बनाने मे
राजा को रंक बनाने मे
प्रभु देर नही लगाता
किंतु अपने बच्चों को
वह कभी नही सताता
पिता है परमात्मा जब
फिर याचना उससे कैसी
वारिस है हम परमपिता के
मिलती बासना ऐसी।

सच चाहिए तो देखिए आईना

सच चाहिए तो देखिए आईना
झूठ नही बोलता कभी आईना
एक भी दाग लगा हो दामन पर
उसे भी सामने ले आता आईना
स्वयं को जानने की तरकीब है यह
स्वयं के सामने ले आइये आईना
सावधान, कैमरे की नजर मे है आप
क्यो भूलते हो परमात्मा का आईना
कही भी छिपकर कुछ भी करोगे
साफ पकड़ लेगा परमात्म आईना
खुद से न सही खुदा से तो डरो
वर्ना सजा दिलवा देगा यह आईना।

संघर्ष में तपकर

संघर्ष में तपकर कुंदन बनी हो
कांटो में तुम फूल सी खिली हो
अध्यात्म से निखरी मूरत हो
सीरत से भी बहुत खूबसूरत हो
विपत्तियों की कभी प्रवाह न की
अपनो की दिल से सेवा भी की
अपनो ने दिए भले दारुण दुःख
उनको भी मन से दुआएं ही दी
सुनीता तुम कर्मयोगिनी हो
जीवन संघर्ष की एक कहानी हो
जीवन तुम्हारा खुशियों भरा रहे
जन्मदिन पर ढेरो दुआएं है।

भाग्य के भरोसे बैठना

भाग्य के भरोसे बैठना
दुर्भाग्य को जन्म देने जैसा है
जो होगा हो जाएगा की सोच
ठहराव को जन्म देने जैसा है
जीवन रुकने से नही
चलने से ही चलता है
प्रयास रूपी कर्म करने से
व्यक्ति का भाग्य बदलता है
भाग्य पर नही कर्म पर भरोसा
सफलता की इबारत लिखेगा
प्रयास के कलम से लिखिए
अनदेखे सपने पूरे हो जाएंगे
आप खुद -ब- खुद सफल जायेंगे
मदद करने खुद ईश्वर आ जायेंगे।

उन्हें दूर के ढोल सुहावने लगे

उन्हें दूर के ढोल सुहावने लगे
जो अपने थे, वे पराये लगे
स्वार्थ की चकाचोंध मे खोये रहे
देह अभिमान मे इतराये रहे
जमीन को छोड़ कर उनका उड़ना
यथार्थ को नजरअंदाज करना
उन्हें विकारमय बनाता रहा
स्वयं से ही दूर भगाता रहा
काश!वे अंतरात्मा को जान लेते
कम से कम स्वयं को पहचान लेते
इतना यदि उन्होंने कर लिया होता
परमात्मा ने उन्हें अपना लिया होता

साधु-संतों का एक कुंभ

गुरुग्राम में भरा हुआ है
साधु-संतों का एक कुंभ
ब्रह्माकुमारीज रचा रही
सुखमय भारत का कुंभ
ईश्वरीय सेवा की रिट्रीट में
‘ओम शांति’ ध्वनि गूंज रही
स्वेत वस्त्रों की इस धरा में
केसरिया खूब चमक रही
शंकराचार्य नारी क्यों नही
सवाल संतों ने उठाया है
विश्व प्रेरक ब्रह्माकुमारीज है
यह संतों ने स्वीकारा है
धर्मसत्ता के योगदान पर
चर्चा संत करेंगे सब
स्वर्णिम भारत फिर से बने
यह संकल्प भी लेंगे सब।

सदाचरण पथ पर चलो

सदाचरण पथ पर चलो
विकार मुक्त होकर चलो
क्लेश कभी कोई न रहे
ऐसी शांति करके चलो
सदा मनमाफिक होती नही
हर बात बस मे होती नही
ईश्वरीय लीला मानकर चलो
स्वयं को निमित्त मानकर चलो
कष्ट दूर हों जायेगे सभी
गैर अपने बन जायेगे सभी
ईश्वर पर भरोसा करके चलो
सद संकल्पों के साथ चलो।

परमात्मा पर जब निश्चय

परमात्मा पर जब निश्चय
करना सीख जाओगे
परमात्मा तुम्हारे साथ
तभी से खड़े हो जाएंगे
एक बार सच्चे मन से
परमात्मा को याद करो
जो भी दुख है जीवन मे
वे पल मे दूर हो जाएंगे
परमात्मा है पिता हमारा
सबका भला वह चाहता है
उनको जब भी पुकारो
वह दौड़े चले आते है
दाता है वह जग के
बदले मे कुछ नही चाहते है
याद करो तो भाग्य बनाते
स्वर्णिम दुनिया मे ले जाते है।

उसके दरवाजे बंद नही है

उसके दरवाजे बंद नही है
न हमारे के लिए न तुम्हारे लिए
उसको एक आवाज तो दो
अपने लिए व अपनों के लिए
वह सदा ही सोचता है
तुम्हारे और हमारे लिए
हम ही न उसे याद करे
फिर उसका क्या कसूर है?
वह मदद को तैयार बैठा है
तुम्हारे लिए और हमारे लिए
वह कोई ओर नही
परमपिता परमात्मा हमारा
वही प्रभु पालक है
तुम्हारे लिए और हमारे लिए।

ओम

ओम शब्द मे स्थित होकर
मिल जाती है शांति हमको
ओम शांति अभिवादन कर
शांत स्वरूप आत्मा निर्मल
निश्चय बुद्धि बनाते परमात्मा
ओम शांति बीज-मन्त्र करिश्मा
परमात्मा पिता , गुरु कहलाता
हमे पढ़ाता , हमे सीखाता
दुःख हरता है,सुख दाता है
विकारमुक्त पवित्र बनाता
शिव शक्ति से बड़ा बनाता
विश्व कल्याण हमसे कराता।

शिव को याद करने से

परमात्म शिव को याद करने से
मुरलीधर बन जाओगे
शिव ही सामने दिखाई पड़ेगे
दिव्य आईना बन जाओगे
अपने मुंह मिया मिट्ठू बनना
देह अभिमान दिलाता है
जो वायदा किया है सेवा का
वह अधूरा ही रह जाता है
रूहानी यात्रा पर चलने को
सर्वस्व अर्पण कर देना होगा
जो दिया हुआ है परमात्मा का
वही तो तुम्हे लौटाना होगा
ज्ञान यही है गीता का
महादानी नही हो सकते तुम
जो है परमात्मा का है
ट्रस्टी कहलाने लायक तुम।

अमृतबेला में अमृत बरसाता

अमृतबेला में अमृत बरसाता
रोज सुबह आकर हमें उठाता
अंतरमन में सदविचार देकर
जागरूकता का पाठ पढाता
नियम,संयम,ध्यान कराता
तीनो कालों का बोध कराता
याद में मुझको अपनी रखकर
पतित से मुझे पावन बनाता
निमित्त बनाया उसने मुझको
ज्ञान दिया अपना मुझको
सुबह सवेरे स्वयं लिखवाता
सारा श्रेय मुझको दे जाता
वही शिव परमात्मा कहलाता।

जीवन है चलने का नाम

जीवन है चलने का नाम
चलना है तो न हो आराम
जो जन चलता जाता है
मंजिल वही तो पाता है
जो सोने मे समय गंवाता है
वह सफलता नही हो पाता है
जो समय के सामने बैठ गया
उसका भाग्य समझो बैठ गया
जो समय के साथ खड़ा रहा
उसका भाग्य सफल रहा
अथक जो चलता जाता है
भाग्य उस पर इतराता है
परमात्मा उन्ही के साथ है
समय जिनके हाथ मे है।

किसी को अपशब्द न कहे

किसी को अपशब्द न कहे
न हो किसी का अपमान
मन मे भी बुरा न सोचो
करो सबका सम्मान
व्यवहार हमारा प्रतिबिम्ब है
हमारे व्यक्तित्व का आईना
मधुर व्यवहार से मिल जाती
गैर के हाथो भी पालना
गैर को अपना बनाने का
यही एक महामन्त्र है
है सभी परमात्म सन्तान
हर एक आत्मा जनतन्त्र है।

ब्रह्माकुमारी विमला दीदी

ब्रह्माकुमारी विमला दीदी
याद हमें बहुत आती हो
ईश्वरीय सन्देश हमे देकर
परमधाम क्यों चली गई
ईश्वरीय वाणी हमे सुनाना
परमात्मा आए यह बताना
विकारो से सचेत कराना
पतित से पावन हमें बनाना
ईश्वरीय ज्ञान का भान कराना
माया को हमसे दूर भगाना
दीदी तुम्हे ही भाता था
भूल न पा रहे दीदी तुमको
तुमने ही रूहानी ज्ञान दिया
याद हमें है जो पढाया था
निमित्त बन समझाया था
देह का कभी न भान रहा
कोमल मन निरहंकार रहा
कभी न कोई विकार रहा
शिव की प्यारी बेटी कहलाती
शिव के पास ही चली गई
तन मन से पावन रहने का
सद संदेश देकर चली गई
लौट आओ दादी अब तुम
यूं न हमसे अट्टहास करो
ब्रह्माकुमारीज पुकार रही
आकर हमारा सन्मार्ग करो।

पुस्तकें ज्ञान का भंडार

पुस्तकें ज्ञान का भंडार है
इनके साथ जीना सीखिए
जो पुस्तकें सदराह दिखाती
उनको दिल से पढ़ना सीखिए
वेद,पुराण,रामायण पढ़िए
श्रीमद्भागवत गीता भी पढ़िए
पढ़ने के बाद धारणा करिए
परमात्म से भी संवाद करिए
किसने गीता का ज्ञान दिया
ईश्वरीय बोध का भान दिया
मैं कौन, मेरा कौन जिसने जान लिया
उसने परमात्मा को पहचान लिया।

मन मे सदा बसा रहे

मन मे सदा बसा रहे
परमात्मा शिव का नाम
दिन मे जब समय मिले
ले लो परमात्मा का नाम
सबका पिता है परमात्मा
चाहे मैं आत्मा हूं या आप
सच्चा केवल परमात्मा है
प्यारा केवल परमात्मा है
सुखदाता दुखहर्ता कहलाता
भला सभी का करता परमात्मा
अमृत बेला मे अमृत बरसाता
याद करे जो वह तर कर जाता
पतित से वह पावन बनाता
परमात्मा शिव कहलाता है
तभी तो वह सबको भाता है
उनसे जन्म जन्मांतर का नाता है।

राजनीतिक सुचिता के लिए

राजनीतिक सुचिता के लिए
करना होगा एक नया काम
संसद और विधानसभा में हो
नियमित राजयोग का ध्यान
सचिवालय -निदेशालय में भी
सबको आदत डालनी होगी
काम शुरू करने से पहले
परमात्म साधना करनी होगी
याद किसी को भी कर लो
ईश्वर, अल्लाह, गॉड, सतनाम
सबका मालिक वही एक है
याद करने की विधि बदलो या धाम
ऐसा करने से शांत मन हो जांएगे
सेवा कोई हो गलत नही कर पाएंगे।

मैं और मेरे मे भेद है भारी

मैं और मेरे मे भेद है भारी
आत्मा मैं और शरीर बाहरी
मैं एक निराकार आत्मा
उसी स्वरूप मे है परमात्मा
शरीर रथी कहलाता हमारा
आत्म जीवन चलाता हमारा
शरीर के भान मे रहना छोड़ो
आत्म बोध का रस तो घोलो
मैं पन जिसका खो गया
वही परमात्मा का हो गया
मैं का अर्थ अभिमान भी है
यह एक बड़ा विकार भी है
लौकिकता से जो परे हो गया
वही रूहानियत मे खो गया
परमात्म मिलन का आधार यही
पतित से पावन का मार्ग यही।

क्रोध पतन का कारक है

क्रोध पतन का कारक है
यह विकार बहुत घातक है
शांत मन को उद्वेलित करता
रक्तचाप अनियंत्रित करता
क्रोध स्वयं को ही जलाता है
कभी अच्छा फल नही देता है
क्रोध बुद्धि को भी हर लेता है
भला किसी का नही करता है
क्रोध से आज ही तोबा कर लो
शांत चित को धारण कर लो
तब आत्म सुख मिल जायेगा
परमात्म प्यार मिल जायेगा।

स्वर्ग यही, नरक यही

स्वर्ग यही, नरक यही
जो सोच लो वही सही
अच्छा सोचोगे अच्छा होगा
बुरा सोचोगे बुरा होगा
चाहते हो अगर अच्छा हो
मन भी हमारा सच्चा हो
हम सच ही सच अपनाये
स्वयं सचमय ही हो जाए
एक तू सच्चा तेरा नाम सच्चा
स्वयं को समझ परमात्म बच्चा
झूठ स्वतः मिट जाएगा
सच हमेशा हमारे काम आएगा।

ईश्वरीय मत पर जो चले

ईश्वरीय मत पर जो चले
अच्छा पथ ही उसे मिले
व्यर्थ के चिंतन से बचा रहे
सदैव स्वस्थ व सुखी रहे
जो हो रहा है अच्छा माने
ईश्वर का ही कृत्य माने
फिर चिंता काहे की करना
बिना वजह काहे को डरना
ईश्वरीय याद कभी न खोना
सदा खुशी से खिलते रहना
जीवन सुगम हो जाएगा
समाधान भी निकल आएगा।

दूसरे पर निरभर रहना

दूसरे पर निरभर रहना
है दुर्बलता की पहचान
जो होते है स्वावलम्बी
उन्ही को शक्तिशाली जान
एक बार बैशाखी ली तो
आदत उसकी पड़ जाएगी
जो शक्ति आत्मा में छिपी
वह नजर नही आएगी
परमात्मा को साक्षी मानकर
निर्भरता को त्याग दो
जो स्वावलम्बन आत्मा में है
उसको जीवन मे उतार लो ।

देशाटन करो कितना भी

देशाटन करो कितना भी
पर घर मे ही मिलता चैन
बहारी दुनिया बहारी है
अपने ही सुख देन
अपने अंदर स्वयं को खोजो
आत्मबोध हो जाएगा
जिसने भी स्वयं को जाना
ज्ञानी वही बन जायेगा
परमात्मा से लौ लग लगते ही
परमज्ञानी हो जायेगा।

कर ले कुछ अच्छा काम

कर ले कुछ अच्छा काम
वर्ना फिर पछतायेगा
मुठ्ठी मे रेत की तरह
वक्त फिसल जायेगा
स्वार्थ मे लिपटे दोस्त
कभी काम न आएंगे
जब आएगी जाने की बारी
अकेला तू ही जायेगा
जिनको दोस्त समझता तू
वे है तेरे पांचो विकार
इनसे मुक्त होकर ही
तू पावन बन पायेगा।

जितने सांस दिए प्रभु ने

जितने सांस दिए प्रभु ने
उतना ही जीना होगा
जो कष्ट लिखा है भाग्य मे
वह हमको सहना होगा
जो करता है सद्कर्म यहाँ
उसका भाग्य उज्ज्वल होगा
जिसने किये नीचकर्म
उसे नरक भुगतना होगा
जैसी करनी वैसी भरनी
जग की है यह रीत पुरानी
सदा सच की राह चले जो
जीवन उसका सुखमय होगा
परमात्म याद में लीन रहे जो
जीना उसका स्वर्णिम होगा।

पिता

पिता शब्द है बहुत महान
इस शब्द का रखिए मान
परमात्मा हम सबका पिता
लौकिक पिता जगत की शान
संतान हित चाहते है दोनो
सदराह का कराते भान
दोनो पालक इस जीवन के
दोनो ही देते आत्मा ज्ञान
दोनो के कर्जदार कहलाते
दायित्व का बस रखे ध्यान
दोनो पिता चाहते उन्नति
दोनो ही देते सुख महान
विकार मुक्ति के पक्षधर दोनो
पावनता को ही उपलब्धि जान।

जन्म से लेकर युवा होने तक

जन्म से लेकर युवा होने तक
पालना करती मां बच्चों की
खुद गीले मे, बच्चे सूखे मे
माँ प्यार लुटाती बच्चों की
छींक भी आएं दुलारे को
माँ घबरा जाती बच्चों की
उसके बच्चे खुशहाल रहे
माँ दुआएं करती बच्चों की
जब बच्चे बड़े हो जाते है
पैरो पर अपने खड़े हो जाते है
माँ पर बुढ़ापा छा जाता है
तस्वीर बदल जाती बच्चों की
माँ घर मे उन्हें भारी लगती
पत्नी, माँ से प्यारी लगती
वर्द्धाश्रम छोड़ आते माँ को
अक्ल मर जाती बच्चों की
कैसे मिलेगी खुशी उनको
अभाव में माँ है बच्चों की
माँ है परमात्म रूप सदा
दुआएं मांगती बच्चों की।

माया मोह

माया मोह में जो फंसा
दल दल मे जा धंसा
ये भी है एक बड़ा विकार
मिलती इसमे जन दुत्कार
माया मोह से कमजोरी आती
यह अपनो की गुलाम बनाती
माया मोह हर लेती विवेक
कोई काम न होता नेक
मोह स्वार्थ अंधा कर देता
भाग्य भी साथ छोड़ देता
ईश्वर भी नही रहता याद
इससे जीवन होता बर्बाद
अगर मोह त्याग करते हम
सुखी जीवन जी लेते हम।

लालच

लालच जिसने किया
रहा सदा वह बेहाल
लालच बुरी बला है
सोच समझकर जान
पांच विकारो में गिनती होती
लालच से बुद्धि विपरीत होती
गिर जाता है मान सम्मान
अपराध का जनक है लालच
अपनो को गैर बनाता लालच
गुण जरा भी नही है इसमे
अपने को बुरा बनाता लालच
अगर छोड़ दो सब लोभ लालच
परमात्मा भी खुश हो जाता है
इंसान से देवता बन जाता है।

क्रोध

क्रोध बड़ा विकार है
इसे समझ लो खूब
जिसने भी क्रोध किया
विवेक जाता उसका डूब
क्रोध जनक है रोग का
बढ़ता तनाव- रक्तचाप
जब भी कोई क्रोध करे
चेहरे पर पड जाएं छाप
इस विकार से मुक्ति का
है एक ही सरल उपाय
आत्म स्वरूप मे रहने से
सहज शांत मन हो जाएं
हमारा मूल धर्म है शांति
क्रोध है उसका अपवाद
परमात्म याद मे जो रहते
क्रोध न आता उनके पास।

प्रदूषण

प्रदूषण का बढ़ता खतरा
मानव जीवन के हितकर नही
स्वांस लेना दूभर हो जाए
ऐसा वातावरण हितकर नही
महानगरों से लेकर गांव तक
प्रदूषण से जीना मुहाल हुआ
देश की राजधानी दिल्ली में
खतरा जन-जन को अपार हुआ
गाड़ियों और चिमनियों के धुंए
जान पर आफत बन गए है
पेड़ फाइलों में लगने के कारण
आक्सीजन हमें दे नही रहे है
जीना है अगर बरसो तक
हर रोज एक पेड़ लगाए
कंक्रीट के जंगल बसाना छोड़े
प्रकृति के बीच अपने घर बनाएं।

माटी पर माटी लिखना

माटी पर माटी लिखना
है जितना आसान
उतने ही रिश्ते बनाना
है बाए हाथ का काम
पर बने रिश्तों को निभाना
होती है बड़ी चुनौती
पानी पर पानी लिखने की
जैसे कठिन होती है रीति
राम के सेतु की तरह
लिखा जा सकता है
पानी पर पानी
प्रेम और भाईचारे से
टिकी रह सकती है
रिश्तों की कहानी
लेकिन इसके लिए
स्वार्थ छोड़ना जरूरी है
शुभ भावना जरूरी है।

ब्रह्माकुमारीज संस्था

विश्व कल्याण को समर्पित है
ब्रह्माकुमारीज संस्था महान
शांति,सदभाव,चरित्रोथान का
अदभुत, दिव्य रमणीक स्थान
परमात्मा की अनूठी अनुभूति
होती ईश्वरीय विश्वविद्यालय में
राजयोग की साधना स्थली यह
वाइब्रेशन मिलती मधुबन में
जो भी आये यहां का हो जाये
ओम शांति मुख पर आ जाये
स्वयं को आत्म स्वरूप में लाकर
परमात्मा की याद में खो जाए।

जो मन के सच्चे होते है

भगवान प्यार करते है उन्हें
जो मन के सच्चे होते है
छल कपट बैर बुराइयो से
स्वयं ही वह दूर रहते है
कथनी करनी मे भेद न हो
मन के अंदर कोई मेल न हो
चिंतन करे परमात्मा का
राग द्वेष घृणा पास न हो
परोपकार का आभूषण रहे
चेहरे पर मुस्कुराहट बनी रहे
परचिंतन से मन दूर रहे
वही सबका प्यारा कहलाता है
दुनिया का हीरो बन जाता है।

आतिशबाजी का शोर

देर रात तक बजता रहा
आतिशबाजी का शोर
बड़े प्रदूषण के साथ हुई
आज के दिन की भोर
श्रीगणेश-मां लक्ष्मी पूजा
थोड़े समय ही हो पाई
ज्यादा समय सजावट में बीता
जमकर मिठाईयां खाई
एक नही दो दिन की दिवाली
हुआ तिथियों का खेल
परमात्मा को याद करो
रखिए आपस मे मेल
सुख,सम्रद्धि ,वैभव होगा
गोवर्धन, भैयादूज अब होगा।

एक बार फिर रिकॉर्ड बन गया

एक बार फिर रिकॉर्ड बन गया
28 लाख दीये एक साथ जलने का
वह भी उस अयोध्या नगरी में
जहां कभी भगवान राम जन्मे थे
भगवान राम ने एक साथ इतने दीये
शायद ही कभी एक साथ जलाए हो
भगवान राम ने जलाया था अहंकार
विकारों को हराया था बारम्बार
राम ने हमारी आत्म ज्योति जलाई
तभी तो मर्यादा पुरुषोत्तम छवि पाई
काश!हम भी 28 लाख दीयो के बजाए
28 लाख लोगों का जीवन रोशन कर पाते
उनकी जिंदगी से अंधेरा दूर कर पाते
तब आज की सच्ची दिवाली मना पाते।

आओ एक दीया जलाएं!


आओ एक दीया जलाएं
उन अमर शहीदों के नाम
जो देश पर बलिदान हुए
उन वीरांगनाओं के नाम
जिन्होंने अपार कष्ट सहे
उन गरीबो,वंचितों के नाम
जो तमस में जी रहे है
रोशनी की बांट जोह रहे है
उन बेरोजगारों के नाम
जिनकी जवानी स्वाहा हो रही है
नोकरी फिर भी नही मिल रही है
उन असहाय बुजुर्गों के नाम
जो औलाद के नाम पर ठगे गए
उनके प्रवासी होने से छले गए
एक दीया महंगाई के विरुद्ध हो
एक दीया झूठे वायदों का प्रतिवाद हो
एक दीया भ्र्ष्टाचार के खिलाफ हो
एक दीया अपराधियों के विरुद्ध हो
इन सबके साथ एक दीया ऐसा जलाएं
जो अहंकार को मिटा सकें
हमारे विकारों को घटा सके
हमारे अंदर राष्ट्रभक्ति जगा सके
तभी अंधकार से मुक्ति मिल पाएगी
परमात्म ज्ञान की ज्योति जल पाएगी।

कर्मशीलता आगे बढाती

कर्मशीलता आगे बढाती
उन्नति पथ पर हमें ले जाती
मन मे नया विश्वास जगाती
जीने की नई राह दिखाती
आओ कर्म को अधिमान दे
कर्म ही पूजा है, यह जान ले
कर्म से ही विकास जन्मेगा
सम्रद्धि का एहसास जन्मेगा
सुख- शांति पैदा हो जाएगी
खुशियों की बेला छा जायेगी
बस, ईश्वर में आस्था रहे
ईश्वरीय याद में सद्कर्म होते रहे।

अनूठा है यह संसार

अनूठा है यह संसार
अनूठे है इसके रंग
जीवन के रंग मंच पर
करते सब रंग कर्म
जिसका जो किरदार है
निभाना उसका धर्म
निर्देशक सिर्फ एक है
कहते उसको हम रब
इस दुनिया के नाटक में
हंसता कोई है, कोई रोता है
भूमिका भी एक नही
रहती सबकी अलग अलग
कोई घुलमिल जाता यहां
कोई रहता अलग अलग
जिसने जान लिया रब को
उसका रंगकर्म सफल है
जीवन भी सार्थक रहता
परलोक तक सुधर जाता।

आईना दिखाता सूरत अपनी

आईना दिखाता सूरत अपनी
आत्मबोध का कराये एहसास
अंदर बाहर जो एक समान
वही मानव कहलाये महान
कथनी करनी में फर्क न हो
हो जिसका चरित्र उत्थान
विकारों से जो मुक्त रह सके
पवित्रता को जो अपना सके
बन जाता वह देवता समान
देश सेवा धर्म है जिसका
जनसेवा कर्म है जिनका
वही कहलाता सच्चा इंसान
दुनिया करती उसका सम्मान।

गणेश शंकर विद्यार्थी

हिन्दी की पत्रकारिता ने
छुए नित नए आयाम
गणेश शंकर विद्यार्थी है
इसमे सबसे ऊंचा नाम
मिशनरी पत्रकारिता के
वे ही असली जनक थे
देश की आजादी के
वे ही तो महानायक थे
लेकिन घटते मूल्यों से
पत्रकारिता हुई आहत
पीत पत्रकारिता आज
है सबसे बड़ा अभिशाप
मीडिया मे खबरों के
दाम अब लगने लगे
सच्ची खबरों के किस्से
दफन अब होने लगे
हिन्दी पत्रकारिता जब
आईना बन जायेगी
झूठ दम तोड़ देगा तब
सच्चाई ही नजर आएगी।

परिवार एकता जहां देखता

परिवार एकता जहां देखता
स्वर्ग वही पर लगता है
सबके चेहरे खिले खिले से
सुंदर उपवन वह लगता है
याद बड़ो को जो नित्य करते
आशीष उन्हें ही मिलता है
हर बाधा उनकी दूर हो जाती
खुशियो का गुलदस्ता लगता है
जिसे देश की चिंता रहती
देशभक्त वही तो होता है
देश रक्षा में प्राण गंवा दे जो
भारत माँ का वही तो बेटा है
सोये क्यो हो , उठो आगे बढ़ो
एकता सूत्र की ताकत बनो
अपने भारत को खुशहाल बना लो।

शांत मन से कीजिए

शांत मन से कीजिए
अपने प्रभु को याद
मन में प्रसन्नता रहे
पूरे हो सारे काज्
जो हुआ अच्छा हुआ
जो हो रहा है अच्छा है
जो होगा अच्छा होगा
यही सोचकर करो सन्तोष
मन में न हो कोई अफसोस
दृष्टा बनकर रहना सीखो
खेल विधाता का स्वीकारना सीखो
समस्या सारी दूर हो जायेगी
सफलता कदमो में आ जायेगी
यही है जीवन का सार
प्रभु ही है सबके खेवनहार।

क्या लिखूं क्या न लिखूं

क्या लिखूं क्या न लिखूं
लिखा कुछ जाता नही
आज के बदतर हालात पर
कहा कुछ जाता नही
रिश्ते नाते सगे सम्बन्ध
सिर्फ दिखावे को रह गए
खोजने चलो उनमे अपनत्व
कुछ भी हाथ आता नही
राजनीति ने ले लिया अब
सच से ही पूरा सन्यास
जिस राजा पर किया भरोसा
वही बता रहा दिन को रात
राम भी यहां राजनीति का
शिकार होकर गए है
उनके नाम पर सत्ता पाकर
नेता मालामाल हो गए है
काश!हमने भगवान राम को
आत्मसात किया होता
बदनुमा राजनीति का
माहौल फिर यह न होता।

भारतीय संस्कृति

भारतीय संस्कृति गजब है
गजब है इसके त्यौहार
एक दूसरे के सम्मान का
प्रतीक बन गये ये त्यौहार
करवाचौथ हो या फिर अहोई
बायना अपनो को ही मिलता
सास-ससुर हो या बहनोई
श्रद्धाभाव, सम्मान भी मिलता
छोटो -बड़ो में प्यार भी बढ़ता
भाई -बहन के रिश्तों में भी
ये त्यौहार बढाते मिठास
परिजन सारे एकत्र होकर
करते आपस में हास परिहास
एकाकी जीवन की नीरसता
समाप्त ऐसे ही हो सकती है
भूले बिसरो को गले लगा लो
कुटुम्भ फिर से सज सकता है।

जीते जी जो सेवा करते

जीते जी जो सेवा करते
माता पिता का
ध्यान जो रखते
उनकी हाँ में हाँ मिलाते
बड़े होने पर भी
आंख न मिलाते
अच्छी होती वह संतान
मरने के बाद भी
जो स्मरण करते
उस संतान की अनूठी शान
माता पिता के
जो पथानुगामी बनते
यशस्वी होती ऐसी सन्तान
माता पिता को
जो यश दिलाती
वही सन्तान कहलाती महान।

अंग्रेजी का अब झंझट छोड़ो

अंग्रेजी का अब झंझट छोड़ो
खुलकर हिंदी की जय बोलो
कब तक हिंदी गुलाम रहेगी
सत्ताधीशों कुछ तो बोलो
हिंदी होना कब शान बनेगी
भारत की पहचान बनेगी
संसद में अब सिर्फ हिंदी बोलो
या फिर मातृभाषा में बोलो
विदेशी भाषा का मोह छोड़ो
हिंदी से गहरा नाता जोड़ो
राष्ट्रभाषा बने अब हिंदी
स्वाभिमान की भाषा हिंदी।

लक्ष्मी स्वरूपा युगल बने

लक्ष्मी स्वरूपा युगल बने
नारायण स्वरूप स्वयं बनिए
समर्पण भाव युगल में हो
संरक्षक स्वरुप स्वयं बनिए
निष्काम सेवा युगल करे
दायित्व बोध खुद समझिए
सीता सा फ़र्ज निभाये युगल
राम के जैसा खुद बनिए
राधा सा प्रेम करती युगल
कृष्ण समान खुद बनिए
चांद सी शीतलता युगल में हो
स्वयं भी शांत स्वरूप बनिये
कमिया न ढूंढे युगल की
स्वयं कमियां मुक्त बनिये
युगल के सद्गुणों की खान हो
स्वयं सद्गुणों के सागर बनिये।

पन्ना

हीरो की खान है पन्ना
प्राणनाथजी शान है पन्ना
छत्रसाल की राजधानी का
स्वर्णिम इतिहास है पन्ना
श्रीपांच पद्मावती का
एक अनूठा धाम है पन्ना
केन-किलकिला बहती यहां
पांडव प्रपात का स्थान पन्ना
शरद पूर्णिमा की चांदनी में
प्राणनाथ मंदिर महारास पन्ना।

राम हिंसक नही हो सकते

राम हिंसक नही हो सकते
यह बताती है जैन रामायण
राम ने रावण को नही मारा
यह दर्शाती है जैन रामायण
राम विकारो के नाशक है
मर्यादा पाठ पढाती रामायण
सीता,उर्मिला की त्याग तपस्या
कैकई स्वार्थ दिखाती रामायण
मंथरा जैसी नारी पशुता का
वर्णन करती तुलसी रामायण
नारी शक्ति का द्वापर युग की
रहस्य खोलती शोध रामायण।

शरद ऋतु के आगमन का

शरद ऋतु के आगमन का
आओ मिलकर स्वागत करे
मौसम में ठंडक आ रही है
दीप जलाकर अभिनन्दन करे
दीपोत्सव मनाने से पहले
घर की सफाई जरूरी है
घर की सफाई से भी पहले
आत्मा की सफाई जरूरी है
ईश्वरीय याद से रहने से
आत्मा की सफाई हो जायेगी
विकारों का कचरा दूर होगा
आत्मा निर्मल बन जाएगी
नर से नारायण बनने का
यही एक मात्र सन्मार्ग है
सच्ची दिवाली मनाने का
यही एक मात्र श्रेष्ठ मार्ग है।

माँ जिसको हम मानते है

माँ जिसको हम मानते है
उस गंगा का ध्यान करो
पतित पावनी कहलाती जो
उसका गंगा का ख्याल करो
अपने पुरखो की अस्थिया
प्रवाहित करते हम जहां
उसको निर्मल ,स्वच्छ बनाने का
मिलकर प्रबल प्रयास करो
गंगा मे व्याप्त गन्दगी
कब तलक दूर हो जाएगी
इस सवाल का जवाब पाने को
फिर से सजग प्रयास करो
पहल अपने से हो यह करो जतन
गंगा मे कचरा न डालने का
संकल्प सब बारम्बार करो
प्रदूषित गंगा मे नहाने से अच्छा
ज्ञान गंगा मे गोते लगा लो
अपने परमात्म का ध्यान कर
अपने जीवन को सफल बना लो।

गंगा

पूछ रही है आज मां गंगा
कब तक मुझे सताओगे
मेरे प्रवाह में बाधक बने हो
हर की पैड़ी जल कब लाओगे
सफाई के नाम पर जल बंद है
सफाई कभी होती नही है
मुझमे जो कचरा भरा है
उसको कब हटवाओगे
मेरी सफाई के नाम पर
करोड़ो रुपये डकार लिए है
मेरी हालत बद से बदतर है
उसे कब सुधरवाओगे
पीने लायक नही है गंगाजल
स्नान करने में भी खतरा है
जैसी भागीरथ लाये मुझको
वैसी कब बनवाओगे
राजनीति तो बहुत हो गई
मुझको साफ करने की
मेरी पवित्रता बहाल हो
ऐसा कब कर पाओगे
मेरी बदहाली देखकर
शिव परमात्मा खुश नही है
परमात्मा की खुशी के लिए
शुद्ध गंगा कब कर पाओगें।

कर्मशीलता जीवन की

कर्मशीलता जीवन की
मंजिल बना देती आसान
जो भी लक्ष्य साध लिया
पूरा कर देते उसे भगवान
नेक नियति से जो भी चला
पाया उसने जगत मे मान
तिनका तिनका संघर्ष से
कर्मयोग बनता प्रधान
भाग्य तक वह बदल देता
पूरे कर देता अधूरे अरमान
आओ आहुति देदे हम
अपने कर्म यज्ञ के कुण्ड मे
जीवन कर्मशील हो जायेगा
अरमान पूरे होंगे जीवन में।

ओम शांति अभिवादन से

ओम शांति अभिवादन से
करिए दिन की शुरुआत
यह मन्त्र है बहुत अदभूत
करें आत्म स्वरूप की बात
शांत रहना स्वभाव आत्मा का
फिर क्यो मन होता अशांत
शांत स्वभाव में रहे आत्मा
परमात्मा से हो मिलन की बात
व्यर्थ के चिंतन से दूरी भली
सद्चिन्तन से जगत की भली
तनाव दूर हो जायेगा मन से
खुशिया छा जायेगी कसम से।

मौसम करवटे ले रहा है

मौसम करवटे ले रहा है
रहना होगा अब सावधान
शीत ऋतु का आगमन है
रखिए अपनी सेहत का ध्यान
बदलते मौसम में स्वच्छता का
ध्यान रखना बेहद जरूरी
त्यौहारों का मौसम आ गया
घर की साफ सफाई जरूरी है
पानी एकत्र कही होने न पाए
मच्छरों से बचना जरूरी है
नारियल तेल घुटनों से नीचे लगाए
डेंगू से अपनी जान बचाए।

परमात्म याद में जो रहा

परमात्म याद में जो रहा
मिला उसे ईश्वरीय वरदान
स्वयं को जिसने आत्मा समझा
हो गया उसका रोग निदान
अनूठा उदाहरण है दुनिया में
शतायु में स्थिर रहा दिमाग
चिकित्सक चकित रह गए थे
देख राजयोग का परिणाम
104 साल तक रही जानकी
गिंनिज बुक में छाई रही
ज्ञान बांटती रही जीवन पर्यंत
शांतिदूत का खिताब लाई थी
नारी शक्ति की अग्रदूत बनी
युगपरिवर्तन सन्देश लाई थी।

सदा सुहागन रहू मैं

सदा सुहागन रहू मैं
हर पत्नी की यह आस
सुहाग उसका बना रहे
आएं कितने ही झंझावात
विश्वास का यह रिश्ता है
चले पल प्रति पल साथ
समर्पण भाव रहे सदा
अपने जीवनसाथी साथ
न कोई छोटा, न कोई बड़ा
है जीवन गाड़ी के दो पहिए
खुशियों भरा हो यह जीवन
घर में हो मन्दिर सा वास
परमात्मा याद में रहे सदा
पवित्रता रहे स्वयं के पास।

किस रावण को ढूंढ रहे हो

किस रावण को ढूंढ रहे हो
रावण तो अपने अंदर है
रावण जैसा जो न हो
बस, राम उसी के अंदर है
काम,क्रोध,मोह,लोभ
अहंकार, जिनसे छुटा नही
उन्ही के अंदर रावण है
यह सत्य किसी से छिपा नही
रावण को अगर भगाना है
अपनी बुराइयों को भगाओ पहले
रावण के पुतले को जलाने से पहले
खुद को राम बनाओ पहले।

सदा सकारात्मक सोचिए

सदा सकारात्मक सोचिए
सकारात्मकता है वरदान
इससे बढ़ती मिठास बहुत
बढ़ता समाज में सम्मान
सकारात्मकता खुशियां लाती
मंजिल को पास ले आती
नहीं तनिक भी हानि इसमें
यह तो है सदगुणों की खान
सकारात्मक सोच का संकल्प
बन जाएगा ठोस प्रकल्प
यही सुख का आधार बनेगा
परमात्म प्यार का सार बनेगा।

राजा

पहले राजा भेष बदलकर
जनता के बीच जाते थे
किसको क्या है कठिनाई
समाधान करके आते थे
अब राजा जनता से ही
सुरक्षात्मक दूरी बनाता है
जनता के बीच आने के लिए
सड़के खाली कराता है
आमजन तो दूर की बात
खास भी नही मिल पाते है
जिसने जैसा पढ़ा दिया
वैसा ही गाकर चले जाते है।

यह संसार

यह संसार मिथ्या है
इसे समझ को खूब
कही दुख की छाया है
कही खुशियों की धूप
दुख सुख कभी टिकते नहीं
एक साथ कभी चलते नहीं
समान भाव से
जिये जो इनको
उससे बलवान
कोई होता नहीं
यह तो है परमात्म लीला
वश ,इसपर
किसी का चलता नहीं।

ब्रह्माकुमारीज में

ब्रह्माकुमारीज में राष्ट्रपति पधारी
महिमा है शिव बाबा की न्यारी
युग परिवर्तन का आगाज़ यही है
स्वस्थ-स्वच्छता का पैगाम यही है
आध्यात्मिकता को अपनायेंगे हम
जीवन को सफल बनाएंगे हम
ईश्वरीय वाणी भी सार्थक हुई है
द्रौपदी मुर्मू महामहिम हुई है
ब्रह्माकुमारीज का मान बढ़ा है
नारी शक्ति का सम्मान बढ़ा है
आबू में आई दुनिया की हस्ती
ओम शांति है रूहानियत मस्ती।

ईश्वरीय ज्ञान

दुनिया मे सबसे ऊंचा
ईश्वरीय ज्ञान है भाई
वैश्विक शिखर सम्मेलन में
यही आगाज़ होगा भाई
140 देशो से शांतिदूत आ रहे
ब्रह्माकुमारीज का हाथ बटाने
परमात्मा के प्यारे आ रहे
शांति,एकता,सम्रद्धि से
धरा पर आध्यात्म को लायेंगे
बुराइयों को दूर भगाकर
अच्छाई सब तरफ फैलाएंगे
101 वर्षीया रतनमोहिनी देख
यकीन सभी को हो गया
राजयोग में शक्ति बड़ी है
परिवर्तन समझो अब हो गया।

श्राद्ध पक्ष

श्राद्ध पक्ष पूर्वजों के प्रति
नमन का है पुनीत रहा
जीवित बड़ो के रहते हुए
उन्हें भूलने की गलती करते रहे
जीते जी सेवा बडो की
खुश होकर करते जो परिजन
वे सदा सुख ही भोगते
तनाव मुक्त रहते उनके मन
दिवंगत होने के बाद भी
पितृ लोक से वे देते आशीष
पर जिसने उनको कष्ट दिया
उसे नहीं मिलती बख्शीस
माता पिता देवता है घर के
सेवा करो उनकी मन लगा के
जीवन उनका सफल हो जाएगा
श्राद्ध खाने न कोई आएगा।

मैं कौन , मेरा कौन

मैं कौन ,मेरा कौन
सीखा रही है ब्रह्माकुमारीज
मैं आत्मा,मेरा परमात्मा
बता रही है ब्रह्माकुमारीज
रतनमोहिनी दादी की
जिंदगी का राज क्या?
परमात्मा की याद में रहना
बता रही है ब्रह्माकुमारीज
विश्वव्यापी ब्रह्माकुमारीज की
सोच है विश्व में शांति
राजयोग से बदलता है जीवन
बता रही है ब्रह्माकुमारीज।

विश्व शांति का आव्हान

वैश्विक शिखर सम्मेलन हो रहा
विश्व शांति का आव्हान हो रहा
एक सौ चालीस देशों की हस्तियां
ब्रह्माकुमारीज में पधार रही है
स्वस्थ व सुखी समाज के लिए
आगाज़ ब्रह्माकुमारीज कर रही
न्यायपालिका,कार्यपालिका
विधायिका से भी आ रहे लोग
चौथे स्तम्भ मीडिया से भी
भागीदार बन रहे है लोग
ईश्वरीय ज्ञान का डंका इससे
पूरी दुनिया में बज जाएगा
विकार मुक्ति अभियान चलाकर
सारा जनमानस जग जाएगा
कलियुग से सतयुग लाने में
ब्रह्माकुमारी आधार बनेगी
स्वस्थ व सुखी दुनिया का
ब्रह्माकुमारीज आधार बनेगी।

सूर्योदय होकर रहेगा

शांति,एकता,सम्रद्धि का
सूर्योदय होकर रहेगा
अध्यात्म क्रांति के जरिए
स्वर्णिम भारत बनकर रहेगा
देश दुनिया के लोगो का
चरित्र निर्माण जरूरी है
ब्रह्माकुमारीज का राजयोग
जन जन तक पहुंचना जरूरी है
खुद राष्ट्रपति ने मुक्तकंठ से
ब्रह्माकुमारीज की तारीफ की
इससे अच्छी कोई संस्था नही
इस बात की ताकीद की।

आबू

परमात्मा की रूह बसी है
इस आबू की धरती में
अध्यात्म की खुशबू आती
इस आबू की धरती में
आत्मा का परमात्मा से
मिलन की यही धरा है
राजयोग की पाठशाला है
इस आबू की धरती में
जो भी आता बार बार आता
विकारों से मुक्त हो जाता
रूहानियत का नशा हो जाता
इस आबू की धरती में
इंसान से देवता बन जाता
इस आबू की धरती में
ब्रह्माकुमारीज को आत्मसात करें
नये युग की शुरुआत करें।

चाटकर पानी पीता जो

चाटकर पानी पीता जो
वही केवल है मांसाहारी
जो घुट भरकर पानी पिये
होता है वह शाकाहारी
मानव जन्म जिसने लिया
घुट भरकर पानी पिया
यही है प्राकृतिक सार
मानव अपनाये शाकाहार
आहार भी ऐसा अपनाये
कोई भी जीव मरने न पाये
जब आचरण में होगी अहिंसा
जीवन मे भी न होगी हिंसा।

‘अ’ से अक्षर

‘अ’ से अक्षर ज्ञान कराते
अंधकार से प्रकाश में लाते
‘क’ से कायदा शुरू होता
करुणा का पाठ पढाता
दया,ममता इसी से उपजे
प्रेम भाव के अंकुर पनपे
‘क’ से ही कर्म भी बनता
कर्म बिना न जीवन चलता
हिंदी वर्णमाला बहुत निराली
‘अ’ से ‘ज्ञ ‘में सिमट गई सारी
अंधेरे से उजाले की यात्रा कराती
साधक को हिंदी, विद्वान बनाती।

ब्रह्माकुमारी

एकता,शांति,अध्यात्म का
पाठ पढ़ाती ब्रह्माकुमारी
ज्ञान, योग,सेवा,धारणा का
अभ्यास कराती ब्रह्माकुमारी
नई शिक्षा से नये भारत का
निर्माण करती ब्रह्माकुमारी
मूल्यपरक शिक्षा पाठ्यक्रम
सबको पढाती ब्रह्माकुमारी
दादी रतनमोहिनी की अगुवाई में
संकल्प सदभाव का ले रहे हम
जो विकार फैले है जहान में
उन्हें दूर कराकर ही लेंगे दम।

श्राद्ध पक्ष की सप्तमी

श्राद्ध पक्ष की सप्तमी में जन्मा
नारसन कला जन्मभूमि है
माता-पिता के सुसंस्कारों से
सदगुणों की गठरी भारी है
तब से समय चक्र चल रहा है
मुठ्ठी में से रेत की मानिद
समय निरन्तर फिसल रहा है
एक बार जो समय चला गया
वह लौटकर कभी आया नही
ठीक हमारे जीवन की तरह
सार यही है कुछ अच्छा हो जाए
मुझसे जगत का भला हो जाए
जीवन की गाड़ी सरकती जाए
विकारो के गड्ढे से बचती जाए
आध्यात्म इसके लिए रामबाण है
जीवन में यही तो सन्मार्ग है
परमात्मा सांसोसवास याद रहे
सुख,शांति,सम्रद्धि का वास रहे।

मन, वचन, कर्म से सदा

मन, वचन, कर्म से सदा
जो रहते है एक समान
कथनी करनी में फर्क न करे
बन जाते है वही महान
झूठ का पर्दा कभी न ढके
सत्य को ही अपना मान
जो सत्य पथ पर चलते है
होता उन्ही का सदा गुणगान
कठिन जरूर , पर असंभव नही
कष्ट बहुत , पर विफलता नही
जो सत्यानुगामी बनकर जीते
हर्षित सदा उन्ही के मन होते
परमात्मा की कृपा बरसती
इंसान रूप में देवता बन जाते।

 

अपने व्यस्त जीवन से

अपने व्यस्त जीवन से
कुछ तो समय निकालो
जिस ईश्वर ने जन्म दिया
उनमे ध्यान लगा लो
ईश्वर है सबका पालक
यह ध्यान रखना जरूरी है
अहंकार कभी न आये
इसका ख्याल जरूरी है
व्यर्थ के चिंतन से भी
मुक्ति जब मिल जायेगी
जीवन की सारी खुशिया
फिर तुम्हे मिल जायेगी
मेरी मानो स्वयं को
फूल सरीखा बना लो
व्यवहार मे कोमलता हो
खुशबू सद्गुणो की फैला लो।

अपने जीवन का भार

अपने जीवन का भार
खुद ही उठाया जाता है
दुसरो के कंधों पर तो
शव ही ढोया जाता है
जो जीते है खुद के लिए
परमात्म याद के साथ
उन्ही का गुणगान
समाज में किया जाता है
जो बनाते है प्रभु को
अपने दुख सुख का साथी
उनकी उन्नति में
स्वयं प्रभु हाथ लगाता है।

चमकता सितारा चला गया

चमकता सितारा चला गया
हंसता हुआ चेहरा चला गया
महासचिव ब्रह्माकुमारीज के
राजयोगी प्यारा चला गया
सदा परमात्म याद में रहते थे
सबको दुआएं ही देते थे
जिसको मिलते अपना बनाते
रोजयोग की विधि बतलाते
उपराम रहे भाई निर्वेर सदा
बहनों की सेवा खूब करते थे
सद्गुणों की महासागर कहलाये
सेवा-धारणा में भी अव्वल आये।

माउंट आबू

माउंट आबू की धरा निराली
स्वर्ग सी लगती बस्ती सारी
सबके चेहरे खिले खिले से
मीठी मुस्कान छाई हो जैसे
जो भी बोले मीठा ही बोले
जो बोले पहले उसे तोले
कर्मशील बन सेवा सब करते
ईश्वरीय यज्ञ मे लगते फरिश्ते
सच मे है यह घर ईश्वर का
पवित्रता,शांति और खुशियो का
जो भी आता अपना हो जाता
हर कोई भाई -बहन नज़र आता।

अदभुत वरदान

परमात्मा ने मनुष्य को
दिया अदभुत वरदान
संवाद माध्यम वाणी
स्वयं में गुणों की खान
बोलना तो आ जाता है
मात्र तीन ही बरस में
पर क्या बोलना चाहिए
सीखते बरसो बरस में
वाणी ही आईना बनती
हम सबके व्यक्तित्व का
अपने को पराया करती
पराये को अपना बनाती
जैसी हमारी वाणी होती
वैसी हमारी जिंदगानी होती।

कर्म

कर्म सभी से बड़ा है
इसी से होता निर्माण
सदकर्म करते है जो
होता उनका यशगान
निर्माण के ही देव है
विश्वकर्मा भगवान
सृष्टि रचने में रहता
उनका कर्म प्रधान
कर्मयोग अपनाते जो
उनकी मंजिल आसान
मेहनत का फल मीठा
परमात्मा देते वरदान।

उदास कभी रहो नही

उदास कभी रहो नही
गम मे कभी डुबो नही
दुःख को पास रखो नही
ये सब दुश्मन है हमारे
सुख चैन छीन लेते ये सारे
गम से पार पाना नही आसान
ये है अशांति का सामान
अगर जीना है सुख चैन से
छुटकारा पाओ मन बेचैन से
निर्लेप भाव से रहना सीखो
शांत भाव से जीना सीखो
दृष्टापन जब आ जायेगा
जीवन सुखमय हो जायेगा।

हर्षित मन होने से

हर्षित मन होने से
खुशी मिलती अपार
मन में रहती शांति
सफलता मिलती हजार
मन मे जब हो शांति
तन जब स्वस्थ रहे
रोग न कोई होने पाये
लम्बा जीवन सब जिए
तन मन दोनो साथ दे
सद्कर्म करे भरपूर
परमार्थ का लक्ष्य रहे
दुख हो जाता दूर
याद परमात्मा की रहे
सदगति मिल जाएगी
कलियुग से बेदखल होंगे
सतयुग में पदार्पण करेंगे।

विदेशो में हिंदी

विदेशो में हिंदी गूंज रही
भारत मे अस्तित्व ढूंढ रही
संसद तक मे विरोध रहा
देश मे यह क्या हो रहा
हिंदी पर कानून बनाओ
राष्ट्रभाषा हिन्दी अपनाओ
ग्यारहवीं सदी में जन्मी हिंदी
सिंधु किनारे पनपी हिंदी
करोड़ो लोगो की मातृ भाषा है
करोड़ो के दिलो की अभिलाषा है
जन्म की भाषा कहलाती है
हिंदी बहुतायत को भाती है।

बावन अक्षरों की है हिन्दी

बावन अक्षरों की है हिन्दी
स्वर -व्यंजन की है हिन्दी
जन्म की भाषा है हिन्दी
नवजात रुदन भी है हिन्दी
भारत की पहचान है हिन्दी
भारतीय संस्कार है हिन्दी
परमात्म भाषा है हिन्दी
देवताओ की भाषा है हिन्दी
ह्रदय की भाषा भी हिन्दी
मौन की भाषा भी हिन्दी
फेसबुक मे भी अब हिन्दी
व्हाट्स एप मे भी अब हिन्दी
टियूटर में भी आ गई हिन्दी
दुनियाभर में छा गई हिन्दी
हिन्दी का हम गुणगान करें
सबके भले की बात करें।

एक जगह खड़ा रहकर भी

एक जगह खड़ा रहकर भी
करता सदा परोपकार
मिटटी कटाव को रोकता
छांव और फल का दे उपहार
अभिमान मुक्त रहता सदा
देता आक्सीजन का भण्डार
जितना ज्यादा लदे फलो से
उतना ही वह झुक जाता है
पेड़ पौधों के इन गुणो को
इंसान नही समझ पाता है
पेड़ पौधे है जीवन के रक्षक
न बने हम उनके भक्षक
आओ जीवन को सुगम बनाये
हर रोज एक पेड़ लगायें
प्रकृति तुम्हारा वन्दन करेगी
परमात्मा से भी सौगात मिलेगी।

लोकतन्त्र मे

लोकतन्त्र मे अभिव्यक्ति का
है सबको संवैधानिक अधिकार
बन्द,आंदोलन,अनशन,धरना
है प्रबल जन सरोकार
शोषण,अपराध,महंगाई रोकने में
सरकार जब हो जाए नाकाम
तब जनता आवाज उठाती
हल करने को जन समाधान
संविधान सम्मत यह अधिकार
सम्भलकर इसे अपनाना होगा
शांति,अहिंसा,राष्ट्र सम्पत्ति का
ध्यान हमे ही रखना होगा
ध्यानाकर्षण करने को जनमुद्दे
लोकतांत्रिक परम्परा जरूरी है
सरकार के कानो तक बात पहुंचे
केवल इतना प्रदर्शन जरूरी है।

दीपक जैसा बनना सीखो

दीपक जैसा बनना सीखो
खुद जलकर हंसना सीखो
अंधकार कही रह न जाएं
ऐसा प्रकाश फैलाना सीखो
अहंकार तनिक न आने पाएं
इतना विन्रम हो जाना सीखो
केवल प्रेम बांटना तुम जगत में
नफरत को दूर भगाना सीखो
जो करता है ईश्वर करता है
यह अटूट विश्वास करना सीखो
काल भी नतमस्तक हो जायेगा
ईश्वर को अपना बनाना सीखो।

जो चाहे ब्राह्मण बने

जो चाहे ब्राह्मण बने
है बहुत ही आसान
पवित्र तन और मन बना लो
विकारो का हो अवसान
अमृत बेला उठा करो
करो परमात्मा का ध्यान
परमात्म याद मे बने भोजन
सात्विक भोजन ही वरदान
व्यर्थ संकल्प मन मे न रहे
सद संकल्पों का मिले ज्ञान
वाणी मे मिठास भरी रहे
हिंसा का न हो नामोनिशान
जिनमे ये सब गुण आ जाये
वही ब्राह्मण होगा महान।

सदा सत्य

सदा सत्य के पथ चलो
असत्य को दूर करते चलो
सत्य ही विजय दिलवाएगा
भाग्य सबका बनाएगा
सत्य है ईश्वर की वाणी
सत्य से परे खत्म कहानी
सत्य को आंच आती नही
अशांति से मन में शांति नही
सत्य तनाव को भगाता है
चेहरे पर आनन्द लाता है
सत्य की अब तो अलख जगा लो
जीवन में अपार खुशियाँ पा लो।

आत्मा पर कोई मैल

आत्मा पर कोई मैल
जमने न दीजिए
मन मे बुरे विचार
आने न दीजिए
सोचिए हमेशा अच्छा
हम है प्रभु की सन्तान
प्रभु के कुछ गुण
धारण तो कीजिए
जब उठो सवेरे
लो प्रभु का नाम
अमृत बेला में
अमृत बरसता
परमात्मा से सीधा होता
आत्मिक संवाद
इसी से आत्मा
कंचन बन जाती है
जो भी बुराई है
वह दूर हो जाती है।

अबोध से जो बोध बनाएं

अबोध से जो बोध बनाएं
गुरु वही कहलाता है
जो जीवन में सन्मार्ग दिखाए
सम्मान वही तो पाता है
गुरु का रिश्ता पवित्र कहलाता
गरिमा इसकी घटने न पाये
शिष्य की उन्नति भाती गुरु को
सुखद अनुभूति होती गुरु को
परमात्म ज्ञान जो देता है
सच्चा गुरु वही होता है
परमात्मा का ध्यान करें
अपने गुरु को प्रणाम करें।

सुख दुख

सुख दुख जो भी आते
है सब जीवन का खेल
सुख जब हंसकर बिताया
दुख को भी हंसकर झेल
सुख दुख है जीवन के गहने
साथ हमेशा रहते है
जीवन मे बारी बारी आते
टिककर कभी न रहते है
अगर दिल मे हो परमात्म याद
दुख का आभास होने न पाये
कर्मानुसार दुख आए भी तो
क्षण भर में वह दूर हो जाएं
और जब आएं सुख की बारी
आकर फिर आता ही जाएं।

हम बच्चे है

हम बच्चे है तो क्या हुआ
परमात्मा भी तो बच्चे है
कान्हा रूप में जन्म हुआ
लड्डू गोपाल बन सजते है
अवतरित हुआ जब से कान्हा
नही किया तब से विश्राम
हर पल सानिदय पाओ
मन से रहो परमधाम
परमात्म ध्यान से सुख मिलेगा
पीड़ा सारी परमात्मा हरेगा
विकर्म कोई भी होने न पाये
अहंकार ज़रा भी मन मे न आए
लल्ला को निमित्त बना लीला करेंगे
विकारी राक्षसो का वध करेंगे
सत्य पथ के सारथी बनेंगे
तब ही मिलेगा गीता ज्ञान
खुद बताएंगे कहां है भगवान
तीनो लोक का कराएंगे ज्ञान।

प्रकृति

प्रकृति हमारा पोषण करती
प्रकृति का दोहन क्यो करते हम
मात्र चन्द रुपयो के लालच में
हरे-भरे पेड़ काट डालते हम
नदियो का सीना चीर डाला
पर्वतों को गंजा कर डाला
फिर कैसे सुगम रहे जीवन
कैसे प्रकृति संतुलन करे हम
कैसे आये जीवन में खुशिया
कैसे बने धरा स्वर्ग समान
प्रकृति ही तो ईश्वर की देन है
फिर क्यो हानि पहुँचाते हम
हम सब है ईश्वर के बन्दे
आओ ईश्वर में ध्यान लगाये हम।

सत्ता में बैठे अपराधी ही

सत्ता में बैठे अपराधी ही
नाक में दम किए हुए है
निर्भया रोज सिसक रही
खाकी असहाय खड़े हुए है
अबलाओं की अस्मत से
क्यो रोज़ खिलवाड़ हो रहा
जिन्हें देवी रूप में पूजते है
उनपर क्यो अन्याय हो रहा
कही बेगुनाह मर रहा है
कही घूसखोरी चरम पर है
निकायों में लोकतंत्र नही
नोकरशाह हावी हो रहे
कब तक जनता चुप बैठे
राजा कुछ तो बतलाओ
या राम भरोसे चलेगा देश
जरा हमको समझाओ।

यातायात सुचारू रहे

यातायात सुचारू रहे
करिए मिलकर प्रयास
मार्ग अवरोधक न बने
संकल्प कर लो आज
नियमों का पालन करे
सुरक्षित गति पर हम चले
दुर्घटना न होने पाए
हैलमेट जरूर अपनाये
सड़क हादसा होने पर
मदद को हाथ बढ़ाये
कानून सख्त हो गया है
दंड प्रावधान बदल गया
अब लापरवाही ठीक नही
कानून तोड़ना ठीक नही
खुद सुखद यात्रा अपनाओ
दूसरे की भी जान बचाओ।

आस्था की नींव पर

आस्था की नींव पर
जो कर रहे अपराध
उनको भगवान भी
कभी न करेंगे माफ़
सन्त चोला पहनकर
करते थे जो मक्कारी
कानूनी शिकंजे में फंसे
बन्दी बन गए सरकारी
स्वयं भगवान कहलाते थे
असली भगवान को भूल गए
देवता तो क्या बनते
इंसानियत भी भूल गए
इसी लिए तो अब
जेल में बंद पड़े हुए है
अपने भी बेगाने हो गए
किया पाप भुगत रहे है
किया होता अगर प्रभु स्मरण
हुआ न होता जीते जी का मरण

सबके लिए मर्यादा

सबके लिए मर्यादा
अपनाना जरूरी है
सबके लिए सदाचार में
बंधना बहुत जरूरी है
जो चाहते है अपने लिए
वही कीजिए दुसरो के लिए
खुद सम्मान पाने से पहले
दुसरो को देना जरूरी है
चाहते हो अगर भला अपना
कीजिए भलाई दुसरो की
खुद का पेट भरने से पहले
दुसरो का भरना जरूरी है।

ईश्वरीय वाणी

ईश्वरीय वाणी सुना करो
फिर उसको गुणा करो
सच्ची राह मिल जायेगी
दिनचर्या बदल जायेगी
अमृत बेला उठने लगोगे
प्रभु ध्यान करने लगोगे
मुख मे भी मीठे बोल होंगे
चरित्र से सिरमौर होंगे
चेहरे पर तुम्हारे नूर होगा
घमण्ड चकनाचूर होगा
ईश्वर सानिदय मिल जायेगा
जीवन सुखमय बन जायेगा।

ब्रह्माकुमारी

शिव बाबा की बेटी बनकर
इस धरा पर आई थी
ब्रह्मा बाबा के सानिदय में
ईश्वरीय ज्ञान वह पाई थी
बाल आयु में ही घर छोडा
वानपरस्ति से नाता जोड़ा
परमात्म को सर्वस्व मानकर
ब्रह्माकुमारी वह बन गई थी
अव्यक्त हुए थे जब ब्रह्मा
शरीर छोड गई फिर मम्मा
कमान उन्होंने ही पाई थी
ब्रह्माकुमारीज का विस्तार हुआ
देश विदेश में प्रचार हुआ
कुमार कुमारियों की चहेती बनी
कुमारका उनका नाम हुआ
विश्व शांति की अग्रदूत कहलाई
चरित्र निर्माण की मशाल जलाई
दिव्यता की प्रतिमूर्ति थी वह
ख्याति जग मे बहुत पाई थी
प्रकाशमणि नाम था उनका
ईश्वरीय सेवा में अव्वल आई थी।

किससे छिपाना

किससे छिपाना, क्या छिपाना
क्यों छिपाना,कैसे छिपाना
इसी उलझन में उलझे है लोग
कोई देख तो नही रहा
किसी ने कुछ देखा तो नही
इसी भय में जी रहे है लोग
क्या सच, छिपा सकते हो
क्या झूठ पचा सकते हो
यह सच से आंख मुंदने जैसा है
स्वयं को स्वयं से धोखा देने जैसा है
लोग न सही, परमात्मा तो देखता है
फिर काहे को सच से मुंह मोड़ता है।

जन्माष्टमी

द्वापर युग से संगम युग तक
जन्म तुम्हारा हम मना रहे
जन्माष्टमी के पावन पर्व पर
श्रीकृष्ण तुम्हे हम बुला रहे
नटखटपन में खोए रहते हो
तुम न जाने कहां रहते हो
राधा,रुक्मणि,मीरा खोजती
नज़र फिर भी नही आते हो
चले आओ अब कृष्ण कन्हैया
जन्म तुम्हारा मना रहे हम भैया
गोपियों भी राह तक रही है
कौन चराये अब तुम्हारी गैया
देवकी,यशोदा सब पुकार रही
चले आओ अब कान्हा भैया।

एक फरिश्ता

एक फरिश्ता आया था जग में
रूहानी प्रकाश फैलाया जग में
प्रकाशमणि नाम था उनका
विश्व में शांति काम था उनका
विश्व बंधुत्व की अलख जगाई
प्रभु सन्तान सब बहन और भाई
ब्रह्माकुमारीज को आगे बढाया
शिव परमात्मा का बोध कराया
विकारो से मुक्ति का पैगाम दिया
पवित्र जीवन का सन्मार्ग दिया
शक्ति स्वरूपा प्रकाशमणि थी
सुख,स्मृद्धि का आधार बनी थी।

कभी अपने लिए भी

कभी अपने लिए भी
समय संभाल कर रख
कभी स्वयं से स्वयं का
संवाद तो करके रख
किस लिए आया यहां
आखिर में जाना कहां
कौन है नियंता हमारा
तहकीकात करके रख,
हवा,पानी,भोजन मिला
तुझे ही नही सबको मिला
कौन है यह सब देने वाला
उसे खोजकर तो रख
उससे दिल लगाकर रख
उसे अपना बनाकर रख।

जिसने दिया है जीवन

जिसने दिया है जीवन
उसका एहसान मानिये
उसको याद करने का
कुछ समय निकालिए
रखता है सबकी खैर
वह बिना भेदभाव के
उसकी शान मे कभी
कुछ कसीदे गढ़िए
वह रहम दिल है बहुत
हम बच्चों की खातिर
हम क्यों हिंसक हो गए
जरा यह तो बताइये
अगर खुश करना है
अपने परवरदिगार को
उसकी कायनात को
कुछ तो संभालिये।

लग्न अगर हो मन में

लग्न अगर हो मन में
सफल हो जाते काज
लग्न से जो आगे बढ़ते
बन जाते सरताज
लग्न बड़ी है भाग्य से
इसे समझ लो अच्छे से
लग्न मंजिल तक पहुंचाती
भाग्य बदल कर दिखलाती
लग्न के धनी सफलता पाते
सफलता को पैरो मे ले आते
परमात्मा को ऐसे बच्चे भाते
सफलता दर सफलता वे ही पाते।

अवगुण देखकर

अपने अवगुण देखकर
तौबा करलो आज
अवगुण के अवसान से
स्वयं पर करोगे नाज़
अवगुण की विदाई से
गुणों का आता राज
जो गुणों में अव्वल हो
सिर पर सजता ताज
गुणवान बनने पर
जीवन में होता परिवर्तन
मनुष्य से देवता बनने का
एक मन्त्र है स्वपरिवर्तन।

जाना है हर किसी को

जाना है हर किसी को
इस जहान् को छोड़ के
कुछ नही हाथ आएगा
इस सच्चाई को भूल के
जब तक सांस जारी है
तभी तक जीवन है भाई
अगर सांस रुक गई तो
देह भी मिटटी हो जाई
जब जाना ही है जहान से
कुछ अच्छे काम कर चलो
जो बुराइयां भरी पड़ी है
उन्हें जड़ से खत्म कर चलो
जीवन परमात्मा की देन है
परमात्मा के नाम कर चलो।

स्वार्थ त्यागकर देखिए

स्वार्थ त्यागकर देखिए
मिल जाएगा सम्मान
जो भी आप चाहते है
हो जाएगा वह काम
जो निस्वार्थ जीते जीवन
प्यार सभी का पाते है
मन के अंदर सन्तोष रहे
स्वस्थ सदा वे रहते है
जिसने अदभुत जीवन दिया
आभार उसका जताओ तुम
सिर्फ प्रभु को याद करके
जीवन धन्य बनाओ तुम।

जीवन को सरल बनाओ

जीवन को सरल बनाओ जी
जीवन में न इतराओ जी
अंहकार होने न पाये
परोपकार को गले लगाओ जी
संकट में मदद करो सबकी
समय पर सबके काम आओ जी
शिष्टाचार कभी भूलो नही
असंसदीय भाषा अपनाओ नही
मीठा ,धीमे ,सच्चा, बोलो
वाचाल अवगुण अपनाओ नही
शांत भाव से रहना सीखो
व्याकुलता को दूर भगाओ जी।

मान शान से

मान शान से जीना सीखो
सबको अपना बनाना सीखो
जिस मिटटी में पले बढ़े हो
उसका फर्ज निभाना सीखो
अपनी जान देकर वतन पर
वतन का कर्ज निभाना सीखो
जब आती बारी नेता चुनने की
आँख खोलकर बटन दबाना सीखो
पाश्चात्य संस्कृति में भटक गए युवा
उनको सुसंस्कृति में लाना सीखो
पहल स्वयं से ही करना होगा
देश पर मरना और जीना होगा।

सर्वगुण सम्पन्न

सर्वगुण सम्पन्न जो हो जाए
बन जाएंगे कृष्ण समान
सतयुग के अधिकारी बनेगे
कहलाये देव भगवान
कारागार में जन्म लेकर भी
बने कन्हैया असुर विनाशक
धर्म मार्गियों के सारथी बने
बने गोपियो के उद्धारक
उनके गुणों को देखकर
मीरा बन गई प्रेम दीवानी
उनके योगी स्वरूप को पाकर
राधा बन गई कृष्ण कहानी
कृष्ण समान बनने को
विकार मुक्त होना होगा
स्वयं को आत्म स्वरूप बनाकर
परमात्मा से नाता जोड़ना होगा।

मिली नही आजादी हमको

मिली नही आजादी हमको
अंग्रेजियत के बाने से
हिन्दी मेरी उदास हो रही
अंग्रेजी के छा जाने से
जवान रोज शहीद हो रहे
किसान आत्महत्या कर रहे
भूख से बेटियां मर रही है
आजादी को झकझोर रही है
व्यापारी भी जान गंवा चुके
मजदूर बदहाल हो चुके
कर्मचारी का हाल खराब है
नेता देश का नवाब है
अपना वेतन खुद बढ़ाता
मोटी पेंशन जिंदगीभर खाता
गरीब की पेंशन मजाक है
नही आ पाती खुराक है
हत्या,लूट,बलात्कार हो रहे
गरीबो के घर उजड़ रहे
बस अमीरो की चांदी है
कही अडानी कही अम्बानी है
भाषणों से पेट भरता नही
राशन जनता को मिलता नही
सच कहता हूँ मिली नही
सच्ची आजादी आई नही
आर्थिक असमानता बढ रही है
राष्ट्र भक्ति की भावना घट रही है
पड़ोसी देश सिर उठा रहे है
हम सिर्फ भाषण किये जा रहे है
मिली नही आजादी हमको
इन समस्याओ के आ जाने से
मिली नही आजादी हमको
झूठे वायदों और नारो से।

अमर शहीद जगदीश प्रसाद वत्स को काव्यांजलि

सतरह वर्ष की किशोर उम्र में
देशभक्ति का उनमें जुनून था
ऋषिकुल आयुर्वेदिक कालेज में
छात्र जगदीश बेहद अनमोल था
‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ नेतृत्व को
जगदीश सड़को पर निकल पड़ा
एक एक कर तिरंगा फैहराता गया
अंग्रेजों की गोलियां खाता रहा
घायल जगदीश दहाड़ रहा था
अंग्रेज थर थर कांप रहा था
माफी का प्रस्ताव ठुकरा दिया
मौत को गले से लगा लिया
वीरगाथा जगदीश की जीवनी बने
पाठ्यक्रम में जगदीश को रोज़ पढ़े।

ईश्वरीय सन्तान

ग्रहस्थ आश्रम में रहकर
हम बन सकते सन्त समान

मन सन्तों सा निर्मल हो जाए
घर हो जाए मन्दिर समान

व्यर्थ के विचारो से मुक्ति मिले
याद रहे परमात्मा अविराम

नकारात्मकता दूर हो जाती है
घर बन जाता स्वर्ग समान

देह अभिमान छोड़कर
जब हम विदेही बन जायेगे

सच मानिए तभी से हम
ईश्वरीय सन्तान कहलायेगे।

कही बाढ़, कही सूखा

कही बाढ़, कही सूखा है
कही पेट भरा ,कही भूखा है

जल ही जीवन, जहां सूखा है
जल ही मौत ,जहां जल बरपा है

लाखो लोग बेघर हो जाते है
घर,मवेशी,जल मग्न हो जाते है

कही बूंद बूंद को तरस गए है
जीव,जंतु सब झुलस गए है

प्रकृति से हमने खिलवाड़ किया
वृक्षों पर कुल्हाड़ी से वार किया

नये वृक्ष तो लगाए ही नही
खनिज दोहन अपार किया

संकल्प ले प्रकृति बचाने का
नये वृक्षों से धरा सजाने का।

नन्द राम गोयल

राष्ट्रभक्ति के देवता थे
गांवों के राजदुलारे थे
आध्यात्मिकता मन मे बसी थी
साधु संतों में आस्था बड़ी थी
गरीबो के हमदर्द बहत थे
अन्याय के विरुद्ध खड़े थे
मिशनरी पत्रकारिता को अपनाया
सबके दिलों पर कब्जा जमाया
कर्मयोगी जीवन अपनाया
मुझ अकिंचन को अपना बनाया
मुझे सदाचारी पत्रकार बनाया
मिट्टी से मुझे कुंदन सा चमकाया
ग्रामीण जनता के महानायक थे
उपेक्षितों के अधिनायक थे
नन्द राम गोयल नाम तुम्हारा
हमारे दिलों के अभिभावक थे
एक बार लौटकर तो आओ
पत्रकारिता की अलख जगाओ
झूठ धरा पर कही रह न जाए
ऐसा फिर एक यज्ञ रचाओ।

मेरा मन

तुम्हारा जल तुम्हे ही अर्पित
मेरा मन हो रहा है हर्षित
सारे विकारो से मुक्ति दो
पावन बनने की शक्ति दो
हे सच्चिदानन्द सुख के सागर
तुम हो प्रेम के महासागर
दुनिया के रचियता तुम हो
जन जन के स्वामी तुम हो
शिव रूप मे कल्याण करते
मनोकामना सबकी पूर्ण करते
जो तुमको अपना लेता है
भाग्य अपना बना लेता है
पिता हो तुम, हर किसी के
पालक हो तुम ,हर किसी के
जो तुम्हारी याद में जीता है
अमरत्व का रस वही पीता है।

भूल अगर हो जाए

भूल अगर हो जाए खुद से
क्षमा तुरन्त मांग लीजिए
सामने अगर खड़े हो बड़े
झुककर अभिवादन कीजिए
सीखना चाहते हो जिनसे तुम
उनको गुरु मान लीजिए
छोड़ दीजिए अहंकार अपना
खुद को मधुरता में ढाल लीजिए
हो जायेगे गैर भी अपने
उन्हें सम्मान देना सीख लीजिए
परमात्म कृपा बनी रहेगी
परमात्मा को याद कर लीजिए।

राम

राम से बड़ा कोई नही
अहंकार ज़रा भी नही
सर्वशक्ति के स्वामी है
विनम्रता में सानी नही
मर्यादा का खजाना है
उनसे बड़ा दानी नही
राजनीति से बड़े है वे
सृष्टि थामे खड़े है वे
जो राम से बड़ा दर्शाते हैं
रावण वे ही कहलाते है
सत्ता आज है कल नही होगी
राम तो होंगे रावण नही होंगे।

निराकार

निराकार परम शिव है
हम सबके भगवान
जो शिव का स्मरण करें
मिले तीन लोक का ज्ञान
आदि,मध्य,अंत के
रचियता है परमात्मा
जब जब पाप बढ़े धरा पर
कर देते पाप का खात्मा
पांच हजार साल के कल्प मे
सतयुग,त्रेता,द्वापर आते
कलियुग,संगम पाप धरा के
दुनिया को मायावी बनाते
सुखद परिवर्तन शिव लाते
पतित से हमको पावन बनाते।

शिव साधना

शिव साधना करते रहो
चाहे सुबह हो या शाम
शिव ही पार लगाएंगे
रहते है जो परमधाम
शांति के परिचायक शिव
आनन्द के जनक है शिव
विकार सारे हर लेते है
पावन सबको बनाते शिव
याद शिव की बनी रहे
ऐसे करो तुम अपने काज्
जीवन सफल हो जायेगा
शिव पहनाएंगे विजय ताज।

मानवता के मार्ग पर

मानवता के मार्ग पर
जो व्यक्ति चलते सदा
दुःख उनसे दूर रहते
खुशिया मिलती उन्हें सदा
स्वर्णिम उनका जीवन रहे
हर कोई चाहे उन्हें सदा
सफलता उनके कदम चूमे
दुनिया उनके इर्द गिर्द घुमे
न रहे वैर वैमनस्य किसी से
प्यार के रंग में वे सदा झूमे
आत्मा भी उनकी रहे हल्की
परमात्म याद में मन सदा झूमे।

मन मे

मन मे मैल कतई मत रखना
तन को सदा स्वच्छ रखना
तन – मन दोनो खिल जायेगे
परमात्म याद जगाये रखना
धूप –छांव है जीवन के रस्ते
समान भाव बनाये रखना
छोटे- बड़े मे कभी भेद न हो
जाति धर्म की दीवार न हो
मानवता का पाठ याद रखना
देश को अखण्ड सुरक्षित रखना।

शिव को जिसने पा लिया

शिव को जिसने पा लिया
हो जाएगा कल्याण
शिव मात्र एक परमात्मा
जो देते सबको ज्ञान
याद करने मात्र से
मिल जाते है शिव
पवित्र राह अपनाने से
खुश हो जाते शिव
पिता सबके शिव है
रूप है निराकार
आत्म स्वरूप में हम रहे
न रहे देह विकार
जीवन परिवर्तन को
करे शिव आवहान
इह लोक सफल होगा
मिले परलोक का ज्ञान।

कांवड़

कांवड़ लेकर चल रहे भोले
कदम से कदम मिला रहे भोले
चलते चलते पैरो मे है छाले
कदम फिर भी नही रुकने वाले
कुछ शोर शराबा बहुत कर रहे
कुछ भक्ति भाव से आगे बढ रहे
भोलो की सेवा बहुत हो रही
भोजन ,दवाई,व्यवस्था सारी
जनता भी बंधक हुई बेचारी
पुलिस पर कांवड़िये है भारी
संख्या बल बन गई है लाचारी
परमात्मा शिव मालिक है सबके
उनका वन्दन करे सब मिलके।

प्रेमचंद के रचना किरदार

अलगू,धनिया,होरी
प्रेमचंद के रचना किरदार
ईदगाह, गुलीडण्डा
याद आ रहा गोदान
दो बैलो की जोड़ी से
लमही बनी है महान
जन्मभूमि देख मुंशी की
मन हमारा हर्षित हुआ
प्रेमचन्द का प्रेम वहां
कलम हिलोरे ले वहां
माथे रज लगा लमही की
जीवन धन्य हुआ हमारा
साहित्य सम्राट के गांव मे
मन प्रसन्न हुआ हमारा
आत्मबोध मे रहे सदा
परमात्मा में हो विश्वास
प्रेमचंद जैसी कलम चले
रचनाओं की हो बरसात।

जान लिया

जान लिया मैंने स्वयं को
पहचान लिया मैंने स्वयं को
मैं शरीर नही, एक आत्मा हूँ
आत्मा ज्योतिबिंदु स्वरूप है
जो स्वरूप आत्मा का है
वहीँ स्वरूप परमात्मा का है
आत्मा का परमात्मा से
अलौकिक मिलन की विधि
राजयोग को जान लिया है
आत्मा और परमात्मा
दोनों को पहचान लिया है
यही सीख आत्मबोध कराएगी
मुझे ईश्वरीय बोध कराएगी।

प्रत्यक्षदर्शी

प्रत्यक्षदर्शी बनकर
देखो यह संसार
जीवन रूपी ड्रामे में
आप है एक किरदार
जो भूमिका मिली है
उसे निभाते जाना है
परमात्मा है निर्देशक
उनका हुक्म बजाना है
भूमिका पूरी होते ही
यहाँ से चले जाना है
संसार की गति यही है
यही जीवन का ताना बाना है
जो आया है उसे जाना है
जो गया है उसे फिर आना है।

नर नारी

परमात्मा की अनूठी कृति है
चाहे नर हो या फिर नारी
फिर दोनों में भेद क्योँ है
नारी क्यों बन गई बेचारी
नारी जननी संसार की
नर है उसका मूल आधार
दोनों जीवन के दो पहिये
उन्ही से बनता घर -संसार
नारी बहन है, नारी माँ है
नारी बेटी है ,युगल है नारी
फिर क्यों उत्पीड़ित होती नारी
जन्म क्यों नही ले पाती बेचारी
आओ नारी का सम्मान करे
सबके भले की बात करे।

दुःख है

दुःख है परीक्षा की घड़ी
सुख है परीक्षा का प्रतिफल
जो भी दुःख को सह गया
हो गया उसका जीवन सफल
सुख -दुःख है धूप छाँव जैसे
आए जीवन में बाहार ऐसे
दुःख में दुखी होना नही है
सुख में आपा खोना नही है
रहे दोनों समय एक समान
इस आदत को खोना नही है
तभी जीवन सुखमय हो पाएगा
मन परमात्म से जुड़ जाएगा।

क्रोध

क्रोध है जीवन का दुश्मन
होते क्रोध से रुग्ण अनेक
मन का चैन खो जाता है
हर लेता यह सबका विवेक
क्रोध पर विजय पाने को
आत्म स्वरूप में आना होगा
शांत स्वभाव है आत्मा का
उसी स्वभाव में रहना होगा
गलती पर क्रोध न करके
क्षमा करना सीख लीजिए
दुश्मन भी मित्रवत हो जाए
ऐसा आचरण कीजिए
आत्मा शांत रहेगी सदा
खिलखिलाकर हंस लीजिए।

शहीद जगदीश वत्स जयंती पर

याद रहेंगे सदा जगदीश
मनो की किताब में
स्वर्ण पन्ना जोड़ दिया था
भारत के इतिहास में
17 वर्ष की अल्पायु में
तिरंगा उन्होंने फैहराया था
अंग्रेजों की गोलियों से
वह राष्ट्रभक्त टकराया था
मां जमुना, पिता कदम का
जगदीश वत्स दुलारा था
भारत मां की आजादी का
जगदीश वत्स दीवाना था
पंडित नेहरू ने उनकी वीरता का
लोहा खूब माना था
विजय ट्राफी देकर नेहरू ने
वत्स परिवार को नवाज़ा था
अमर रहेगा नाम जगदीश का
जब तक सूरज चांद रहेंगे
नाम गूंजता रहेगा उनका
आओ शहादत को याद करे
भारत रत्न देंकर जगदीश को
उनकी राष्ट्रभक्ति को नमन करे।

बुजुर्ग

घर मे हो या आस पास
जहां भी हो बुजुर्ग वास
जरूर जाओ उनके पास
कराओ उन्हें अपनत्व एहसास
आवश्यकता उनकी बहुत कम है
केवल एकाकीपन का गम है
प्यार से जानिए उनका हाल
फिर देखिए होगा कमाल
उनके चेहरे पर मुस्कान आएगी
खुशियां जिंदगी में लौट आएगी।

जीवन

जीवन सुगम बनाने को
इच्छा कम का मिले वरदान
जितनी इच्छाएं कम होगी
उतना अधिक मिलेगा मान
व्यर्थ के संकल्पो से जब
मुक्ति सहज मिल जायेगी
सुविचारों से परिपूर्ण मन
पा लेगा अपना स्वमान
स्वयं को जानने का जब
आत्मचिंतन होने लगे
आत्मा का परमात्मा से
मिलन हो जाएगा आसान ।

प्रतिदिन

प्रतिदिन सवेरे लिया करे
हम सब प्रभु का नाम
प्रभु की ही कृपा से
हो जायेगे सारे हमारे काम
यह सोचो हम नही करते
प्रभु करते है सारे काज
कोई विघ्न नही आएगा
मिलेगा सफलता का ताज
यह सफलता हम सबके
सुखद जीवन का आधार बनेगी
प्रभु हमेशा याद रहे हमे
परलोक संवारने की राह बनेगी।

शांत मन

शांत मन से बढ़ती है
आत्म विवेक की शक्ति
उनको भी शांति मिलती
जो करते है प्रभु भक्ति
मिल जाए परमात्म ज्ञान
बदल जाएगा जीवन सारा
विकारो से मुक्ति मिलेगी
पवित्र हो जाए मन हमारा
स्वयं को जानने इससे
मिल जाता है अवसर
प्रभु से लौ लग जाती है
सुधर जाता है जीवन स्तर ।

शांतचित

शांतचित है मूल आधार
खुशी रहती इसमे अपार
व्यर्थ सोच की जगह नही
करते किसी का बुरा नही
विकार मुक्तता बड़ा है गुण
अहंकार रूप बड़ा है घुण
समानता समभाव की है धनी
प्यार की ऐसे मे नही है कमी
आत्म स्वरूप मे जीवन बिताते
परमात्म ज्ञान से जीवन सजाते
इससे बनते इंसान से देवता
कलियुग से सतयुग का यही पता।

एक निवेदन मेरा भी

एक निवेदन मेरा भी
सुन लो प्यारे ध्यान से
कुछ तो समय निकालो
अपने लिए भी काम से
जीवन सारा बीत न जाये
रोटी,कपड़ा,मकान मे
परमात्मा का नाम लेना भी
न आ पाये ख्याल में
जीवन है प्रभु की देन
कुछ अपेक्षा है आपसे
व्यस्त समय से समय निकालो
मिल लो जगत के बाप से
वही तुम्हारा मीत सखा है
वही मात पिता तुम्हारे
उन्ही से बस ध्यान लगा लो
मिट जाएंगे कष्ट सारे।

आचरण

जैसा आचरण आप करोगे
वैसा बच्चे कर पाएंगे
आप सदमार्ग पर चलकर देखो
बच्चे भी सदमार्ग अपनाएंगे
बडो का अनुसरण करना
बच्चों की पुरानी आदत है
बडो के पदचिन्हों पर चलना
यही सच्ची इबादत है
झूठ,फरेब,मक्कारी अगर है
उसे अच्छाई से खत्म करों
सत्य,मधुरता,शांत व्यवहार से
बच्चों मे ज्ञान प्रकाश भरो
ऐसा करने से बड़प्पन आपका
कही अधिक बढ जायेगा
बच्चा बच्चा आपको प्यारा
कृष्ण सरीखा हो जायेगा।

दुआ

सच्चे मन से करों दुआ
परमात्मा सुन लेगा
जो भी तुम चाहोगे
वही वह कर देगा
अपने लिए तो सभी मांगते
दुसरो के लिए मांगकर देखो
दुआ कबूल हो जायेगी
एक बार दुआ करके देखो
परोपकार है सच्ची सेवा
सुख भी मिलता इससे अपार
इंसानियत की कसौटी पर
कभी खुद को कस कर देखो
इंसान से देवता बन जाओगे
परमात्मा के प्यारे हो जाओगे।

विधानसभा उपचुनाव

विधानसभा उपचुनाव में
कांग्रेस के जीतने पर
विधायक भले ही काजी बने
बधाइयां मुझे भी मिल रही है
लोग मिठाई भी मांग रहे है
बधाई देने वालो में वे भी है
जो कांग्रेस के साथ नही रहे
कई ऐसे भी है जो दिखावे को
भाजपा के साथ खड़े थे
कुछ वहां माल चीर रहे थे
दावे भी कर रहे थे,वही जीतेगा
लेकिन पासा पलटते ही
वे भी पलट गए है तत्काल
अब कह रहे है बाहरी था
कहां ढूंढने जाते,हरियाणा क्या
काजी कम से कम अपना तो है
दुःख सुख में साथ रहेगा
काश!यह बात पहले समझे होते
इतने बवेले न हुए होते
चुनाव क्या,रणभूमि बन गया था
अपना भी,पराया हो गया था
पैसे ने अपना जलवा दिखाया
कही जात, कही धर्म आड़े आया
फिर भी संविधान जीत गया
अवसरवादी हार गया
फिर भी जोश में होश खोना नही है
हिंसा की कोई जगह नही है
अहिंसा ही हमे पार लगाएगी
लोकतंत्र को स्वस्थ बनायेगी
यही सुखद भविष्य का आधार है
परिवर्तन की नई ब्यार है।

डॉ सुनीता पुण्डरीक

मेरी युगल डॉ सुनीता पुण्डरीक को उनके जन्मदिवस की हार्दिक बधाई,

ईश्वरीय याद में रहती सदा
कर्तव्य पथ पर चलती सदा
झँझवातो से घबराती नही
गंगा की तरह बहती सदा
कामना करती खुशहाली की
पैरवी करती संस्कारो की
निर्लेप भाव जीवन तुम्हारा
धूप छांव दोनो सहती
मां शांति की लाडली हो
प्रकाशवती की राजदुलारी हो
मुझको कृष्ण सा चाहा है
स्वयं राधा -रुक्मणी सी रहती
भक्ति में लीन रहती सदा
पावन तुम प्रिय सखी हो
जन्मदिन की शुभकामनाएं तुम्हे
अभिलाषा तुम्हारी पूरी हो
जगत में नाम गूंजे तुम्हारा
ऐसी दुआए है हम सबकी।

घोर कलियुग

घोर कलियुग की है छाया
अपना भी आज हुआ पराया
बड़े छोटे का नही सम्मान
स्वार्थ की हंडी मे
पक रहा अभिमान
जिनके सामने मिमयाते थे
आज उन्हें गुर्राते है
परमात्म को ही भूल गए
खुद को भगवान बताते है
पथभ्रष्ट हुए ऐसे अज्ञानी
कर रहे रोज नादानी
परमात्मा उन्हें सद्बुद्धि दो
अहंकार से भी मुक्ति दो।

आधुनिकता

आधुनिकता की होड़ मे
लोक परम्परा बिसर गई

परमात्म चिंतन छोड़ कर
व्यर्थ सोच मे उलझ गई

दुसरो की सोचते सोचते
पूरी जिंदगी गुजर गई

किया होता अगर स्व चिंतन
खिला होता तन और मन

जो चले परमात्म मार्ग पर
उनकी जिंदगी संवर गई

परमात्मा का साथ मिला
पवित्रता से जिंदगी खिल गई।

अच्छे कर्म

अच्छे कर्म जिसने किए
जीवन के पल सुखमय जिए

तनाव कभी पास नही आता
शांति प्रिय ही उनको भाता

मुख पर तेज उन्ही के रहता
राजी खुशी सदा वह रहता

आत्म सन्तोष की कमी नही
प्रभु आसक्ति नित बढ़ती नई

सांसारिक द्रष्टा वह कहलाता
मोह माया से दूर हो जाता

परमात्म पिता का वही है प्यारा
सारे जग का होता राजदुलारा ।

यह कैसा चुनाव?

चुनाव ही तो था,फिर शत्रुता क्यों
निष्पक्ष मतदान में,व्यवधान क्यों

जो अच्छा होगा,वह चुना जाएगा
फिर जिद क्यो है अपने को जीताने की

जबरदस्ती वोटरों को लुभाने की
या फिर उन्हें धमकाने की

संविधान में तो ऐसा कुछ नही है
न धन बल है,न गुंडागर्दी

फिर यह सब कहा से,
ओर क्यो आ जाती है चुनाव में

सरकार भी बह जाती है
दलगत बहाव में

जबकि सरकार सबकी है
न इस दल की, न उस दल की

सरकार को
समभावी रहना चाहिए

निष्पक्षता रखनी चाहिए
बिना किसी दबाव के

बिना किसी प्रलोभन के
जिसे ज्यादा वोट मिले

उसको माननीय मानो
स्वस्थ लोकतंत्र को जानो।

राष्ट्रभक्त

उत्तराखंड में पांच जवानों के
शव देखकर छाती हिल गई
जैसे धरती फट गई
वही हिमाचल में
नो माह बाद हुआ
एक शहीद का अंतिम संस्कार
शोक,करुणा और चीत्कार
शहादत पर राष्ट्रभक्ति भारी थी
फिर भी सिसकियां जारी थी
क्या शहीदों के परिजनों का दुःख
हम बांट पाते है
उन्हें अग्रिम पंक्ति में खड़ा कर पाते है
क्या उनके लिए बन जाएगा
बिना घुस दिए आश्रित प्रमाण पत्र
क्या घर बैठे स्वीकृत हो जाएगी
परिवार की पेंशन
मिलने लगेगा सहजता से राशन
बीमार होने पर हो सकेगा
घर बैठे अच्छा इलाज
यदि यह सब हो जाए, जो उनका हक है
तभी समझो हमे शहीद पर फक्र है
भ्र्ष्टाचार की सरकारी मशीनरी में
इतना सम्मान मिलना आसान नही है
क्योंकि उन्हें जेब से प्यार है
शहीद से सरोकार नही है
हो सकता है छब्बीस जनवरी
या फिर पंद्रह अगस्त को बुला ले कोई
वर्ना बाकी दिनों में उनसे
किसी को कोई दरकार नही है
बेलगाम नोकरशाही
स्वार्थ की हंडी से पके नेता
आखिर कब राष्ट्रभक्त परिवारों को
उनका खोया सम्मान लौटाएंगे
उन्हें अपने से ऊंचा मान पाएंगे।

बन्द मुठ्ठी

बन्द मुठ्ठी लेकर आता इंसान
भाग्य अपना बनाता इंसान

वह जैसे कर्म करता जाता है
भाग्य उसका बदलता जाता है

सदकर्म से जीवन निखरता
बुरे कर्म से जीवन बिखरता

जैसा करोगें वैसा भरोगे
यह परिणाम हर रोज निकलता

फिर हम क्यो समझ नही पाते
दोष भाग्य पर देने लग जाते

जो दौलत कमाई यही रह जायेगी
मुठ्ठी हाथ की खुली रह जायेगी।

जीवन

जीवन सबका रेत समान
फिर काहे का करों अभिमान

फिसलता जाता सांसो स्वांस
फिर खत्म हो जाती सब आस

मिट्टी से जन्मा मिट्टी हो जाता
सच मे हाथ कुछ भी न आता

जो कर्म किये जीवन में अच्छे
वही साथ निभाते सच्चे

फिर समय क्यो गंवाता बन्दे
हर एक पल को सफल कर दे

जाने पर इस दुनिया के बाद
अपने नाम को अमर कर दे।

हर पल

हर पल याद रहे प्रभु
ऐसे करो अच्छे काम

दिल किसी का दुखाओ नही
सबको करो प्रणाम

ईश्वर की सन्तान है सब
क्या बड़ा, क्या छोटा

आत्मभाव से सम्मान दो
धर्म -जात सब छोटा

इंसानियत है बड़प्पन
जिसको तुम अपनाओ

जो भी है प्रभु का बन्दा
सब पर प्यार बरसाओ।

हंसना और हंसाना

हंसना और हंसाना सीखो
जीवन सरल बनाना सीखों
अभिमान कोई रह न पाए
ऐसे स्वमान में जीना सीखों
व्यवहार सभी को भा जाए
ऐसा अपना बनाना सीखों
जगत तुम्हे भूल न पाए
दिलो में जगह बनाना सीखों
अपने आपसे भी बात करों
खुद से खुद की बात करो
ईश्वर से कुछ संवाद करो
आत्मस्वरूप में वास करो

जो आया है, वह जाएगा

जो आया है, वह जाएगा
दुनिया मे सदा न रह पाएगा
जिसने कुछ अच्छा किया
वही अमर हो पाएगा
अपने लिए तो सभी जीते है
परहित जीना जिसे आएगा
ईश्वर उस पर मेहरबान रहे
सर्व का प्यारा कहलायेगा
मानव जीवन को सार्थक कर
जो देवत्व समान बन जाएगा
परमात्मा का प्यारा कहलाएगा
परलोक उसका संवर जाएगा।

आम है वह

भले खास न हो पर आम है वह
फलों का राजा सरेआम है वह
दशहरी,लंगड़ा चौसा,कही देशी
मलीहाबादी कही लंगड़ा परदेशी
चूसकर खाने का मज़ा निराला
शहद सा मीठा कही खट्टा मतवाला
कही डाल का कही पाल का
कही पेटियों में सजता फलराजा
अमीर-गरीब हर कोई खाता
बजट में आम सबके आ जाता
सौगात में भी आम मिलता बहुत है
परमात्मा को भी आम भाता बहुत है
आओ आम का लुत्फ उठाये
मौसम के प्यारे फल को खाएं
स्वास्थ्य के लिए आम भाता बहुत है
स्वाद में भी आम लज़ीज़ बहुत है
तभी तो आम फलों का है राजा
आम का आचार वर्षभर का खाजा।

उगता सूरज

उगता सूरज देखकर
हर कोई होता प्रसन्न
नवसृजन जब भी हो
होता है नया जश्न
कालचक्र रुकता नही
करता अपना काम
उगते सूरज की सुबह होती
ढलते सूरज की शाम
जीवन रहस्य भी यही है
कभी सुबह, कभी शाम
परमात्म ज्ञान जिसे हो जाए
सदा रहता निश्चिन्त वह
न सुख में अतिप्रसन्न होता
न दुःख में विचलित होता।

अहंकार

अहंकार जिसने किया
चैन से वह नही जिया
शांति उसकी चली जाती
प्रेम की विदाई हो जाती
दुसरो का भी चैन हर्ता
खुद भी बेमौत मरता
रावण ने भी यही किया था
कंस ने अत्याचार किया था
बल,बुद्धि काम न आई
विनाशकाले जान गंवाई
चीन पाक इसी राह पर है
खुद मरने की कगार पर है।

जीवन

प्रवाहित जल सा
जीवन हो
गंगा जल सा
निर्मल हो
धूल जाए सारे विकार
जीवन से,
पवित्र तन,मन
और जीवन हो
ज्ञान गंगा में लगाओ
गोते प्रतिदिन
परमात्म ज्ञान से
परिपूर्ण हो हर दिन
मिटे विकार अंधेरा
जगे पवित्र जोत हर दिन।

राम पूछ रहे है उनसे

राम पूछ रहे है उनसे
कैसा मंदिर तुमने बनाया
अरबो खर्च होने पर भी
छत से पानी क्यो आया
क्या नही दिया राम ने
तुम्हे जीरो से हीरो बनाया
फिर कैसी बेवफाई है ये
छत से टपका क्यो बरपाया
अहंकार में डूबे हुए हो
मर्यादा तक भूल गए
राम लाये थे तुम्हे धरा पर
तुम राम को लाने की बात कर रहे
उल्टी गंगा बहाओगे तो
नतीजे उसके भुगतने होने
राम नाम भुनाने वाले
राम स्थलों पर पराजित होंगे
रस्सी जल गई बल नही गए
यह देख रहा है सारा देश
आपातकाल तो याद रहा
भूल गए मणिपुर प्रदेश
किसानों की मौत का जिक्र नही
बेरोजगार बिलख रहे है यहां
सत्ताधीश राजदण्ड दिखा रहे
कैसे बचेगा लोकतंत्र यहां
संविधान की कुर्सी पर बैठा
भाषा दलगत बोल रहा
महामहिम तक अछूती न रही
एजेंडा सरकार का गूंज रहा
संविधान के शीर्ष मंदिर में
संविधान की रक्षा करनी होगी
हर आम की बने खास आवाज़
यह व्यवस्था अब करनी होगी
स्पष्ट नही बहुमत किसी का
गठबंधन की बैशाखियां है
मनमानी अब नही चलेगी
निष्पक्ष न्यायालय से वास्ता है।

मन मे कबीर

मन मे कबीर बसा है सबके
उसे बाहर ले आओ अबके
पाखण्ड,अंधविश्वास खत्म करों
कबीर को फिर से जीवन्त करों
15 वीं सदी से जगा रहा है
सबको सच्चाई बता रहा है
जाति धर्म का चक्कर छोडो
स्वयं को इंसानियत से जोड़ो
ईश्वर अल्लाह तो एक है
इबादत के तरीके अनेक है
कुरीति,विकारो को दूर करों
सुसंस्कारों को ग्रहण करों
कबीर विचार छा जायेगा
समाज फिर से बदल जायेगा।

चिंतन

अच्छा चिंतन करने से
अच्छे बन जाते विचार
इसी राह पर चलने से
करते हम सद्व्यवहार
सबके भले में अपना भला
न कोई शिकवा, न गिला
सन्तोष सुख की राह यही
इच्छाए कम हो बात सही
दूसरे को नही, स्वयं को देखो
अपनी कमियां स्वयं ही देखो
अच्छा चरित्र बन जाएगा
दिल परमात्मा से जुड़ जाएगा।

परमात्म मत

परमात्म मत पर जो चले
सदा सफल वह होए
मन मत की जो करे
कष्ट उठाना पड जाए
यह शरीर तो पुतला है
पंचतत्व की माटी का
आत्मा ही चलाती है
जीवनपथ हर राही का
आत्मा का परमात्मा से
ध्यान जब लग जाएगा
जीवन पथ ज्योतिबिन्दू से
जगमगाता नजर आएगा।

अच्छे कर्म

अच्छे कर्म करने पर
अच्छा फल मिलता है
सदपुरुषार्थ करने पर
गजब का सुख मिलता है
परहित सेवा करने से
मन आनन्दित हो जाता है
सबके मन को भा जाते है
सबके मन मे बस जाते है
पराया नही रहता फिर कोई
दुसरो के दुख हर लेता है
हर एक चेहरे पर मुस्कान रहे
ऐसा वातावरण बन जाता है।

अमृतसर

अमृतसर की पावन धरा पर
एक दिव्य कन्या ने जन्म लिया
राधे नाम से पुकारी गई वह
देवी शक्ति का उदभव हुआ
परमात्मा शिव की लाडली बेटी
ननिहाल सिंध में जा पहुंची
ओम मण्डली के सत्संग से जुड़
दादा लेखराज की बन गई बेटी
युग परिवर्तन करने को
परमात्मा ने उन्हें निमित्त बनाया
राधे हो गई सरस्वती जगदम्बा
नारी शक्ति का मान बढ़ाया।

जीवन एक अनुपम उपहार

दिया परमात्मा ने हमको
जीवन एक अनुपम उपहार
हर पल को सार्थक कर लो
कोई भी पल न जाए बेकार
धन दौलत है जीते जी की
सद्कर्म ही है निधि अपार
ऐश्वरीय लेकर गया नही कोई
प्यार है मनुजता का आधार
दुसरो को नही स्वयं को जानो
स्वयं को मानो दिव्य अवतार
परमात्मा के सर्वगुण धारण करो
मिलेगी जीवन मे खुशी अपार।

शिव है पहले योगी

परमात्मा शिव है पहले योगी
राजयोग हमे सिखलाते है
स्वयं की इंद्रियां वश में रहे
ऐसा पाठ हमको पढाते है
सिर्फ एक दिन का योग नही है
यह तो नियमित पाठशाला है
माता पिता और गुरु है शिव
जो आकर हर रोज़ पढाते है
शारिरिक अभ्यास को योग न कहे
योग तो तन मन से जुड़ता है
निराकारी परमात्मा शिव से
आत्मा का सम्बंध बनता है
विकारो से मुक्ति की युक्ति है
पतित से पावन की शक्ति है
संकल्प कर राजयोग अपनालो
तन मन को अपने पवित्र बना लो।

ब्रह्माकुमारीज

ओम मंडली का जब जन्म हुआ
राजयोग का तब उदय हुआ
सिंध प्रांत के कराची शहर में
इस योग की पहली शुरुआत हुई
सन 1936 में ब्रह्माबाबा ने ही
यह रूहानी पौधा लगाया था
सैकड़ो बच्चियों में चरित्र निर्माण का
एक अनूठा अभियान चलाया था
हीरे-जवाहरात के व्यापार से बाबा ने
जो धन दौलत कमाई थी
उससे ओम मंडली का खर्चा चलाकर
बच्चियों की किस्मत चमकाई थी
देश का बटवारा होने पर
भारत भूमि का ही चयन किया
सन 1950 में माउंट आबू पहुंचकर
नए युग का आग़ाज़ किया
ब्रह्माकुमारीज यही से नाम मिला
आध्यात्म सेवा को आयाम मिला
प्रतिदिन राजयोग अभ्यास कराते
शांति, सदभाव का प्रकाश फैलाते
धवल वस्त्र परिधान अपनाकर
ओम शांति की अलख जगाते
परमात्मा शिव ने यह यज्ञ रचाया
भाई-बहनों को निमित्त बनाया
दुनिया के 140 देशों तक जाकर
राजयोग का पाठ पढ़ाया
ब्रह्माबाबा, जगदम्बा सरस्वती
प्रकाशमणि,जानकी आधार बने
गुलजार दादी के तन में आकर
परमात्मा यहां साकार बने
ब्रह्माकुमारीज में जो भी आता
ब्रह्माकुमारीज का होकर रह जाता
स्वयं की आत्मा का बोध पाकर
हर कोई परमात्मा से यहां जुड़ जाता।

पक्ष – विपक्ष

पक्ष – विपक्ष के भेद बिना
संसद चले किसी द्वेष बिना
मर्यादा संसद की भंग न हो
नफरत की कोई जंग न हो
पुरजोर पैरवी जनहितों की हो
सीमाओं की रक्षा को द्वंद्व न हो
दलगत नही देशहित सोचिए
दलबदल की राजनीति छोड़िए
जनता के भरोसे पर खरा उतरिये
जो वायदे किए उन्हें पूरा कीजिए।

सम्मान

सम्मान समाज मे मिलता है
जो रहते है निरहंकार
मुख से जो मीठा बोलते
दुनिया करती उनसे प्यार
मैं मैं जिनमे न हो
दुनिया के वो अपने है
मैं मैं जिनके अंदर है
न वो गैरो के, न अपने है
उजले बनो, मन से बनो
आत्मा से सबल बनो
परमात्म भी मिल जाएंगे
गुण से परमात्म जैसे बनो।

मन सदा

मन सदा एकाग्र रहे
ऐसा रखिए ध्यान
व्यर्थ चिंतन से मुक्ति मिले
सद्चिन्तन का मिले ज्ञान
किसी का बुरा न हो कभी
ऐसा करे सदव्यवहार
गैर भी अपने हो जाएं
लोग करे सत्कार
फर्श से अर्श जब मिले
फर्श न भूलना कदापि
निरहंकार बने रहे
मिले परमात्म प्यार।

रोज उठकर

रोज उठकर किया करों
परमात्मा को प्रणाम
दिनभर आपका शुभ होगा
परमात्मा संवारेगे हर काम
परमात्म संग का आभास रहे
कर्मयोग में ध्यान रहे
मिले सफलता जीवन में
घरबार हमेशा आबाद रहे
सोते समय भी भूलो ना
शुभरात्रि प्रभु को बोल दीजिए
फिर देखिए ईश्वरीय लीला
कोई भी काम रहे न ढीला।

जीवन के रंगमंच

जीवन के रंगमंच पर
आते है बारी बारी
किरदार अपना निभाकर
जाते है बारी बारी
जिसकी जैसी प्रालब्ध
वैसा ही जीवन पाता है
जितनी सांस दी प्रभु ने
उतनी सांस ले पाता है
दुःख-सुख साथ रहते है
दोनो मिलते बारी बारी
सद्कर्म ही साथ निभाते है
जब आती जाने की बारी।

स्वार्थ की दुनिया

स्वार्थ की दुनिया में
निस्वार्थ रहना सीख लो
पाप की दुनिया में
निष्पाप रहना सीख लो
मैं शब्द जिसने भी छोड़ा
स्वयं को उसने प्रभु से जोड़ा
स्वयं को स्वयं से मिलाना
यह विधि बस सीख लो
आत्मा का परमात्मा से
मिलनयोग सीख लो
कष्ट सारे दूर हो जायेगे
मुस्कुराना तुम सीख लो।

शरीर के साथ

शरीर के साथ विचार शुद्ध हो
तन मन से इंसान शुद्ध हो
ईर्ष्या ,द्वेष,बैरभाव का अंत हो
प्रेम,सदभाव,अपनत्व शुद्ध हो
पंच तत्व का है तन पुतला
देहाभिमान का सदा अंत हो
विदेही होकर रहना सीखो
आत्म बल बढ़ाना सीखो
बनी रहे परमात्म कृपा सब पर
तन मन सुख का कभी न अंत हो
छोटे बड़े का यह भेद कैसा
परमात्म सन्तान सभी नेक हो।

धर्म सभी का

धर्म सभी का यह हो
बढ़े चरित्र का मान
सबके चरित्र से बनती है
अपने देश की शान
संस्कार ,संस्कृति,मानवता
है भारत की पहचान
इन गुणों को अपनाने से
होता भारत महान्
अहिंसा के हम है प्रहरी
शक्ति के हम पोषक
परमात्म मार्ग पर हम चलें
बन जाए दुनियां की शान।

जिंदगी

जिंदगी वही सफल है
जिसमे पुरुषार्थ का फल है
भाग्य नही पुरुषार्थ बड़ा है
यह भाग्य से आगे खड़ा है
पुरुषार्थ ही है ईश्वर सेवा
जीवन मे मिलती है मेवा
इससे सब अपने बन जाते
आप सभी के प्रिय हो जाते
जीवन मे खुशिया आ जाती
परमात्म कृपा स्वत:हो जाती
पुरुषार्थ को साधना बना लो
जैसा चाहे भाग्य बना लो।

दिल की सुन लो

दिल की सुन लो बात
दिल है सुप्रीम जज
नही करता अन्याय
यह है न्याय का घर
दिल की आवाज
जब सुन लेता मष्तिष्क
हर काम होता आसान
मिल जाती है मंजिल
दिल की आवाज ही
यथार्थ में है आत्मा
जिसको शक्ति देते है
सदैव परमपिता परमात्मा।

राजयोग से

राजयोग से आत्मा को
रिचार्ज कर लीजिए
आत्मा पर चढ़ी मैल को
तनिक धो लीजिए
मूल धर्म पवित्रता है
यूँ ही न गंवाईये
विकार की कालिख पुती है
उस कालिख को हटाइए
परमात्म याद से हो सकती है
अपनी आत्मा की धुलाई
पुरुषार्थ का थोड़ा
साबुन तो लगाइये
फिर देखिए चमक उठेगी
चेहरे की लालिमा
अपने तन के साथ
मन को भी स्वस्थ बनाइये।

एक वृक्ष लगाये

आओ हम एक वृक्ष लगाये
प्रकृति को अपनी बचाये
हवा-पानी सबको चाहिये
खाने को रोटी भी चाहिये
तभी सब मिलेगा जब पेड़ होंगे
हरियाली से लबरेज होंगे
भीषण गर्मी का बचाव यही है
पर्यावरण संतुलन आधार यही है
हर व्यक्ति दो पेड़ लगाये
उनकी अच्छे से देखभाल कराये
नई पीढ़ी को भी जीवन मिलेगा
जो जीवन है खुशहाल बनेगा।

वोटर राजा

वोटर राजा ने जो वोट दिया
उसका परिणाम आज आ रहा
संयम ,धैर्य बनाए रखिए
जनप्रतिनिधि नया आ रहा
निष्पक्ष मतगणना के लिए
सजग रहना बहुत जरूरी है
जिस ईवीएम में वोट पड़े थे
उसी की गिनती जरूरी है
जो जीत रहे है वे उग्र न हो
जो हार रहे है वे मायूस न हो
लोकतंत्र में ईमानदारी का
अनुपालन सभी को करना होगा
जोड़तोड़ की राजनीति से
हम सबको ही बचना होगा
चाहे जिस दल से कोई जीते
समभाव जनता से रखना होगा।

भानु खूब तमतमा रहा

लू से भी गरमा रहा
पसीने आते बार बार

पानी की हो रही दरकार
कही बूंद बूंद को तरस रहे

कही पानी बेमोल बहे
कही मिनरल की भरमार

कही दूषित जल की धार
जिन्हें वोट दिया वे ऐश करेंगे

जिसने दिया वे यूं ही सड़ेंगे
समानता का है घोर अभाव

इसीलिए डगमगा रही
आज लोकतंत्र की नाव।

नकारात्मकता

नकारात्मकता मन से निकालो
सकारात्मकता मन मे बसा लो
जीवन परिवर्तित हो जायेगा
सबकुछ अच्छा हो जाएगा
नकारात्मकता जीवन पर भारी
तनाव करता हम पर सवारी
बीमारियो को निमन्त्रण देता
शांति मन की हर लेता सारी
सकारात्मक सोच अच्छा बनाती
जीवन मे खुशिया ले आती
कोई पराया न रहे जगत मे
सबका प्यार मिले जगत मे
परमात्मा की भी कृपा बरसती
युग परिवर्तन सकारात्मकता करती।

हिन्दी की पत्रकारिता

हिन्दी की पत्रकारिता ने
छुए नित नए आयाम
गणेश शंकर विद्यार्थी है
इसमे सबसे ऊंचा नाम
मिशनरी पत्रकारिता के
वे ही असली जनक थे
देश की आजादी के
पत्रकार ही तो नायक थे
लेकिन घटते मूल्यों से
पत्रकारिता हुई आहत
पीत पत्रकारिता आज
है सबसे बड़ा अभिशाप
मीडिया मे खबरों के
दाम अब लगने लगे
सच्ची खबरों के किस्से
दफन अब होने लगे
हिन्दी पत्रकारिता जब
आईना बन जायेगी
झूठ दम तोड़ देगा तब
सच्चाई ही नजर आएगी।

पत्रकारिता दिवस पर

पत्रकार को पेट नही होता!
मैं एक पत्रकार हूं
न मेरा वर्तमान है
न ही कोई भविष्य
फिर भी मेरे प्रति है
एक जनविश्वास
मेरी खबरों की है
बड़ी विश्वनीयता
लोग चाहते है
मैं ईमानदार रहूं
जो लोग खुद में
बेईमान है
वे भी मुझमें
ईमानदारी खोजते है
मेरे फिसलने पर
नसीहतें देते है
लेकिन क्या ,
किसी ने सोचा है
मुझे मिलता क्या है
देश-समाज की
आवाज़ बनने पर भी
मुझमें होंसला नही है
अपनी आवाज़ उठाने का
जब कभी, जिसने भी
ऐसी जुर्रत की
वह बाहर हो गया
या फिर बाहर
कर दिया गया
उनके द्वारा जो स्वार्थी है
या फिर जो बिके है
सत्ता के गलियारों में
गणेश शंकर विद्यार्थी
बनने की मेरी भूख ने
मुझे कुपोषित कर दिया
मीडिया में ग्लैमर्स तो है
सम्रद्धि का उजाला नही
देश के 80 करोड़ को
मुफ्त अनाज मोहिया है
पत्रकार 80 करोड़ में भी नही
लगता है पत्रकार के
पेट नही होता,
इसीलिए वह चैन से नही सोता।

किसी के लिए दिन है

किसी के लिए दिन है
किसी के लिए रात है
सबका अपना भाग्य
या कर्मों की बिसात है
जैसा जैसा कर्म किया
वैसी वैसी बरसात है
न पछताने से कुछ होगा
न खुश होने की बात है
जिसके लिए दिन चल रहा
उसकी होनी सांझ है
जिसके लिए रात अंधेरी
आनी वहां प्रभात है
फिर घमण्ड कैसा,
या मायूसी कैसी ?
यह तो सृष्टि के
परिवर्तन का प्रपात है।

मोह जिससे भी हो

मोह जिससे भी हो
करता हमे कमजोर

है प्रबल विकार मोह
दूर करने पर दो जोर

माया मोह लगते प्यारे
पर अपनों से करते न्यारे

प्यार सभी से करना सीखो
मोह बन्धन से छुटना सीखो

फिर देखो प्रभु का कमाल
गुणों से होंगे मालामाल

ईश्वरीय बोध हो जाएगा
मोह सबसे छुट जाएगा।

मोह

मोह जिससे भी हो
करता हमे कमजोर

है प्रबल विकार मोह
दूर करने पर दो जोर

माया मोह लगते प्यारे
पर अपनों से करते न्यारे

प्यार सभी से करना सीखो
मोह बन्धन से छुटना सीखो

फिर देखो प्रभु का कमाल
गुणों से होंगे मालामाल

ईश्वरीय बोध हो जाएगा
मोह सबसे छुट जाएगा।

जीवन का हर रंग

बचपन,जवानी और बुढ़ापा
जीवन का हर रंग खरा सा

बचपन मे जिसे संस्कार मिला
पढ़ने का अच्छा आधार मिला

जवानी उसकी पहचान बनाती
ताकत भी राष्ट्र के काम आती

कुसंस्कारों से वह बचा रहता
सद्चरित्र उसके काम आता

बुढ़ापा भी कष्ट नही देता है
निरोग काया स्वस्थ्य मन देता है

प्रभु को जिसने साक्षी बनाया है
सफल जीवन उसने ही पाया है।

मन से सन्त

मन से सन्त
जो हो गया
माया मोह से
छूट गया
राग द्वेष
कोई न रहे
मन मे राम
बसे रहे
घर छोड़ना
जरूरी नही
परिजनों से दूरी
जरूरी नही
दायित्व सभी
निभाओ तुम
व्यवहार से
सन्त बन जाओ तुम।

सबको सब कुछ मिलता नही

सबको सब कुछ
मिलता नही
हर पेड़ पर पुष्प
खिलता नही
पराजय के डर से
परीक्षा छोड़ दे
ऐसे जीवन में
जीवटता नही
सफलता चाहिए
तो हारना सीखो
दुश्मन को गले
लगाना सीखो
मिल जायेगी
मंजिल हर एक
आत्मा को परमात्मा से
मिलाना सीखो
इसके लिए राजयोग
है उत्तम उपाय
जो इसमें रम गया
उसे परमात्मा भाये।

माउंट आबू

माउंट आबू की धरा निराली
ज्ञान सरोवर में छाई हरियाली

रूहानियत कण कण में बसी है
शिव बाबा की अपनी नगरी है

ब्रह्माकुमारीज का है मुख्यालय
चरित्र निर्माण एक देवालय

ओम शांति मंत्र है यहां का
जो आता हो जाता यहां का

आत्मस्वरूप का ज्ञान मिलता
राजयोग अभ्यास जो करता

प्रभु मिलन की धरा यही है
स्वर्ग सी अनुभूति यही है।

जीवन हो सार्थक

जीवन हो सार्थक
ऐसी हो जाए सोच

राष्ट्र पर न मर मिटने का
होता रहे अफ़सोस

देश के हर शख्स की
हिफाजत का निभाये जिम्मा

तरक्की हो वतन की
ऐसे करे हम काम

देश के शहीदों को
मिलता रहे सम्मान

एकाग्रचितता के साथ
सबके भले की हो बात

सफलता जरूर मिलेगी
परमात्मा होंगे साथ।

नई सुबह

नई सुबह आती रहे
नई आशाओ के साथ

हम कदम बढ़ाते रहे
अभिलाषाओं के साथ

सकारात्मक सोच हो
लक्ष्य सबका नेक हो

संवेदना बनी रहे
इंसानियत जिन्दा रहे

प्यार संग दुनिया रहे
सबके शुभ की चाह हो

सद्कर्मो की राह हो
परमात्मा भी याद रहे

सद्गुणों की बौछार रहे।

दुःख सुख

दुःख सुख दोनो आते जाते
विचलित इनसे होना नही

दुःख में जो विचलित होता
सुख में भी सुख वह पाता नही

धैर्य सबसे बड़ा आभूषण
इसको धारण करके रखिए

निर्लेप भाव से सुख-दुःख का
जब आए स्वागत कीजिए

दुःख आएगा ,चला जाएगा
सुख की भी यही नीति है

इस जगत में वही संत है
जो सुख-दुःख में समान जीते है।

परमात्मा को बस याद कीजिए

जितनी भक्ति बढ़ी इस समय
उतना ही पाप भी बढ़ रहा है

विक्रम अपने छोड़े बिना ही
इंसान पूजा-पाठ कर रहा है

घूस के पैसों से दान कर रहा है
गलत काम से नही डर रहा है

मंदिर-मस्जिद जाने से पहले
तन-मन को पवित्र कर लीजिए

देवी-देवताओं के गुणों को अपना
अपने धर्मालयो में प्रवेश कीजिए

सुख-शांति -सम्रद्धि के लिए
परमात्मा को बस याद कीजिए।

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस

हो गया है तकनीकी में
नए युग का आगाज़

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस है
अदभुत तकनीक आज

कृत्रिम मानव निर्माण से
रच गया नया इतिहास

शक्ल-सूरत,बुद्धि में भी
असली लगता कृत्रिम आज

ईश्वरीय सेवा को भा गई
कृत्रिम ब्रह्माकुमारी बहन

शिवांगी नामकरण किया
रहती सुख-शांति के धाम।

गृहस्थ जीवन

गृहस्थ जीवन मे बनिए
सन्त स्वभाव समान

आचरण ऐसा कीजिए
कहलाये आदर्श इंसान

अवगुणों का परित्याग कर
अपनाये सद्गुणी ज्ञान

पवित्रता तन मन मे बसे
बन जाये साधु समान

ईर्ष्या,द्वेष,घृणा का न हो
जीवन मे कोई स्थान

परमात्मा का स्मरण कर
करते रहे राजयोग ध्यान।

विश्वास

विश्वास जगत मे पाना है
सबको अपना बनाना है

हर चेहरे पर हो खुशी
ऐसा अपनत्व निभाना है

खाने लगे आपकी कसम
ऐसा आचरण अपनाना है

गैर शब्द की जगह न हो
प्यार ऐसा बरसाना है

आत्म स्वरूप मे रहना है
परमात्मा को साथी बनाना है

खुद हंसना ओर हंसाना है
जीवन को सार्थक बनाना है।

अंतरात्मा

अंतरात्मा जो कहे
वही कीजिए काम

सबसे बड़ा जज वही
वही बसे है राम

अंतरात्मा में झांककर
पहचान लीजिए स्वयं को

सबसे बड़ा दर्पण वही
वही बसे है चारो धाम

माता पिता लौकिक जिनके
खुश रहते सुबह शाम

अलौकिक पिता परमात्मा
बनाते उनको महान।

धर्म

धर्म कल्याण का मार्ग है
इसे व्यापार मत बनाओ

आस्था बहुत भोली है
इसके भोलेपन को न भुनाव

एक बार विश्वास टूटा
तो फिर जुड़ता नही है

ईश्वर के नाम पर किसी को
मूर्ख बनाकर मत भटकाओ

कर्म करोगे अगर अच्छा
भाग्य अच्छा बन जायेगा

अगर किया है पाप कोई
दण्ड से कभी न बच पायेगा।

सृष्टि का यह नियम सत्य है
जैसा करोगे वैसा भरोगे सत्य है।

मेरी माँ

याद आती है माँ
मन की किताब में
स्वर्ण पन्ना जोड़ दिया
यादो के इतिहास में
मन से कोमल
उसूलो से कठोर
राष्ट्रभक्त माँ अनमोल
शहीद जगदीश की
बहन थी मां
कर्मयोगी मदन लाल की
अर्धांगनि थी मां
मेरी जीवनदायनी
प्रकाशवती थी मां
सद्चरित्रता का
पाठ पढ़ाया
सात्विकता में
रहना सिखाया
माँ नही, ईश्वर स्वरूपा थी
नारी शक्ति की मिसाल थी
न जाने कहां चली गई मां
हमेशा के लिए खो गई मां
मगर यादो में फिर भी
जिन्दा है मेरी माँ
माँ नही, परमात्मा है माँ

shreegopalnarsan

श्रीगोपाल नारसन एडवोकेट
पोस्ट बॉक्स 81,रुड़की,उत्तराखण्ड

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