श्रुत स्तुति | सरस्वती वंदना
श्रुत स्तुति ( सरस्वती वंदना )
वीतरागी सर्वज्ञ और हितोपदेशी जो तीर्थंकर हैं,
अष्ट कर्मों और अठारह दोषों से रहित जिनेश्वर हैं,
अनंत चतुष्टय के धारी हैं अनंत कैवल्य ज्ञानी हैं,
ऐसे त्रिकालदर्शी जिनमुख से झरती वाणी श्रेयस्कर है!!
सरस्वती कहो या श्रुतमाता एक दूजे के पर्याय कहाएं,
जैन धर्म में देव शास्त्र गुरु भव्य जनों को मोक्षमार्ग दिखाएं !
ज्ञान रवि रुपी जिनवाणी अज्ञान तम को हरने वाली ,
मिथ्यामल को धोने वाली श्रुत सम्यक का ज्ञान कराएं !!
जिनवाणी जगत कल्लाणी मोह मदन को हरती है,
हर पीडा जन्म जरा मृत्यु के भय निवारण करती है,
तीर्थंकरों की दिव्य ध्वनि जो पढता सुनता और गुने
स्वर्गों का सुख देती है सिद्धशिला आरोहन करती है !
मन को शीतल करने वाली संताप को हरने वाली है,
भवसागर से पार कराती करूणा करने वाली है,
द्वादशांग रूपी जिन आगम सागर की एक बूंद समान,
स्यादवाद, अनेकांतवाद सिद्धांत धरने वाली है!!
हे वीणा पाणि मातु, श्वेत हंस वाहिनी,रखे हस्त वीणा नित,
कृपा तिहारी बरसे, दो विवेक, रसपान करें विद्या अमृत,
सन्मति मुख से निकली वाणी, गूंथी गौतम गुरू वंदूं
श्रुताभ्यास का सुफल मिले बस सदा पापों से रहूं विरत !!

विरेन्द्र जैन
( नागपुर )
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