तौबा

तौबा | Tauba

तौबा

( Tauba )

बगावत से करो तौबा, अदावत से करो तौबा
मगर हर्गिज़ नहीं यारो मुहब्बत से करो तौबा

सही जाती नहीं ये दूरियाँ अब इश्क़ में हमसे
कहा मानो सनम अब तुम शरारत से करो तौबा

बिना मतलब ही मारें लोग पत्थर फेंक कर हमको
ये रोने और रुलाने की जहालत से करो तौबा

हसीं तुमसा नहीं मिलता ज़माने भर में देखा है
बुढ़ापे में जवानी की भी आदत से करो तौबा

सभी को एक सा हक़ दो, सभी को एक सा मानो
अमीरी और ग़रीबी की सियासत से करो तौबा

समझ के फ़ैसला करना हमारी चाहतों पर तुम
वफ़ा करना मगर खुद से बगावत से करो तौबा

चलो मिल बैठ कर सुलझा लो सारे मस्अले मीना
लडाई और झगड़े से, अदालत से करो तौबा

Meena Bhatta

कवियत्री: मीना भट्ट सि‌द्धार्थ

( जबलपुर )

यह भी पढ़ें:-

Similar Posts

  • प्यार की पहल | Pyar ki Pahal

    प्यार की पहल ( Pyar ki pahal )   आसमां में खिला कँवल कहिए चाँद पर आप इक ग़ज़ल कहिए जो बढ़ा दे फ़िजा मुहब्बत की प्रेयसी के नयन सजल कहिए बाँध दे जो नज़र से धड़कन को प्यार की आप वो पहल कहिए बो दिया नब्ज़ मे दर्द-ए-कसक प्रेम की बढ़ गई फसल कहिए…

  • दिल लगा मत दिल्लगी में

    दिल लगा मत दिल्लगी में है सुकूँ बस दोस्ती में ! चैन उजड़े दुश्मनी में ए ख़ुदा पैसे मुझे दे जी रहा हूँ मुफ़लिसी में कौन मिलता प्यार से है अब नहीं उल्फ़त किसी में दे ख़ुशी अब तो खुदाया ग़म भरे है जिंदगी में हिज्र बस आज़म मिलेगा दिल लगा मत दिल्लगी में शायर: आज़म…

  • झूठा ज़रूर निकलेगा | Jhutha Zaroor Nikalega

    झूठा ज़रूर निकलेगा ( Jhutha Zaroor Niklega ) तेरा ये फ़ैसला झूठा ज़रूर निकलेगा कुसूरवार जो था बेकुसूर निकलेगा यक़ीं है शोख का इक दिन ग़ुरूर निकलेगा वो मेरी राह से होकर ज़रूर निकलेगा पलट रहा है वरक़ फिर कोई कहानी के न जाने कितने दिलों का फ़ितूर निकलेगा पिला न साक़िया अब और जाम…

  • दीद-ए-तर | Dida-e-Tar

    दीद-ए-तर ( Dida-e-Tar ) वो मेरे लिए दीद-ए-तर है के नहीं है।उल्फ़त का मिरी उसपे असर है के नहीं है। रस्मन तो उसे आना था फिर भी नहीं आया।उसको मिरे मरने की ख़बर है के नहीं है। तारीकियों इतना तो बता दो कभी मुझको।शाम-ए-ग़मे-हिज्रां की सह़र है के नहीं है। आजाऊंगा,आजाऊंगा इतनी तो ख़बर दो।मेह़फ़िल…

  • आज़म नैय्यर की ग़ज़लें | Aazam Nayyar Poetry

    रोज़ तेरी राह देखें ये नज़र है ? रोज़ तेरी राह देखें ये नज़र है ?हाँ मगर तेरी नहीं कोई खबर है जीस्त में आती नहीं कोई ख़ुशी यूँहाँ लगी कोई बुरी शायद नज़र है लौट आ परदेश से मिलने मुझे तूयार तेरी दोस्ती पक्की अगर है पर कहीं मिलता नहीं तेरा निशाँ भीढूंढ़ता तुझको…

  • निकल गया | Nikal Gaya

    निकल गया ऐसे वो आज दिल के नगर से निकल गया।जैसे परिन्द कोई शजर से निकल गया। किस रूप में वो आया था कुछ तो पता चले।बच कर वो कैसे मेरी नज़र से निकल गया। क्यों कर न नफ़़रतों का हो बाज़ार गर्म आज।जज़्बा-ए-इ़श्क़,क़ल्बे-बशर से निकल गया। उस दिन ही मेरे दिल के महक जाएंगे…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *