तेरे शहर की हवाएँ | Tere shahar ki hawayein kavita
तेरे शहर की हवाएँ
( Tere shahar ki hawayein )
तेरे शहर की हवा बड़ी सर्द थी उस पर तेरा ख़य्याल
तेरे ख़य्याल से मेरा दिल बेताब सा पर कुछ मलाल
तुझे सीने से लगाने का सबब उफ्फ तेरी गर्म साँसे
क्या ख्वाहिशें थी कि उफ्फ रूह का खो गया होश
तेरी चाहत या तेरी तलब किस्मत में ना कहीं मिली
तलब बे-सबब हाथ दुआ में उठाकर सुकून ना मिली
आधी रात में जो बात थी चाँद भी पूरे शबाब पर था
तुझसे जुदा चैन ना मुझे ना ही चाँद दिल बेताब था
उस सर्द हवाएँ सुरमई शाम की कुछ जुदा जुदा सी थी
मेरे सिहरती जिस्म की सिहरन तेरे जिस्म की कसक थी
छेड़ कर गुजर जाती थी वो तेरे शहर की सर्द हवाएँ
ना जाने कितनी देर तक खामोशी थी दिल-ए-समंदर
सोनू ऐसे सर्द फिजाओं में कोई चिराग जला ना आतिशदान
तेरे इश्क़ की गर्म जर्द अगन से जिंदा रहा ऐ दिल-ए-नादान
फिजाँ में हवा भी खफा खफा दिल रहा जवां जवां
सर्द हवाओं में भी गर्म था तेरी मेरी दास्ताँ ऐ शमां









हृदय से आभार व्यक्त करता हूँ।💐🙏💐