Tilak Bridge Ke Cactus

तिलक ब्रिज के कैक्टस | Vyang

तिलक ब्रिज के कैक्टस

( Tilak Bridge Ke Cactus )

साहित्यकार रचना लिख कर केवल रचना दान में पटक कर रखे तो किसी को आपत्ति नही होती है पर रचना लिख कर गरम मेल की तरह वलात कानों में पकड कर उढ़ेले तो हत्या या आत्मा करने को मन होता है। पर जब दोनो नही कर कर सकते तो इसी को मलबूरी कहते है।

तो रचना की उपयोगिता तभी होती है जब उसे सुनाया या पढ़वाया जावे। जैसे दाने दाने पर लिखा है खाने वाले का नाम एसे ही रचना रचना पर लिखा है पढ़ने वाले का नाम और जैसे डंडा पैदा कही और होता है और सर कहीं और फोड़ता है वैसे ही रचना टपकती कहीं और है और चिपकती कही और है।

मुझे क्या मालूम था कि तिलक ब्रिज के कैक्टस नाम बहुमूल्य मगर दुरूह ग्रन्थ मुझे ट्रकड्रायवर के हाथो मिलेगा । आपको मालूम है कि आर्थिक अल्पता मुझे हवाई जहाज के अलावा धरातल के सभी वाहनो का सुख दे चुकी है। मैं शासकीय सेवक हॅू ।

चूंकि जनता मेरी सेवा से संतुष्ट रहती है इसलिये उच्चाधिकारी एवं जन प्रतिनिधि असन्तुष्ट है। सामान्यतः हर  छः माह में और किस्मत बहुत अच्छी रही तो एक साल में मेरा स्थानान्तरण प्रान्त के घुर उत्तर से घुर दक्षिण या घुर पूर्व से घुर पश्चिम सा यहां से वहां और वहां से यहां होता रहता है।

ड्यूटी के मामलें में, मैं श्रंगारित पत्नी और उसके द्वारा प्रेम से प्रस्तुत दो या तीन भोगो (छप्पन भोग सुने ही है) को भी छोड कर आंधी तूफान और उफनती नदी में भी कूद जाता हॅू।

(सन्दर्भ के लिए कृपया तत्सम्बन्धी अप्रकाशित रचनाओं को पड़े) ऐसे ही एक दिन भोपाल से छिन्दवाड़ा आते समय जर्जर सरकारी बस का आगे का हिस्सा आगे निकल गया और पीछे का हिस्सा पीछे रह गया।

दोनो भागों को धरती मां ने झेल लिया और धरती पुत्र और पुत्रियां चीख कर स्तम्भित हो गये। अपने अपने संस्कारों के अनुसार सब सरकार को विभिन्न स्तर की गालियां देकर उतर गये।

जैसे चीटिंया एक शक्कर का दाना छिन जाने पर दूसरे की खोज में निकल पड़ती है वैसे हम सब भी अन्य वाहनों की तलाश में चारो ओर बिखर गये किसी को जीप मिल गई तो उससे निकल गया। कोई आते वाहनों को देख कर आकर्ण मुस्कुरा कर रोकने लगा ।

कुछ तेज रफ्तार वाले वाहनों को बिल्कुल सड़क के बीच खड़े होकर स्वयं की एवं वाहनों में सवार व्यक्तियों की जान जोखिम में डाल कर वाहनों को रोकने का निरर्थक प्रसत्न करने लगे।

गोया कोई मुस्कुरा कर, कोई आधरा हाथ हिला कर, कोई पीछे भागकर, कोई अपशब्द कह कर व अन्य सम्भव तरीको से वाहनों को रोकने का एवं अन्दर घुसने का प्रयत्न करने लगा।

ट्रक ऐसे मौको पर डूबने को जहाज का सहारा बन कर आते है जैसे एक योग्य शिष्य को गुरू की एवं योग्य गुरू को शिष्य की आवश्यकता होती है वैसे ही असहाय सबारियों को ट्रक की एवं ट्रक को असहाय सवारियों की आवश्यकता होती है।

एक ट्रक ने रूकने का अभिनय किया और एक फर्लांग तक दौड़कर फिर अन्त में रूक गया। मैं हांफते हांफते अन्दर घुसने लगा तो ड्राइवर बोला दो सवारियां एक साथ लंूगा” मैने इच्छुक पति पत्नि से कहा “आप मेडम को मेरे साथ भेज दीजिये और आप किसी टैक्सी से चले आईये

शंकित पति शीघ्र की अजनबियो के इरादे भांप लेते है। वह पति समझ गया कि ट्रक ड्राइवर उसकी सुन्दर पत्नि को देख कर ही दो सवारियों का प्रस्ताव रख रहा है अन्यथा तो ट्रक में एक के लिये भी स्थान नही बचा था। और मेरी मक्कारी तो उसे और भी सावधान कर गई।

ये दोनो पति पत्नी जब नहीं बैठने लगे तो ट्रक के कन्डक्टर ने “जगह नहीं है” कह कर फाटक बन्द कर लिया। ऐसे मौको पर गिड़गिड़ाना एक हथियार बन जाता है और मैं पायदान पर लटक कर गिड़गिड़ाने लगा।

इतने में ट्रक चालक चिल्लाया अरे कमीने बाऊ साब को भीतर आने दो एक किताब और बची है। “मैनें सोचा कि ट्रक चालक शायद सीट को किताब कह रहा है अतः जैसे रसगुल्ला गले के अन्दर सरकता है मैं भी अन्दर सरक गया।

ट्रक के अन्दर कोई सीट नही थी। बसो और ट्रको की भाषा में खड़े होने की जगह को स्टेंडिग कहा जाता है अतः मैं खड़ा रहा। ट्रक ड्राइवर ने कहा “बाऊजी दूसरे ट्रक वाले बैतूल से छिन्दवाड़ा का पचास रूपये लेते है मैं केवल पैंतीसं लूगा पांच सौ रूपसे की कीमत की एक किताब फ्री में दूंगा।

इसके बाद उसने पैतालीस रूपये रखवाये एक रूपये पेज के हिसाब से पांच सौ पंज की तिलक ब्रिज के कैक्टस नाम की किताब बोनस में थमा दी। मैने पूछा “उस्ताद, यह किताब आपने कैसे खरीदी।” कहां खरीदी बाऊ साहब ट्रक के धन्धे में बहुत सी बेगार करना पड़ती है।

बगैर किसी गलती के भी आर.टी.ओ ने पकड़ लिया, दो हजार रूपये रखवाये और चार किताबे टिका दी । रिश्वत भी नही हुई और किताब भी बिक गई।

मैने पन्ने पलटे तो उक्त पुस्तक किसी कलेक्टर ने लिखी थी और आई.ए.एस. के प्रश्न पत्र की तहर दुरूह थी । उसकी कविताऐं नागफनी, बबूल, तपती रेत, दुर्भिक्ष कुपोषण, सूखी नदी, पतझड़, वेताल, अतृप्त आत्मा, इत्यादि वाली थी।

आज कल पुस्तके खरीदी नही जाती बेची जाती है। प्रोफेसर उसकी किताबें यूनीवसिर्टी को बेचता है और उच्चाधिकारी अधीपस्थ कर्मचारियों को। सुधि पाठको का अभाव है आजकल।

यदि एक हाथ में चाकू हो तो ही दूसरे हाथ की किताब बिक पाती है। हुआ यह होगा कि कलेक्टर साहब ने निःशुल्क छपी उस पुस्तक के कोटो को उप जिलाध्यक्षो, फूड आफीसर और आर.टी.ओ. इत्यादि को आवन्टित किया होगा और उन लोगो ने ठेकेदारो और ड्राईवरो इत्यादि को बेच दिया होगा। इस तरह उक्त पुस्तक मेरे हाथ में आ गई।

मैंने इस पुस्तक को ड्राइंग रूप में रखूंगा और मित्रो की बतलाऊंगा कि यह पुस्तक एक आई.ए.एस. के द्वारा लिखी हुई है। आई.ए.एस. की हर गतिविधि गरिमामयी मानी जाती है। और फिर जब ऊब जाऊंगा तो उसे किसी मित्र को उपाहर में दे दंूंगा । फिर वह भी क्रमशः वही करेगा जो मैने किया।

 

✍?

 

लेखक : : डॉ.कौशल किशोर श्रीवास्तव

171 नोनिया करबल, छिन्दवाड़ा (म.प्र.)

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