विकास और बाजार | Vikas aur Bazaar

विकास और बाजार 

( Vikas aur bazaar ) 

 

हमने मान लिया

इंसान को भगवान

और भगवान को पत्थर,

पत्थर को रख कर

लगा दिया बाजार

और फिर शुरू हुआ

विकास का क्रम,

जमीने बिकने लगी

औकात को देख कर

लोग होने लगे बेघर

सड़के चौड़ी होना शुरू हुई

पेड़ कटने लगे

उखड़ने लगे

जड़ समूल,

टावर लगे

रेडिएशन बढ़ा

पक्षियां मरने लगे,

विकास के इसी क्रम में

संस्कृति,

सभ्यता,

संस्कार,

मानवता

का शुरू हुआ

विनाश और हनन,

और आज भी

हम दौड़ पड़े हैं

झोली लिए

विकास को

पाने।

रचनाकार रामबृक्ष बहादुरपुरी

( अम्बेडकरनगर )

यह भी पढ़ें :-

प्यारा देश हमारा | Pyara Desh Hamara

Similar Posts

  • उठी कलम | Kavita Uthi Kalam

    उठी कलम ( Uthi Kalam )   उठी कलम चली लेखनी कविता का स्वरूप हुआ। शब्द सुसज्जित सौम्य से काव्य सृजन अनूप हुआ। टांग खींचने वाले रह गए सड़कों और चौराहों तक। मन का पंछी भरे उड़ानें नीले अंबर आसमानों तक। छंद गीत गजलों को जाना कलमकारों से मेल हुआ। एक अकेला चला निरंतर अब…

  • मत करो इसरार जी | Ishrar par kavita

    मत करो इसरार जी ( Mat karo ishrar ji )   हर किसी को चाहिए, अधिकार ही अधिकार जी। कोई भी करता नहीं , कर्तव्यहित व्यवहार जी।। बिन दिए मिलता नहीं है, बात इतनी जान लो, प्यार गर पाना है तो, देना पड़ेगा प्यार जी।। दूसरो को दोगे इज्जत, होगी तब हासिल तुम्हें, कब भला…

  • शाश्वत प्रश्न | Kavita Shaswat Prashn

    शाश्वत प्रश्न ( Shaswat Prashn )   मैं कौन हूं आया कहां से हूं यहां ! यह नहीं मालूम, है पुन: जाना कहां !! किसलिए हैं आए जगमें, और फिर क्यौं जाएंगे! इस राज को इस जन्म में, क्या समझ हम पायेंगे!! कुछ दिनों की जिंदगी के बाद होगा क्या मेरा ! नजाने फिर, कहां…

  • फैशन का भूत | Fashion par kavita

    फैशन का भूत ( Fashion ka bhoot )  फैशन का भूत बड़ा मजबूत, साड़ी पर भारी पड़ गया सूट; इसके नाम पर मची है लूट। ठगे जा रहे युवक युवतियां, फंस पछता रहे युवा पीढ़ियां। टाइट जींस , फटे अंगवस्त्र पहनते, अर्द्धनग्न सी रहते,जिस्म आधी ही ढ़कते ! ऐसे कपड़े पहन करते चुहलबाज़ीयां, गुंडे मवाली…

  • जाऊँ क्यों मैं घूमने

    जाऊँ क्यों मैं घूमने ( कुण्डलिया ) जाऊँ क्यों मैं घूमने, सारे तीरथ धाम।कण-कण में हैं जब बसे, मेरे प्रभु श्री राम। मेरे प्रभु श्री राम, बहुत हैं मन के भोले।खाये जूठे बेर, बिना शबरी से बोले। सच्ची हो जो प्रीत, हृदय में तुमको पाऊँ।तुम्हें ढूंढने और, कहीं मैं क्यों कर जाऊँ। डाॅ ममता सिंहमुरादाबाद…

  • भगवान पार्श्वनाथ से गुहार : भजन

    भगवान पार्श्वनाथ से गुहार हारे के सहारे आ जा, तेरा भक्त पुकारे आ जा। हम तो खड़े तेरे द्वार, सुन ले करुणा की पुकार। आओ नाथ पार्श्वनाथ आओ नाथ पार्श्वनाथ। आओ नाथ पार्श्वनाथ।। कोई सुनता नहीं, अब में क्या करूँ। दर्द दिल की दसा जा के किस से कहुँ। तेरे होते मेरी हार, कैसे करूँ…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *