ज़िन्दगी से हमें और क्या चाहिए

ज़िन्दगी से हमें और क्या चाहिए

ज़िन्दगी से हमें और क्या चाहिए

ज़िन्दगी से हमें और क्या चाहिए ।
आपका बस हमें आसरा चाहिए ।।

हार कर भी हमें सोचना चाहिए ।
उसकी वाजिब सबब ढूँढ़ना चाहिए ।।

जाँ रहा हूँ मिलूँगा तुझे भी सनम ।
देखना पर तुम्हें रास्ता चाहिए ।।

दो विदाई मुझे आज मुस्कान से ।
फिर मिलूँ मैं तुम्हें तो दुआ चाहिए ।।

फूल से ही सभी दिल लगाते रहे ।
खार को भी यहाँ आसरा चाहिए ।।

प्रेम दिल में रहे इस वतन के लिए ।
और क्या फिर हमें देखना चाहिए ।।

पूछता हूँ यहाँ आज उनसे यही ।
क्यों लहूँ से धरा सींचना चाहिए ।।

जीस्त हमको मिला है वतन के लिए
यार मुझको नही दिल रुबा चाहिए ।।

बात अपनी करो तुम प्रखर अब यहाँ ।
हर किसी से तुम्हें तो वफा चाहिए ।।

Mahendra Singh Prakhar

महेन्द्र सिंह प्रखर 

( बाराबंकी )

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